Wednesday, September 28, 2011

लताजी का ८३वाँ जन्मोत्सव और उन्हीं की पसंद के ८३ गीत

दुनिया की सबसे सुरीली आवाज़ आज जीवन के तिरासी वर्ष पूर्ण कर रही है.लता मंगेशकर नाम की इस चलती-फ़िरती किंवदंती ने हमारी तहज़ीब,जीवन और परिवेश को हर रंग के गीत से नवाज़ा है. हम भारतवासी ख़ुशनसीब हैं जिन्हें लता मंगेशकर का पूरा संगीत विरासत के तौर पर उपलब्ध है.

हज़ारों गीतों की ये दौलत उन सुनने वालों की अकूत संपदा है जिस पर कोई भी संगीतप्रेमी समाज फ़ख्र करता है. कोशिश थी कि लता मंगेशकर के जन्मदिन पर अनूठी सामग्री आप तक पहुँचाए. इस बारे में कुछ प्रयास चल ही रहा था कि ज्ञात हुआ कि प्रमुख हिंदी अख़बार नईनिया में देश के बहुचर्चित युवा कवि यतीन्द्र मिश्र द्वारा संकलित उन ८३ गीतों का प्रकाशन हो रहा है जो लताजी द्वारा भी पसंद किये गये हैं. मालूम हो कि यतीन्द्रजी भारतरत्न लता मंगेशकर पर एक पुस्तक लिख रहे हैं.इसके लिये वे लगातार लताजी के बतियाते रहते हैं और प्रकाशन की भावभूमि पर सतत चर्चा चलती है.यतीन्द्रजी ने दीदी की रुचि,उनकी तबियत और ह्रदय के पास रहने वाले ८३ सुरीले मोतियों की गीतमाला तैयार की है जिसे लताजी ने भी व्यक्तिगत रूप से सराहा है. इस सूची को श्रोता-बिरादरी पर जारी करते हुए हम यतीन्द्र मिश्र और नईदुनिया के प्रति साधुवाद प्रकट करते हैं.

जब तक टिमटिमाते तारों की रात रहेगी
झील की हवाओं में उदास गुमसुमी रहेगी
बादलों के पीछे चाँद धुंधलाता रहेगा
चिर किशोरी लता की निष्पाप आवाज़
हम पर सुखभरी उदासी बरसाती रहेगी.
-अजातशत्रु

यह सूची उन गायक-गायिकाओं और संगीतप्रेमियों के लिये अत्यंत महत्वपूर्ण है जो लता मंगेशकर के गीतों में दिलचस्पी रखते हैं. इस सूचि का कालखण्ड विस्तृत है और इसमें लताजी के प्रिय संगीतकारों की धुनों की बानगी भी सुनाई देती है. आशा है लताजी के तिरासीवें जन्मदिन ये सुरीला नज़राना आप संगीतप्रेमी पाठकों के लिये एक अनूठे दस्तावेज़ का काम करेगा.
आज सुनिए कुछ गीत और हाँ कामना भी करें कि सृष्टि के इस मिश्री स्वर को हमारी उमर लग जाए.....

गीत- दर्द-ए-दिल तू ही बता
फिल्म : जश्‍न
संगीतकार: रोशन



गीत: आ प्यार की बाँहों में
फिल्म चाँद ग्रहण ( अप्रदर्शित)
संगीत जयदेव
गीत- क़ैफ़ी आज़मी



लता-८३ और लताजी के पसंद के ८३ गीत
१. आएगा...आएगा आने वाला... (महल) खेमचन्द्र प्रकाश १९४८
२. बेदर्द तेरे दर्द को सीने से लगा के... (पद्मिनी) गुलाम हैदर १९४८
३. हवा में उड़ता जाए मोरा लाल दुपट्टा... (बरसात) शंकर-जयकिशन १९४९
४. साजन की गलियाँ छोड़ चले... (बाजार) श्याम सुंदर १९४९
५. उठाए जा उनके सितम... (अंदाज) नौशाद १९४९
६. तुम न जाने किस जहाँ में खो गए... (सजा) एसडी बर्मन १९५१
७. बेईमान तोरे नैनवा निंदिया न आए... (तराना) अनिल विश्वास १९५१
८. तुम क्या जानो तुम्हारी याद में... (शिन शिनाकी बूबला बू) सी. रामचन्द्र १९५२
९. मोहे भूल गए साँवरिया... (बैजू बावरा) नौशाद १९५२
१०. ए री मैं तो प्रेम दीवानी... (नौ बहार) रोशन १९५२
११. वो तो चले गए ऐ दिल... (संगदिल) सज्जाद हुसैन १९५२
१२. वंदे मातरम्‌... (आनंद मठ) हेमंत कुमार १९५२
१३. जोगिया से प्रीत किए दुख होए... (गरम कोट) पं. अमरनाथ १९५२
१४. ये जिन्दगी उसी की है... (अनारकली) सी. रामचन्द्र १९५३
१५. ये शाम की तनहाइयाँ... (आह) शंकर-जयकिशन १९५३
१६. जादूगर सईंयाँ छोड़ो मोरी बईंयाँ... (नागिन) हेमंत कुमार १९५४
१७. जो मैं जानती बिसरत हैं सैंया... (शबाब) नौशाद १९५४
१८. न मिलता गम तो बरबादी के अफसाने... (अमर) नौशाद १९५४
१९. देखोजी बहार आई बागों में खिली कलियाँ... (आज़ाद) सी. रामचन्द्र १९५५
२०. मनमोहना बड़े झूठे... (सीमा) शंकर-जयकिशन १९५५
२१. आँखों में समा जाओ इस दिल में... (यास्मीन) सी. रामचन्द्र १९५५
२२. गुजरा हुआ जमाना आता नहीं दुबारा... (शीरीं-फरहाद) एस. मोहिन्दर १९५६
२३. रसिक बलमा... दिल क्यूँ लगाया... (चोरी-चोरी) शंकर-जयकिशन १९५६
२४. मैं पिया तेरी तू माने या न माने.... (बसंत बहार) शंकर-जयकिशन १९५६
२५. ऐ मालिक तेरे बंदे हम... (दो आँखें बारह हाथ) वसंत देसाई १९५७
२६. छुप गया कोई रे दूर से पुकार के... (चम्पाकली) हेमंत कुमार १९५७
२७. हाय जिया रोए पिया नहीं आए... (मिलन) हंसराज बहल १९५८
२८. औरत ने जनम दिया मरदों को... (साधना) एन. दत्ता १९५८
२९. आ जा रे परदेसी मैं तो कब से खड़ी... (मधुमती) सलिल चौधरी १९५८
३०. हम प्यार में जलने वालों को... (जेलर) मदन मोहन १९५८
३१. बैरन नींद न आए... (चाचा जिंदाबाद) मदन मोहन १९५९
३२. जाने कैसे सपनों में खो गई अँखियाँ... (अनुराधा) पं. रविशंकर १९६०
३३. बेकस पे करम कीजिए सरकारे मदीना... (मुग़ल-ए-आज़म) नौशाद १९६०
३४. अजीब दास्ताँ है ये... (दिल अपना और प्रीत पराई) शंकर-जयकिशन १९६०
३५. ओ सजना बरखा बहार आई... (परख) सलिल चौधरी १९६०
३६. ज्योति कलश छलके... (भाभी की चूड़ियाँ) सुधीर फड़के १९६१
३७. जा रे जा रे उड़ जा पंछी... (माया) सलिल चौधरी १९६१
३८. अल्लाह तेरो नाम, ईश्वर तेरो नाम... (हम दोनों) जयदेव १९६१
३९. ढूँढो-ढूँढो रे साजना मोरे कान का बाला... (गंगा-जमुना) नौशाद १९६१
४०. दिल का खिलौना हाय टूट गया... (गूँज उठी शहनाई) बसंत देसाई १९६१
४१. एहसान तेरा होगा मुझ पर... (जंगली) शंकर-जयकिशन १९६१
४२. ऐ मेरे दिले नादाँ तू गम से न घबराना... (टावर हाउस) रवि १९६२
४३. कहीं दीप जले कहीं दिल... (बीस साल बाद) हेमंत कुमार १९६२
४४. आपकी नजरों ने समझा... (अनपढ़) मदन मोहन १९६२
४५. पवन दीवानी न माने उड़ावे मोरा... (डॉ. विद्या) एसडी. बर्मन १९६२
४६. जुर्मे उल्फत पे हमें लोग सजा देते हैं... (ताजमहल) रोशन १९६३
४७. रुक जा रात ठहर जा रे चंदा... (दिल एक मंदिर) शंकर-जयकिशन १९६३
४८. लग जा गले कि फिर ये हंसीं रात... (वो कौन थी) मदन मोहन १९६४
४९. ए री जाने ना दूँगी... (चित्रलेखा) रोशन १९६४
५०. जीवन डोर तुम्हीं संग बाँधी... (सती सावित्री) लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल १९६४
५१. तुम्हीं मेरे मंदिर तुम्हीं मेरी पूजा... (खानदान) रवि १९६५
५२. काँटों से...आज फिर जीने की तमन्ना है... (गाइड) एसडी बर्मन १९६५
५३. दिल का दिया जला के गया... (आकाशदीप) चित्रगुप्त १९६५
५४. ये समाँ...समाँ है ये प्यार का... (जब-जब फूल खिले) कल्याणजी-आनंदजी १९६५
५५. सुनो सजना पपीहे ने कहा... (आए दिन बहार के) लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल १९६६
५६. रहें न रहें हम महका करेंगे... (ममता) रोशन १९६६
५७. नयनों में बदरा छाए... (मेरा साया) मदन मोहन १९६६
५८. कुछ दिल ने कहा... (अनुपमा) हेमंत कुमार १९६६
५९. दुनिया करे सवाल तो हम क्या जवाब दें... (बहू बेगम) रोशन १९६७
६०. छोड़ दे सारी दुनिया किसी के लिए... (सरस्वतीचन्द्र) कल्याणजी-आनंदजी १९६८
६१. हमने देखी है इन आँखों की महकती... (खामोशी) हेमंत कुमार १९६९
६२. बिंदिया चमकेगी चूड़ी खनकेगी... (दो रास्ते) लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल १९६९
६३. ना जिया लागे ना... (आनंद) सलिल चौधरी १९७०
६४. बैंया न धरो ओ बलमा... (दस्तक) मदन मोहन १९७०
६५. मेघा छाए आधी रात बैरन बन गई... (शर्मिली) एसडी बर्मन १९७१
६६. रैना बीती जाए श्याम न आए... (अमर प्रेम) आरडी बर्मन १९७१
६७. ठाढ़े रहियो ओ बाँके यार रे... (पाकीजा) गुलाम मोहम्मद १९७२
६८. बाँहों में चले आओ... (अनामिका) आरडी बर्मन १९७३
६९. आज सोचा तो आँसू भर आए... (हँसते जख्म) मदन मोहन १९७३
७०. ये दिल और उनकी निगाहों के साए... (प्रेम पर्वत) जयदेव १९७३
७१. आप यूँ फासलों से गुजरते रहे... (शंकर हुसैन) खय्याम १९७७
७२. ईश्वर सत्य है...सत्यम्‌ शिवम्‌ सुंदरम्‌... (सत्यम्‌ शिवम्‌ सुंदरम्‌) लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल १९७८
७३. सावन के झूले पड़े तुम चले आओ... (जुर्माना) आरडी बर्मन १९७९
७४. सोलह बरस की बाली उमर को... (एक-दूजे के लिए) लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल १९८०
७५. ये कहाँ आ गए हम... (सिलसिला) शिव-हरि १९८१
७६. ऐ दिले नादाँ...आरजू क्या है... (रजिया सुल्तान) खय्याम १९८३
७७. दिल दीवाना बिन सजना के माने न... (मैंने प्यार किया) राम-लक्ष्मण १९८९
७८. मेरे हाथों में नौ नौ चूड़ियाँ हैं...(चाँदनी)शिव-हरि १९८९
७९. यारा सिली सिली...(लेकिन) ह्रदयनाथ मंगेशकर १९९०
८०. सिली हवा छू गई...(लिबास) आर.डी.बर्मन १९९१
८१. दिल हूम हूम करे...(रूदाली) भूपेन हज़ारिका १९९४
८२ माई नी माई मुंडेर पे तीरी...(हम आपके हैं कौन) राम-लक्ष्मण १९९४
८३ लुका छिपी बहुत हुई...(रंग दे बसंती) ए.आर.रहमान २००६
  • अजातशत्रु का वक्तव्य लता दीनानाथ मंगेशकर ग्रामोफ़ोन रेकॉर्ड संग्रहालय,इन्दौर के प्रकाशन बाबा तेरी सोन चिरैया से साभार
  • लता जी का फोटो से fillum साभार

Tuesday, September 27, 2011

मेरी उमर से लम्बी हो गईं,बैरन रात जुदाई की

विलक्षण मौलिकता में पश्चिमि रंग मिला कर कोई संगीतकार कोई नया सोपान रच दे तो समझ जाइयेगा कि ये करिश्मा दादा सचिनदेव बर्मन के हस्ते ही हो रहा है.संगीतकारों की भीड़ में जो व्यक्ति अलग नज़र आता है उसमें बर्मन दा का नाम बाइज़्ज़त शामिल किया जा सकता है. वाद्यों को जिस ख़ूबसूरती से बर्मन दा इस्तेमाल करते हैं वह न केवल चौंकाता है बल्कि एक लम्हा इस बात की तस्दीक की करता है कि छोटे बर्मन या पंचम दा को रचनात्मकता के सारे गुण घुट्टी में ही मिले थे.आर्केस्ट्रा की बेजोड़ कसावट बर्मन दा ख़ासियत है .उन्हें मिली संगीतकार की कुदरती प्रतिभा का ही नतीजा है कि “पिया तोसे नैना लागे रे” से लेकर “सुनो गज़र क्या गाए” जैसी विपरीत मूड की रचनाएँ उनके सुरीरे संगीत की उपज हैं.यह स्वीकारने में संकोच नहीं करना चाहिये कि सचिनदेव बर्मन की मौजूदगी चित्रपट संगीत के समंदर का वह प्रकाश स्तंभ है जिसके आसरे मेलड़ी के दस्तावेज़ रचने की नित नई राह रची गई है.क्लब गीत,लोक गीत और शास्त्रीय संगीत का आधार बना कर बांधी गई धुने सिरजने वाला ये बंगाली राजा पूरे देश में पूजनीय है.

लता तिरासी और तिरासी अमर गीत:
२८ सितम्बर को लताजी का जन्मदिन है.वे ८३ बरस की हो जाएंगी. कल श्रोता बिरादरी की कोशिश होगी कि वह आपको लताजी के ऐसे ८३ सुरीले गीतों की सूची पेश कर दे जो स्वर-कोकिला को भी पसंद हैं.बस थोड़ा सा इंतज़ार कीजिये और ये सुरीला दस्तावेज़ आप तक आया ही समझिये.



आइये अब सचिन दा और लता दी के बीच के सांगीतिक रिश्ते की बात हो जाए.अनिल विश्वास के बाद वे सचिन दा ही हैं जिनके लिये सृष्टि की ये सबसे मीठी आवाज़ नतमस्तक नज़र आतीं हैं.यूँ ये विनम्रता लताजी ने अपने तमाम संगीतकारों के लिय क़ायम रखी लेकिन सचिन दा की बंदिशों में लता-स्वर से जो अपनापा झरता है वह एक विस्मित करता है. लता-सचिन का संगसाथ शुभ्रता,पवित्रता और भद्रता का भावुक संगम हे.

श्रोता-बिरादरी की जाजम पर गूँज रहा नग़मा विरह गीतिधारा का लाजवाब रूपक गढ़ रहा है. छोटे छोटे आलाप और मुरकियों के साथ लता मंगेशकर की गान-विशेषज्ञता की अनूठी बानगी है ये गीत. सन २०११ में जब लता स्वर उत्सव समारोहित हो रहा है तब इस गीत को ध्वनि-मुद्रित हुए ५५ बरस हो चुके हैं और फ़िर भी लगता है कि अभी पिछले महीने ही इसे पेटी पैक किया गया है. कारण यह है कि समय और कालखण्ड बदल गया हो लेकिन घनीभूत पीड़ा के पैमाने नहीं बदले. मोबाइलों,ईमेलों और मल्टीप्लैक्सों के ज़ख़ीरों के बावजूद यादों के तहख़ाने में ऐसी सुरधारा दस्तेयाब है जो आज भी हमारी इंसानी रूहों को झिंझोड़ कर रख देने में सक्षम है. सालों बाद भी ये गीत आप सुनेंगे तो शर्तिया कह सकते हैं कि सचिन घराने का लोभान वैसा ही महकेगा जैसा सन १९५५ में जन्म लेते समय महका होगा. मुखड़े में लम्बी हो गई शब्द में ऐसा लगता है जैसे ये जुदाई सदियों की है. अंतरे में लताजी अपने तार-सप्तक को स्पर्श कर ठिकाने पर किस ख़ूबसूरती से लौट आईं हैं ये जानने के लिये आपको ये गाना दो-तीन बार ज़रूर सुनना चाहिये.
चलिये सचिन देव बर्मन और लता मंगेशकर के इस अदभुत गीत में गोते लगाते हैं.


फ़िल्म : सोसायटी
वर्ष : १९५५
संगीतकार : सचिनदेव बर्मन.

Sunday, September 25, 2011

चित्रपट गीतों का गुमनाम शहज़ादा;जमाल सेन

समय है कि किसी नाक़ाबिल को को झोली भर कर श्रेय देता है और किसी में आकंठ प्रतिभा होने के बाद भी नहीं. राजस्थानी मरूभूमि के बाशिंदे जमाल सेन साहब भी कुछ ऐसे ही थे जिनके साथ वक़्त की बेरहमी में खूब सताया. पर प्रतिभा कब हार मानती है. वे वक़्त के थपेड़ों से बेख़बर मेलडी को सिरजते रहे. आज लता स्वर उत्सव में आज जमाल सेन का भावुक स्मरण कर हम एक तरह से मधुरता को अपना सलाम पेश कर रहे हैं या यूँ कहें श्राद्ध पर्व में उनकी आत्मा की शांति का अर्घ्य दे रहे हैं.
जमाल सेन जी को राज-रजवाड़ों की तहज़ीब विरासत में मिली. नृत्य और राजस्थानी लोक संगीत में पारंगत थे. फ़िल्म संगीत की ओर पैसे के लिये आये लेकिन कभी भी पाप्युलर कल्चर के नाम पर धुनों का कचरा नहीं किया. यदि निष्पक्ष रूप से लता-गीतों का शतक रचा जाय (यथा भतृहरि का श्रंगार शतक) तो निश्चित रूप से जमाल सेन का वह गीत उसमें ज़रूर शामिल होगा जो आप श्रोता बिरादरी की रविवारीय पेशकश है. ख़रामा ख़रामा हम इस उत्सव की समापन बेला की ओर आ रहे हैं तो लाज़मी है कि कुछ ऐसा सुन लिया जाए जो आजकल नहीं सुना जा रहा है. एच.एम.वी के एलबम रैयर जेम्स भी यह गीत शुमार किया गया है. इस विस्मृत से संगीतकार की चर्चित फ़िल्में थीं

शोख़ियाँ,दायरा,अमर शहीद पतित पावन और कस्तूरी. गाने की शुरूआत में पखावज की छोटी सी आमद और बाद में हारमोनियम के ताल पर गूँजता मंजीरा इस गीत के ठेके को समृध्द करता है.शुरूआती दोहे के बाद सितार के छोटे छोटे कट लता का दिव्य स्वर क़यामत ढ़ाता है. सुपना बन साजन आए में सुपना बन को लताबाई ने जैसी फ़िरत दी है वह करिश्माई है. फ़िर दोहरा दें कि जहाँ जहाँ हमारे समय की इस किवंदंती ने सरल गाया है उसे दोहराना कठिन हो गया है.


लता मंगेशकर जिस आवाज़ और जज़्बाती गायिकी को लेकर आईं वह आंइस्टीन के सापेक्षतावाद की विज्ञानिक खोज की तरह युगांतरकारी घटना है.इतिहास के चौराहे पर एक नितांत नया मोड़ या बहती हुई नदी का एक कम्पलीट टर्न-अबाउट.इस आवाज़ में ताज़गी थी.झरने सी खलखलाहट थी.अछूते वन-प्रांतर का पावित्र्य था. लता के कंठ में अनजाने वही किया जो विवेकानंद की वाणी ने पाश्च्यात्य में किया-अजातशत्रु



लता मंगेशकर इस गीत में महज़ एक गायिका नहीं अपने समय की समग्र संस्कृति बन गईं हैं. ख़ूशबू और बेतहाशा ख़ूशबू का वितान सजातीं लता किसी कुंजवन की कोमल सखी सी विचर रहीं हैं इस गीत में. नायिका तो परदे के चलके के साथ ओझल हो जाती है लेकिन ये गीत उसकी मासूम छवि हो हमारे मानस में हमेशा जीवंत बना देते हैं. अजातशत्रुजी एक जगह लिखते हैं कि लता एक अलहदा सी सुवास हैं. अब उसे कोई नाम नहीं दिया जा सकता. पर महसूस किया जा सकता है. यह तत्व अन्य गायक-गायिका में नहीं मिलता. लता के गले में तुलसी की पत्ती है.
लगता है लता जमाल सेन की धुन को पिछले जन्म में सुन चुकीं हैं.वे जिस सहजता से इन शब्दों को अपने कंठ में उतार कर हमारे कानों को संगीत का अलौकिक आचमन करवा रहीं हैं वह हमारे कलुष को धोने के लिये काफ़ी है. इस गीत को सुनते वक़्त लगता है हम मीरा के मंदिर हैं जहाँ वे अपने साँवरे को ये गीत सुनाते सुनाते मोगरे की माला पहना रहीं हैं. अब सुन भी लीजिये ये गीत और लता मंगेशकर को जुग जुग जीने की दुआ दे दीजिये...

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फिल्म: शोखियाँ
संगीत : जमाल सेन
गीत केदार शर्मा
सोयी कलियाँ हँस पड़ी झुके लाज से नैन,
वीणा की झंकार से तड़पन लागे नैन
सपना बन साजन आये
हम देख देख मुस्काये
ये नैना भर आये, शरमाये-२
सपना बन साजन आये-२
बिछ गये बादल बन कर चादर-२
इन्द्रधनुष पे हमने जाकर-२
झूले खूब झुलाये-२
ये नैना भर आये, शरमाये
सपना बन साजन आये
नील गगन के सुन्दर तारे-२
चुन लिये फूल, समझ अति न्यारे -२
झोली में भर लाये -२
ये नैना भर आये, शरमाये
सपना बन साजन आये
मस्त पवन थी, हम थे अकेले-२
हिलमिल कर बरखा संग खेले-२
फूले नहीं समाये -२
ये नैना भर आये, शरमाये
सपना बन साजन आये


(अजातशत्रु का वक्तव्य लता दीनानाथ मंगेशकर ग्रामोफ़ोन रेकॉर्ड संग्रहालय,इन्दौर के प्रकाशन बाबा तेरी सोन चिरैया से साभार)

Saturday, September 24, 2011

उस्ताद अली अकबर ख़ाँ साहब के साथ सुकंठी लता

शास्त्रीय संगीत लताजी को घुट्टी में मिला है. चित्रपट संगीत से फ़ारिग़ होकर लताजी अपना सर्वाधिक समय क्लासिकल म्युज़िक सुनने में लगातीं आईं हैं. वे ख़ुद भिंडी बाज़ार वाले अमानत अली ख़ाँ साहब की शाग़िर्द रहीं हैं. उन्हें बड़े ग़ुलाम अली ख़ाँ साहब का गायन बहुत पसंद है और वे समकालीन शास्त्रीय संगीत पर सतत नज़दीकी नज़र रखतीं हैं.पं.दीनानाथ मंगेशकर ख़ुद एक समर्थ गायक रहे हैं और ये क़िस्सा तो बहुत बार कहा जा चुका है कि एक बार कोल्हापुर में पण्डितजी अपने विद्यार्थेयों को किसी बंदिश का अभ्यास करने का कह कर कुछ देर के लिये बाहर गये थे और जब लौटे तो देखा बमुश्किल ६ -७ बरस की लता राग भीमपलासी गाकर अपने उम्र में बड़े विद्यार्थियों की क्लास ले रहीं हैं. संभवत: यह पहली घटना थी जब पं.दीनानाथ मंगेशकर को अपने घर में छुपे हीरे की जानकारी मिली और वे उसी दिन से अपनी लाड़ली हेमा(लताजी के बचपन का नाम) को तराशने में जुट गये.

“लता की आवाज़ मीठी शमशीर सी हमारा कलेजा चीरती जाती है और आनंद के अतिरेक से हम कराह पड़ते हैं.मन होता है लता को समूची क़ायनात से छिपाकर,डिबिया में बंद करके सितारों में रख दिया जाए.उनका सिरजा सुख कहाँ बरदाश्त होता है.-अजातशत्रु


आज श्रोता-बिरादरी पर मैहर घराने के चश्मे चराग़ उस्ताद अली अकबर ख़ाँ साहब मरहूम के संगीत निर्देशन में निबध्द फ़िल्म आंधियाँ की रचना सुनवा रहे है.आप जानते ही होंगे कि ख़ाँ साहब मैहर के बाबा अल्लाउद्दीन ख़ाँ साहब के सुपुत्र-शिष्य थे और एक विश्व-विख्यात सरोद वादक. फ़िल्म आंधियाँ के बारे में ख़ाँ साहब ने एक रोचक क़िस्सा सुनाया था कि
जब उन्हे चेतन आनंद ने बतौर संगीत निर्देशक अनुबंधित करने मुम्बई बुलाया तो ख़ाँ साहब ने कहा मैं पहले अपने वालिद साहब से इजाज़त लेना चाहूँगा क्योंकि हम क्लासिकल मौसीक़ी वाले लोग हैं और फ़िल्म संगीत के लिये उनका ऐतराज़ हो सकता है. अली अकबर मुम्बई से मैहर आए और फ़िल्म संगीत के बारे में आज्ञा मांगी. बाबा बोले अली अकबर संगीत देने में तो कोई बुराई नहीं लेकिन मैं चाहूँगा कि तुम एक गीत की धुन बना कर मुझे सुनाओ. अगर मुझे लगा कि ये तुम्हारे बलन का काम है तो ठीक वरना तुम इस फ़िल्म का प्रस्ताव ठुकरा देना.ख़ाँ साहब ने वैसा ही किया. पहला गाना तैयार हुआ. उन दिनों कैसेट रेकॉर्डर जैसा कोई इंतज़ाम नहीं था सो बाबा को मुम्बई लाया गया और स्टुडियो में धुन सुनाई गई.बाबा ने धुन पसंद की और इस तरह से आंधियाँ फ़िल्म का संगीत निर्देशन अली अकबर ख़ाँ साहब ने किया.
लताजी के बारे में रोज़ बात हो रही है सो आज चाहेंगे इस सृष्टि के इस पावन स्वर के बारे में आज कुछ विशेष न कहा जाए और सीधे गीत सुना जाए.महसूस करने की बात ये है कि उस्ताद अली अकबर ख़ाँ साहब फ़िल्म माध्यम में काम कर रहे हैं तो चित्रपट संगीत के अनुशासन से बाख़बर हैं और फ़िर भी अपना जुदा अंग परोस पाए हैं.



फिल्म : आँधियाँ
संगीत: उस्ताद अली अकबर खाँ
गीत : पण्दित नरेन्द्र शर्मा


है कहीं पर शादमानी और कहीं नाशादियाँ
आती हैं दुनिया में सुख-दुख की सदा यूँ आँधियाँ, आँधियाँ -२
है कहीं पर शादमानी और कहीं नाशादियाँ

क्या राज़ है, क्या राज़ है- क्या राज़ है, क्या राज़ है
आज परवाने को भी अपनी लगन पर नाज़ है, नाज़ है
क्यों शमा बेचैन है, ख़ामोश होने के लिये -२
आँसुओं की क्या ज़रूरत -२
दिल को रोने के लिये -२
तेरे दिल का साज़ पगली -२
आज बेआवाज़ है -२
है कहीं पर शादमानी और कहीं नाशादियाँ

आऽहै कहीं पर शादमानी और कहीं नाशादियाँ -२
आती हैं दुनिया में सुख-दुख की सदा यूँ आँधियाँ, आँधियाँ

आईं ऐसी आँधियाँ
आईं ऐसी आँधियाँ, आँधियाँ
बुझ गया घर का चिराग़
धुल नहीं सकता कभी जो पड़ गया आँचल में दाग़ -२
थे जहाँ अरमान -थे जहाँ अरमान
उस दिल को मिली बरबादियाँ, बरबादियाँ
है कहीं पर शादमानी और कहीं नाशादियाँ -२

ज़िंदगी के सब्ज़ दामन में -२
कभी फूलों के बाग़
ज़िंदगी के सब्ज़ दामन में
ज़िंदगी में सुर्ख़ दामन में कभी काँटों के दाग़ -२
कभी फूलों के बाग़ कभी काँटों के दाग़
फूल-काँटों से भरी हैं ज़िंदगी की वादियाँ

है कहीं पर शादमानी और कहीं नाशादियाँ
आती हैं दुनिया में सुख-दुख की सदा यूँ आँधियाँ, आँधियाँ -२
है कहीं पर शादमानी और कहीं नाशादियाँ


(अजातशत्रु का वक्तव्य लता दीनानाथ मंगेशकर ग्रामोफ़ोन रेकॉर्ड संग्रहालय,इन्दौर के प्रकाशन बाबा तेरी सोन चिरैया से साभार)

Friday, September 23, 2011

ग़ालिब की ग़ज़ल और एक मार्मिक क़िस्सा !

पं.ह्रदयनाथ मंगेशकर और विदूषी लता मंगेशकर एकदूसरे के लिय बहुत आदर भाव रखते हैं.यूँ पण्डितजी अपनी दीदी से छोटे हैं लेकिन लताजी सिर्फ़ उम्र में बड़ी नहीं; जीवन व्यवहार में भी बड़ी हैं. स्टुडियो के भीतर छोटा भाई "बाळ" पण्डितजी हो जाते हैं. ज़ाहिर है एक संगीतकार का पाया गायक से ऊँचा होता है; होना भी चाहिये.

श्रोता-बिरादरी मौक़ा-बे-मौक़ा इस बात को स्थापित करने का प्रयास कर रही है कि चित्रपट संगीत विधा में पहला स्थान संगीतकार का है.गीतकार भी बाद में आता है क्योंकि गीतकार को तो निर्माता/निर्देशक और ख़ासतौर पर संगीतकार एक बना-बनाया नक्शा देते हैं कि उसे किस पट्टी में लिखना है. लेकिन संगीतकार तो धुन बनाते वक़्त वही कारनामा करता है जिसे आसमान में से तारे तोड़ कर लाना कहते हैं.वह शून्य में धुर खोजता है. उसके दिल में समाई बेचैनी का ही तक़ाज़ा है कि वह कुछ ऐसा रच जाता है जो सालों-साल ज़िन्दा रहता है.

आपने कई बार महसूस किया होगा कि आप शब्द भूल जाते हैं लेकिन धुन नहीं. आ लौट के आजा मेरे मीत याद न भी आए तो आप ल ल ला ला ल ल्ला ल ल्ला ला...तुझे मेरे मीत बुलाते हैं...ऐसा गुनगुना ही लेते हो....ये ल ल्ला ल ल्ला क्या है...यह है वह धुन जिसे सिरजने में संगीतकार ख़ून को पानी कर देता है. बहरहाल बात पं.ह्रदयनाथजी की हो रही है. लता स्वर उत्सव में ज़िक्र कर चुके हैं कि सज्जाद,अनिल विश्वास और ह्रदयनाथजी लता की गीत यात्रा के महत्वपूर्ण संगीतकार हैं और स्वर-कोकिला ने इनकी रचनाओं को अतिरिक्त एहतियात से गाया है.

ह्रदयनाथ मंगेशकर तान सम्राट उस्ताद अमीर ख़ाँ साहब के गंडाबंद शागिर्द हैं और मराठी चित्रपट और भावगीतों में बतौर गायक और संगीतकार उनकी ख़ास पहचान है. मालूम हो कि लता मंगेशकर के दो अत्यंत लोकप्रिय प्रायवेट एलबम चाला वाही देस (मीरा) और ग़ालिब ह्रदयनाथजी द्वारा ही संगीतबध्द हैं.


“लता हमेशा डूबकर गाती है.एक – एक शब्द से वे अपना माँस और साँस मिलातीं हैं.आगे जब वे गायन में समा जातीं हैं और आलाप और ताने इसतरह फ़ूटने लगते हैं जैसे तुलसी के बिरवा में फूल फूटें या नींद में बच्चा मुस्कुराए.यह हमारा सामूहिक पुण्य ही है कि भारतवर्ष को लता मिलीं. -अजातशत्रु



लता स्वर उत्सव को एकरसता से बाहर निकालने के लिये आज लेकर आए हैं मिर्ज़ा ग़ालिब का क़लाम जो ह्रदयनाथ-लता सृजन का अदभुत दस्तावेज़ है. इस ग़ैर फ़िल्मी रचना को सुनें तो महसूस करें कि टीप के तबले और बिजली सी चमकती सारंगी ने इस ग़ज़ल के शबाब को क्या ग़ज़ब की दमक दी है. दर्दे मिन्नत कशे दवा न हुआ,कोई उम्मीद बर नहीं आती,कभी नेकी भी उसके ,फ़िर मुझे दीदा-ए-तर याद आया और आज सुनवाई जा रही ग़ज़ल रोने से और इश्क़ में बेबाक हो गये. लता का स्वर किस लपट के साथ सारंगी के आलाप पर छा गया है.
छोटी छोटी मुरकियों से लताजी क्या ख़ूबी से इस ग़ज़ल को सजा गईं हैं. अंतरे की पहली पंक्ति (यथा: कहता है कौन नालाए बुलबुल को बे-असर)के आख़िरी लफ़्ज़ को ह्रदयनाथजी ने लताबाई से जिस तरह गवाया है वह इस बात की तसदीक करता है कि दोनो भाई बहन की क्लासिकल तालीम कितनी पक्की है.

ह्रदयनाथजी के संगीत को सुनते हुए है एक सत्य और जान लें कि उनका संगीत कभी भी ख़ालिसपन का खूँटा नहीं छोड़ता. दूनिया जहान हर तरह का समझौता मुकमिन है लेकिन ह्रदयनाथ के संगीत में नहीं.लता-ह्रदयनाथ बेहद स्वाध्यायी लोग हैं.किसी भी काम को करते समय होमवर्क पहले करते हैं और यही वजह है कि पण्डितजी के निर्देशन में ज्ञानेश्वरी गाई जा रही हो,मीरा या ग़ालिब;आप हमेशा एक रूहानी लोक की सैर से लौटती हैं.

आख़िर में एक क़िस्सा:
दीनानाथजी के जाने के बाद बैलगाड़ी से अपनी माँ के साथ लताजी के भाई बहन मुम्बई पहुँचे हैं.लम्बा सफ़र है.रास्ते में कुछ खाया नहीं.सभी की उम्र दस से कम है,ह्रदयनाथजी की भी.दोपहर मुम्बई पहुँचना हुआ है. एक रिश्तेदार के घर आसरा लेने पहुँचे हैं. पता मालूम नहीं कि लता कहाँ रहती है,काम करने कहाँ जाती है.रिश्तेदार अपनी नौकरी पर निकल गया है. दो दिन से भूखे हैं सभी और सामने आई है एक गिलास में पाँच लोगों के लिये मह़ज़ चाय.लताजी तक परिवार के मुम्बई आने की और रिश्तेदार के घर पहुँचने की ख़बर पहुँची है. वे एक बड़ी सी छबड़ी में वड़ा पाव,चाट पकौड़ियाँ और कुछ और व्यंजन लेकर रिश्तेदार के घर पहुँचीं हैं.व्यंजनों की ख़ुशबू और दो दिन की भूख. अपने प्यारे बाळ (ह्रदयनाथ) के हाथ एक वड़ा पाव दिया है. आगे की बात ह्रदयनाथजी से सुनिये “मैंने वड़ा-पाव हाथ में लिया और दीदी की ओर श्रध्दा से देख रहा हूँ.बहुत सारे प्रश्न हैं,तुम कहाँ थीं अब तक,तुम कितनी अच्छी हो हमारे लिये खाना लाई हो....वग़ैरह वग़ैरह..आधा ही खा पाया हूँ उस वड़ा-पाव और पेट भर गया..... उसके बाद एक से बढिया व्यंजन खाए हैं,शहाना रेस्टॉरेंट्स में गया हूँ.लेकिन सच कहूँ..दीदी के उस आधे वड़ा पाव से जो तृप्ति मिली थी वैसी तो कभी मिली ही नहीं!


रोने से और इश्क़ में बेबाक हो गये.
प्रायवेट एलबम:ग़ालिब
संगीतकार:ह्रदयनाथ मंगेशकर

रचना: मिर्ज़ा गालिब مرزا اسد اللہ

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(अजातशत्रुजी का वक्तव्य लता दीनानाथ मंगेशकर ग्रामोफ़ोन रेकॉर्ड संग्रहालय के प्रकाशन बाबा तेरी सोन चिरैया से साभार)

Thursday, September 22, 2011

एसजे घराने की धुन में कूकती लता

बरसों बरस सितारा स्टेटस,शोहरत,पैसा और शीर्ष बने रहने का सौभाग्य....यदि यह सब किसी की झोली में एक साथ दमकता दिखाई दे तो समझ लीजिये कि संगीतकार शंकर-जयकिशन की बात हो रही है. दो विपरीत टेंपरामेंट, विरासत, संस्कार और पारिवारिक पृष्ठभूमि से दूध में शकर की तरह एक हो गये शंकरसिंह रघुवंशी और जयकिशन पंचोली की क़ामयाबी का अंदाज़ा सिर्फ़ इस बात से लगाया जा सकता है एसजे की जोड़ी ने किसी समय अभिनेता से ज़्यादा क़ीमत वसूली और एक फ़िल्म के एकाधिक हिट गानों का सिलसिला जारी रखा. इसमें कोई शक नहीं कि दुनिया भर में सत्तर के दशक तक यदि भारत के चित्रपट गीतों को गुनगुना कर याद करने की बारी आई तो एसजे का संगीत ही पहली पसंद होगा.एक माने में कहीं कहीं शंकर-जयकिशन भारत की तहज़ीब के सदाबहार राजदूत हैं. भव्य आर्केस्ट्रा के शौक़ीन एसजे का कोई काम हल्का-पतला नहीं है. उनके यहाँ आकर लता भी ऐसी सुनाई देतीं हैं जैसे वे अपने आराध्य मंगेश देवता के मंदिर से दीपक लगा कर बस बाहर ही आईं हैं और फ़लाँ गीत गा दिया है.वे जब एसजे घराने में गा रहीं होतीं तो प्रणय, विरह, उल्लास, ज़िन्दगी और रिश्तों के गीत अपनी श्रेष्ठता पर होते थे.साजों के ताने-बाने में मजाल है कि मेलड़ी हाथ मलती रह जाए. शंकर-जयकिशन टीम वर्क की एक ऐसी मिसाल गढ़ गये हैं जिसका अनुसरण बाद के सालों में कई जोड़ियों ने किया है.आश्चर्य तब होता है जब वे ड्रम बजवा रहे हों या ढोलक,वॉललिन,बाँसुरी,सितार

लता मंगेशकर की की उस सूझ को सलाम जो शब्दों के पार जाकर उसके मूर्त अर्थ ज़्यादा अमूर्त की ख़ुशबू को पकड़ लेती है.लता की आवाज़ की कोयल हमारे वजूद की अमराई को उत्फ़ुल्ल-प्रफ़ुल्ल कूक से भर देती है.आज के गीत और बीते ज़माने के गीत का मूलभूत फ़र्क़ है मेलडी.वह किस चीज़ और कहाँ बनती है. फ़र्क़ बस इतना सा है कि पहले गीत भीतर को भागता था .आज का आर्केस्ट्रा गाने को डिस्टर्ब कर रहा है-अजातशत्रु

बजवा रहे हों या अपना प्रिय एकॉर्डियन; हर पीस पर उनकी छाप नज़र आती है.लताजी को जिस सप्तक से उन्होंने गवाया है वह करिश्माई ही नहीं अविश्वनीय भी है.शंकर-जयकिशन न केवल अच्छी शायरी और कविता को चुना बल्कि संगीत में भी हर लम्हा नये प्रयोग किये. ग़ौरतलब है कि आपको एसजे के गीतों के अंतरों में अक्सर संगीत का मिज़ाज बदलता हुआ सुनाई देता है.
लता मंगेशकर भी गीत की रचना और धुन के अनुसार अपने कंठ का परिधान तय करतीं हैं.कहीं वे अपनी नायिका के लिये शोख़ बन गई हैं तो कहीं प्रेम की पीड़ा में पगी ऐसी जोगन जो सदियों से विरह की टेर लगा रहीं हैं.एसजे के संगीत में लता यदि आपको ठुमकने पर मजबूर कर सकतीं हैं तो कहीं गीत की इबारत को अपनी आवाज़ के जादू का स्पर्श देते हुए भीतर की यात्रा भी करवा सकतीं हैं.लताजी के पास एक अदभुत स्वर है यह तो जग-ज़ाहिर है और एक सफल गायिका के लिये ज़रूरी भी लेकिन उनके पास सबसे अहम क्वॉलिटी है वह नज़र जो संगीकार, गीतकार, निर्माता, अभेनित्री और गीत की सिचुएशन को पकड़ कर इतिहास रच देती है. इस बात को किसी और गायक के साथ तुलना या अपमान के रूप में न लें लेकिन ये सच है कि लताजी के बाद ऐसी सूक्ष्म दृष्टि परवरदिगार ने सिर्फ़ मोहम्मद रफ़ी को बख़्शी थी.
चलती फ़िरती भाषा में रचा गया ये गाता एसजे के हस्ताक्षर साज़ एकॉर्डियन से शुरू होता है और लताजी के बलखाते – इठलाते सुरों में नहला जाता है. देखा है तुझे कहीं न कहीं-लेकिन कहाँ याद आता नहीं...ऐसी बतियाती पंक्ति को लता-एसजे ही सजा सकते हैं.आइये हम भी बात बंद करें और गीत सुनें...


फिल्म : काली घटा
संगीतकार: शंकर जयकिशन


(अजातशत्रुजी का वक्तव्य लता दीनानाथ मंगेशकर ग्रामोफ़ोन रेकॉर्ड संग्रहालय,इन्दौर के प्रकाशन लता और सफ़र के साथी से एवं फोटो गूगल से साभार)

Wednesday, September 21, 2011

रोशन-लता की जुगलबंदी का बेजोड़ दस्तावेज़

हमारे अंधेरों और हमारी उदासियों को बेधकर एक महीन आवाज़ पिछली आधी सदी से ज़्यादा समय से हमारे ख़ून और तहज़ीब में शामिल होती जा रही है. लता मंगेशकर को सिर्फ़ एक आवाज़ और नाम की तरह विचारना मुमकिन नहीं. वे एक ऐसा जीवित आश्चर्य हैं जिसमें कई पीढ़ियाँ अपनी आत्मा का अकेलापन ढूंढती है.उस अकेलेपन को जो पीड़ा की पवित्रता में छ्टपटाता रहता है. क्या आप महसूस नहीं करते कि लता को सुनते हुए वक़्त ठहर सा जाता है. इस आवाज़ का आसरा लेकर हमनें अपनी ख़ुशियाँ और ग़म तलाशे हैं. अंधेरों और रोशनी को जिया है.उस ठहरे वक़्त में आवाज़ का एक झरना बह रहा है....लता नाम का झरना. एक स्वर की शक्ल लेकर ये झरना हमें नहला कर पाक़ साफ़ कर रहा है. लता मंगेशकर का पावन स्वर भावनाओं और संवेदनाओं की एक अमूर्त थपथपाहट है , संभवत:पहली और इस सृष्टि की आख़िरी भी.इस स्वर में अतीत की स्मृतियों को पुर्नजीवित करने का अपरिभाषेय सामर्थ्य है, और भविष्य के आकारों को गढ़ने का अदभुत शक्ति भी.

उपरोक्त इबारत स्वर-सामाज्ञी लता मंगेशकर के अमृत महोत्सव(२००४) की बेला में हिन्दी पत्रकारिता की नर्सरी कहे जाने वाले प्रकाशन नईदुनिया में प्रकाशित हुई थी.
इसी परिशिष्ट प्रकाशित इंटरव्यू में लताजी ने कहा था कि उन्हें अच्छी तरह से याद तो नहीं लेकिन ये बात सन १९४२ की है और उन्होनें वसंत जोगलेकर की मराठी फ़िल्म किती हसाल में पहला गाना गाया था.

लता यानी एक निर्मल,स्वच्छ,मासूम स्वर.फ़िर इसी में मिली हुई उनकी अंदरूनी और सहज छवि,जो किसी वनकन्या या आश्रमबाला की है,गीत को इस दुनिया की चीज़ नहीं रहने देती. सब स्वच्छ और पवित्र हो जाता है.इसके अलावा वे शब्द की आत्मा को पूरा जज़्ब क्र लेतीं हैं और गीत के बजाय उसके भाव को गाती हैं.
-अजातशत्रु

तब लताजी के बाबा पं.दीनानाथजी ज़िन्दा थे और बहुत परम्परावादी व्यक्ति थे. वे लड़कियों के स्टेज और फ़िल्म में काम करने को बहुत बुरा मानते थे. लताजी बतातीं हैं कि पिताजी के अनुशासन के कारण घर में स्‍नो पाउडर तक लाने की इजाज़त नहीं थी. किती हसाल के लिये दीनानाथ के बड़ी मुश्किल से अनुमति दी थी और उसके बाद उनकी मृत्यु हो गई.बाद में मंगेशकर परिवार के हालात कुछ ऐसे बने कि लताजी को फ़िल्मों में काम करने आना पड़ा और पहली फ़िल्म थी पहली मंगळागौर जिसमें अभिनेत्री स्नेहलता प्रधान की छोटी बहन का काम लताजी ने किया था. हीरो थे शाहू मोडक.कालांतर में ज़िन्दगी की मुश्किलों से पार पाते हुए लताजी ने क़ामयाबी का जो फ़लसफ़ा रचा वह एक सुनहरी इतिहास है और कोई भी इस गुज़रे वक़्त और उसके अभावों से प्रेरणा लेकर अपनी ज़िन्दगी को नई परवाज़ दे सकता है.

बहरहाल आज लता स्वर उत्सव पर रोशनलाल नागरथ याने संगीतकार रोशन साहब की आमद है.रोशन और मिठास एक दूसरे की पूरक हैं. लताजी ने अपने हर संगीतकार की तरह रोशन सा. को भी पूरे मनोयोग से गाया है. रोशन और लता की जुगलबंदी में जो मधुरता चित्रपट संसार को मिली वह लाजवाब है. रोशन साहब को मिठास का शहज़ादा कहना उचित होगा. बंदिश प्रणयभाव की हो या विरह की वे मेलड़ी को किसी हाल में कुरबान नहीं होने देते. उनकी बंदिशे ऐसा ताज़ा ताज़ा शहद है जो हमारे कान से आत्मा में उतर कर हमें पावन कर गुज़रता है. इसमें कोई शक नहीं कि रोशन की मौसीक़ी में लता नाम की जो नारी प्रकट होती है वह पूजनीय हो गई है. रोशन साहब की धुन को सुनकर मन का चोर मर जाता है और इंसान अपने कपट को छोड़कर फ़िर से वैसा ही भोलाभाला बन जाता है जैसा उसे ईश्वर ने बनाया था. लता मंगेशकर आप न होतीं तो हम भोलेपन को कैसे पहचानते ?
सुनिये ये गीत और बताइये कि बेवफ़ाई के दर्द की जिस बर्नी में पैक किया गया है वह आज कौन से बिग बाज़ार में मिलेगी.



दर्दे दिल तू ही बता
फिल्म : जश्‍न - 1955
संगीत: रोशन लाल नागरथ


लता जी का फोटो के www.timepass69.com सौजन्य से

Monday, September 19, 2011

लता के जोड़ की गायिका हुई ही नहीं :पं.कुमार गंधर्व

चित्रपट संगीत जगत के तीन बहुत क्लिष्ट रचनाकारों की फ़ेहरिस्त बनाई जाए तो सलिल चौधरी,ह्रदयनाथ मंगेशकर के बाद तीसरा नाम बिल शक सज्जाद हुसैन का ही होगा. जैसी क्लिष्ट उनकी धुनें वैसा ही उनकी तबियत. सिवा लता मंगेशकर और नूरजहाँ उन्हें कोई गायिका रास ही नहीं आती थी. मालवा की पूर्व रियासत सीतामऊ (मंदसौर से लगभग ८० किमी दूर) दरबारी सितारियों के परिवार में जन्मे सज्जाद साहब को संगीत घुट्टी मे मिला. सितार,वॉयलिन जैसे कई वाद्यों में सिध्दहस्त सज्जाद हुसैन एक बेजोड़ मेंण्डोलिन वादक के रूप में भी प्रतिष्ठित थे. कहते हैं यह पाश्चात्य साज़ उनके हाथों में आकर कुछ और ही बन जाता था.
praप्रस्तुत गीत में लताजी को जिस मासूमियत से सज्जाद साहब ने गवाया है वह सुनने से ही महसूस किया जा सकता है. श्रोता-बिरादरी आहूत लता स्वर उत्सव में सज्जाद साहब की यह मेलोड़ी लताजी के उस कारनामें की सैर करवाती है जिसमें वे शब्द को श्रेष्ठतम स्वरूप में बरतते हुए कविता पर धुन का वरक़ चढ़ा कर दमका देतीं हैं.

“लता मंगेशकर हमारे विशेषणों के आगे जाकर अपना चमत्कार दिखाती आईं हैं.उन्हें काया माना जाए यही भ्रम जैसा है.उनके कंठ में ईश्वर गाता है. नहीं नहीं;दुख-दर्द,ख़ुशी और माधुर्य जो कि भाव मात्र है,उनके कंठ से गाते हैं.लता में ’अनादि’ख़ुद गाता है,जिसका न ओर है न छोर.बल्कि लता की आवाज़ के रूप में परमात्मा की सुखद लीला है.
-अजातशत्रु



मालवा की सरज़मीन के संगीतकार की चर्चा हो रही हो तो पं.कुमार गंधर्व का स्मरण हो आना स्वाभाविक ही है. श्रोता बिरादरी की श्रोता निधि जैन ने सुनकारों के लिये सन २००४ में नईदुनिया में छपा लताजी पर कुमारजी का एक वक्तव्य भिजवाया है जिसका उपयोग आज की इस बंदिश के साथ करना यानी लता स्वर उत्सव के सुरीलेपन को दोबाला करना है.
कुमारजी कहते हैं ....
“मेरा स्पष्ट मत है कि भारतीय गायिकाओं में लता के जोड़ की गायिका हुई ही नहीं.लता के कारण चित्रपट संगीत को विलक्षण लोकप्रियता प्राप्त हुई. यही नहीं;लोगों का शास्त्रीय संगीत की ओर देखने का दृष्टिकोण भी बदला है. तीन घंटों की रंगदार महफ़िल का सारा रस लता की तीन मिनट की रचना में आस्वादित किया जा सकता है. संगीत के क्षेत्र में लता का स्थान अव्वल दर्ज़े के ख़ानदानी गायक के समान ही मानना पड़ेगा.क्या लता तीन घंटे की महफ़िल जमा सकती है ऐसा संशय व्यक्त करने वालों से मुझे भी एक प्रश्न पूछना है.क्या कोई पहली श्रेणी का कोई गायक तीन मिनट की अवधि में कोई चित्रपट गीत इतनी कुशलता और रसोत्कृष्टता से गा सकेगा.लता मंगेशकर चित्रपट संगीत क्षेत्र की अनभिषिक्त सामाज्ञी है.गानेवाले कई है लेकिन लता की लोकप्रियता इन सब से कहीं अधिक है.उसकी लोकप्रियता के शिखर का स्थान अचल है. ऐसा कलाकार शताब्दियों में शायद एक ही पैदा होता है.”

आज संजोग देखिये इस पोस्ट के बहान मालवा के तीन दिग्गजों का स्मरण हो गया है.लता मंगेशकर (जन्मस्थली:इन्दौर) सज्जाद साहब(सीतामऊ) और कुमार गंधर्व (देवास)


फिल्म सैयां
संगीत: सज्जाद हुसैन


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(अजातशत्रुजी के वक्तव्य लता दीनानाथ मंगेशकर ग्रामोफ़ोन रेकॉर्ड संग्रहालय के प्रकाशन बाबा तेरी सोन चिरैया से साभार एवं फोटो Cineplot से साभार)

Sunday, September 18, 2011

घर आजा मोरे राजा;तेरे बिन चंदा उदास फ़िरे

सन १९५५ की फ़िल्म गरम कोट में अमरनाथ के संगीत निर्देशन में मजरूह साहब का यह गीत पूरब के लोकगीतों की छाप लिये हुए है. संयोग ही हे कि एक बार फ़िर चाँद पर केन्द्रित गीत आपको लता स्वर उत्सव में सुनने को मिल रहा है. ये गीत आपको यादों के उन गलियारों की सैर करवाता है जहाँ गीतों का माधुर्य एक अनिवार्यता के रूप में चित्रपट संगीत का हिस्सा का हुआ करती थी.

चौंकाता है इस गीत में लताजी के स्वर में पत्ती लगना. इस पत्ती लगने को शास्त्रीय संगीत के पण्डित दुर्गुण मानते हैं.इसे पं.ओंकारनाथ ठाकुर और प.कुमार गंधर्व की गायकी में भी सुना गया है और काकू प्रयोग कहा गया है.लेकिन यदि हम शास्त्र की ओर न भी जाना चाहते हैं तो मलिका ए ग़ज़ल बेग़म अख़्तर को सुन लें जिनकी आवाज़ एक ख़ास तरह से फ़टती सुनाई देतीं हैं और अनूठी मिठास का आलोक रचतीं हैं.

“जिसे गाने में बोलना आ जाए वह ज़माने पर छा गया. याद रहे,बातचीत करना गायन नहीं है पर सारा गायन बातचीत की सहजता तक पहुँचने को तरसता है.नये ज़माने के गायक-गायिका समझ लें कि लता ने कभी गाया ही नहीं है. गाने को ’बोला’ है.ख़ुद लता कहतीं हैं ’मुझे बातचीत जितना आकर्षित करती है उतना गाना नहीं’....यही कारण कि लता इफ़ेट को कभी पूरा नहीं समझा जा सकता .बस सुनिये और आनंद से माथा पीटते रहिये...”
अजातशत्रु



कुछ जानकार इसे स्वर में पत्ती लगना भी कहते हैं. और इस सुरीले फ़टने को किसी और शब्द कहने का ज़रिया न होने से कोई और नाम देना भी मुमकिन नहीं है. तो आप ऐसा करें कि इस गीत को सुनते हुए यहाँ हमारी पोस्ट पर निगाह भी रखें. जहाँ जहाँ भी लताजी के स्वर में पती लगी है वहाँ गीत के बोल को आपकी सुविधा के लिये अण्डरलाइन किया गया है.लताजी इतनी सिध्दहस्त गायिका हैं कि गीत की मांग और संगीत निर्देशक अमरनाथजी निर्देशन का मान रखते हुए एक ख़ास जगह पर तीनों अंतरों में एक शब्द विशेष पर पत्ती लगा रहीं हैं. वैसे इस तरह पती का लगना नैसर्गिक रूप से ही संभव होता है. लेकिन यहीं तो लता करिश्मा कर गईं है. इस तरह से स्वर को थोड़ा फ़टा दिखा कर लोक-संगीत की गायकी का स्मरण दिलवाने का प्रयास भी संगीतकार कर रहा है. वह जताना चाहता है भोजपुरी गीतों की परम्परा के अनुरूप ही लताजी का स्वर उस अनूठी मिठास को सिरज रहा है.

लता मंगेशकर माधुरी का अमृत सरोवर है.उसमें डूबकर कुछ भी निकले , ग़रीब कानों की अमीर सौग़ात बन जाता है. बस सुनते रहिये;और बुरे से भले बनते रहिये. लता मंगेशकर ने जो आवाज़ पाई है सो तो पाई है लेकिन उस आवाज़ के आगे उन्होंने जो एक गरिमामय,शास्वत और शालीन नारी ह्र्दय-धन पाया है उसकी नकल नहीं हो सकती. सांरगी के इंटरल्यूड के साथ कोकिल-कंठी लता मंगेशकर को सुनते जाइये और चंदा को घर बुला लीजिये.



घर आजा मोरे राजा, मोरे राजा आजा
तेरे बिना चंदा उदास फिरे
घर आजा मोरे राजा, मोरे राजा आजा, आजा
तेरा नाम लेके रूठे, कहना ना माने मेरा -२
इत उत लेके डोलूँ, चंदा न सोए तेरा, चंदा न सोए तेरा
कि तेरे बिना चंदा उदास फिरे
आजा रे नन्हा तेरा बहले नहीं बहलाए
कुम्हलाया मुखड़ा हाए मोसे न देखा जाए -२
मोसे न देखा जाए
कि तेरे बिना चंदा उदास फिरे
आजा रे अब तो आजा मेरे भी थके दो नैना
अँगना अँधेरा छाया गया दिन आई रैना -२
गया दिन आई रैना
कि तेरे बिना चंदा उदास फिरे
घर आजा मोरे राजा, मोरे राजा आजा, आजा

फिल्म : गरम कोट 1955
संगीत: अमरनाथ
गीत: मजरूह सुल्तानपुरी
कथा: राजेन्द्र सिंह बेदी



(अजाशत्रु का वक्तव्य लता दीनानाथ मंगेशकर ग्रामोफ़ोन संग्रहालय के प्रकाशन लता और सफर के साथी से साभार)

Saturday, September 17, 2011

हमारे बाद महफ़िल में ये अफ़साने बयाँ होंगे

कभी कभी लगता है किसी किसी संगीतकार के अवचेतन में ऐसा भाव भी उमड़ता होगा कि चलो मैं ऐसी एक दो रचना भी बना डालूँ जो मेरे न रहने के बाद ज़माने को मेरी याद दिला कर द्रवित करती रहे.
आज लता स्वर उत्सव में बजने वाला गीत स्वर-कोकिला और संगीतकार मदनमोहन की अनुजा लता मंगेशकर की ओर से अपने प्यारे मदन भैया को पेश की गई ख़िराज ए अक़ीदत है. वस्तुत: यह एक ग़ज़ल है जिसके लिये मदनजी की प्रतिष्ठा जग-ज़ाहिर है. मजरूह सुल्तानपुरी के क़लम से रची गई इस बंदिश को मदनमोहन ने जैसा सिरजा है लताजी उससे कहीं अधिक डूब कर गाया है.इस रचना को सुनते हुए यह भी बताते चलें कि मदनमोहन ने पारम्परिक ग़ज़ल गायकी को फ़िल्म संगीत के रंग में उतारा और उसे अंजाम दिया लता मंगेशकर जैसी अद्वितीय आवाज़ ने.अभिजात्य वर्ग में रहते हुए भी मदनमोहनजी और मौसीक़ी का साथ रूहानी था. उनकी सरज़मीन पंजाब की थी लेकिन संगीत में शिष्टता और गरिमा कूट कूट कर भरी थी.


फ़िल्म बाग़ी में मजरूह को नग़मा-निगार के रूप में सुनना भी एक अनुभव है क्योंकि इसके बाद फ़िल्म दस्तक में की बेजोड़ रचनाओं में एक बार फ़िर लता-मजरूह-मदनमोहन की तिकड़ी ने करिश्मा बरपा है.मदनमोहन की रचनाएँ सुनते हुए राजा मेहंदी अली ख़ाँ और राजेन्द्रकृष्ण का ही स्मरण हो आता है लेकिन बाग़ी की ये ग़ज़ल मदनमोहन की स्मृति में आयोजित होने वाले मजमों में बिन भूले गाई जाती है.

“लता ने जो गा दिया बस वही अल्टीमेट है.इसके आगे कोई नहीं जा सकता.इससे बेहतर कोई नहीं गा सकता.उन्होंने दिल और लगन से जो गा दिया वह आख़िरी नमूना है इस धरती पर.अब लता से हटकर लता की बलना का कोई नया गायक लाना है तो कुदरत को दूसरी लता ही पैदा करे.लता को हम गान-योगिनी कहें तो क्या ग़लत होगा ? - अजातशत्रु


यह मदनमोहन की अपने संगीत के लिये ईमानदारी का तक़ाज़ा ही है कि लता मदन-घराने में कुछ अलग ही सुनाई देतीं हैं. लताजी इस सत्य से बाख़बर थीं कि विकट प्रतिभा,श्रम,चिर-अतृप्ति की आग का दूसरा नाम मदनमोहन है. यह सही भी है क्योंकि अनिल विश्वास के बाद सिर्फ़ मदनमोहन के यहाँ ऐसी करामाती रचनाओं का ख़ज़ाना मौजूद है. लताजी मदनमोहन को गाते वक़्त किसी दूसरी दुनिया की वासिनी सुनाई देतीं हैं. वे मदनजी के गीतों में कुछ अधिक डिवाइन हो गईं हैं.

इस ग़ज़ल को भी लताजी ने समय के पार जाकर गाया है. वे मजरूह के लफ़्ज़ों को अपना स्वर देते वक़्त कहीं दूर आसमान से दर्द ले आईं हैं.मदनजी ने इस गीत के इंटरल्यूड्स में वॉयलिन्स का भराव दिया है. यह रचना वस्तुत:मदनजी के आकाशवाणी से गहन जुड़ाव का दस्तावेज़ भी है क्योंकि सत्तर के दशक तक आकाशवाणी केन्द्रों से इस रंग की अनेकों सुगम संगीत रचनाओं का सिलसिला जारी रहा है.गाना सुनते समय लताजी को फ़ॉलो करते वॉयलिन को भी ध्यान से सुनियेगा;आप महसूस करेंगे कि उसने इस ग़ज़ल के दर्द में इज़ाफ़ा ही किया है.

एक बात विशेष रूप से ग़ौर फ़रमाइयेगा कि मदनजी ने सिर्फ़ दो मतले (अंतरे) इस ग़ज़ल में लिखवाए हैं लेकिन उसका प्रभाव समग्र गीत सा रहा है. रचना सुनते वक़्त ये भी ध्यान दीजियेगा कि स्थायी और अंतरे में मदनजी ने लताजी से क्लिष्टतम मुरकियाँ करवाईं हैं लेकिन मजाल है कि कहीं भी किसी शब्द का दम घुट रहा हो.

मित्रों ! वादा था कि कुछ लोकप्रिय रचनाएँ भी लता स्वर उत्सव में शुमार करेंगे सो साहब मुलाहिज़ा फ़रमाएँ ये ग़ज़ल.बेशक जन्मोत्सव की बेला में इस ग़मग़ीन गीत को बजाने पर कुछ मित्रों को ऐतराज़ हो सकता है लेकिन मक़सद सिर्फ़ इतना सा है कि लता-मदन युग भावपूर्ण स्मरण इस उत्सव में अवश्य हो.

हमारे बाद अब महफ़िल में अफ़साने बयाँ होंगे
बहारें हम को ढूँढेंगी, न जाने हम कहाँ होंगे
बहारें हम को ढूँढेंगी...


इसी अंदाज़ से झूमेगा मौसम गाएगी दुनिया -2
मोहब्बत फिर हसीं होगी, नज़ारे फिर जवाँ होंगे
बहारें हम को ढूँढेंगी, न जाने हम कहाँ होंगे
बहारें हम को ढूँढेंगी...


न हम होंगे, न तुम होगे, न दिल होगा, मगर फिर भी-2
हज़ारों मंज़िलें होंगी, हज़ारों कारवाँ होंगे
बहारें हम को ढूँढेंगी, न जाने हम कहाँ होंगे
बहारें हम को ढूँढेंगी...


फिल्म Baghi (बागी) 1953
संगीत - मदन मोहन
गीत- मज़रूह सुल्तानपुरी




(अजातशत्रुजी के वक्तव्य लता दीनानाथ मंगेशकर ग्रामोफ़ोन रेकॉर्ड संग्रहालय के प्रकाशन बाबा तेरी सोन चिरैया से साभार)
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Friday, September 16, 2011

मन्ना डे के संगीत निर्देशन में लता मंगेशकर

लता स्वर उत्सव में अब तक कोशिश रही है कि कुछ अनसुने या कमसुने गीत सुनवाए जाएँ. आगे कुछ लोकप्रिय गीत भी आपको सुनने को मिल सकते हैं.जो भी गीत आपको सुनवाये जा रहे हैं या हमारी सूची में शुमार हैं उनमें दो चीज़े स्थायी हैं.लता मंगेशकर और मेलडी; वैसे लता और मधुरता बात एक ही है. लताजी की गान-यात्रा की मीमांसा करना हमारे बूते के बाहर है बल्कि किसी के भी लिये भी मुश्किल है क्योंकि गीत बन जाने के बाद उस पर टीका टिप्पणी कर देना बहुत आसान है लेकिन संगीतकार बनकर आसमान में से धुर सिरजना किसी पराक्रम की दरकार रखता है. लता मंगेशकर गीतों को गाते समय आशिंक रूप से ख़ुद एक नायिका का रूप भी धर लेतीं हैं. इस स्वांग में वे कभी विरहिणी हैं,कभी याचक,कभी प्रेमिका,कभी बहन और कभी ज़िन्दगी का फ़लसफ़ा रचतीं एक विदूषी.

आज लता स्वर उत्सव के चौथे दिन जारी किये जा रहे गीत में वे चाँद की उपमा देते हुए अपने प्रेमी को आह्वान कर रहीं है कि “जब तक गगन में चाँद के जगने तक मेरे चाँद तुम मत सोना”. हिन्दी प्रेमल गीतों की भावधारा में पं.भरत व्यास के शब्द एक गरिमामय मादकता पैदा करते हैं. इन शब्दों को सुनें तो आपको लगे कि यह गीत श्रंगार रस का बेहतरीन उदाहरण हो सकता है. तू छुपी है कहाँ, आ लौट के आजा मेरे मीत, आधा है चंद्रमा और तुम गगन के चंद्रमा जैसे हिन्दी गीतों से चित्रपट जगत में एक सम्माननीय गीतकार के रूप में पं. भरत व्यास हम सबके लिये अनजाना नाम नहीं हैं. चाँद या चंद्रमा को केन्द्र में रख कर उनके दो गीतों का उल्लेख तो ऊपर ही हो चुका है

“लता उस स्वच्छमना,कोमल और आदर्श प्रेमिका की याद दिलाती है जिसे अनादि से पुरूष खोजता आया है. लता उस अमूर्त नारी को सिरज देती है जो ब्रह्मरस है, सृष्टि में ईश्वर के होने का दमदार हलफ़नामा है. लता न होतीं तो शायद हमें इतनी शिद्दत से अहसास भी नहीं होता कि यह क़ायनात सत्यं, शिवं, सुन्दरम से भीगी हुई है. प्रणाम लता मंगेशकर; तुम ईश्वर की सबसे पावन भेंट हो.” -अजातशत्रु


आज सुनवाया जा रहा गीत हिन्दी कविता का बेजोड़ नमूना है. इस गीत के शब्दों के अलावा चौंका रहा है दादा मन्ना डे का संगीत संयोजन. हम मन्ना दा के गायन से ही परिचित रहे हैं लेकिन भक्ति-धारा की इस फ़िल्म का यह प्यारा गीत महमोहक है. लता मंगेशकर ने यहाँ भी चिर-परिचित कारनामा किया है और वे अपने संगीतकार की विनम्र अनुगामिनी बन गईं हैं. तुम खोना नहीं पंक्ति के पंच को सुनते हुए आपको लग जाएगा कि ये मन्ना डे की छाप वाली रचना है. गीत की सिचुएशन, कविता और धुन के निर्वाह में सुकंठी लता मंगेशकर इस सृष्टि की शायद सबसे विलक्षण स्वर अभिव्यक्ति हैं. मन्ना दा ने पूरे गीत में मेण्डोलिन का आसरा लिया है.मुखड़े में ही झिलमिल तारे करते इशारे पंक्ति के बाद लताजी का संक्षिप्त सा आलाप आसमान में बिजली सा चमका है. गीत की बंदिश हो या क्लिष्ट; वे संगीतकार की चुनौती पर हमेशा खरी उतरतीं आईं हैं.लताजी अपने समकालीन गायक-गायिकाओं से कुछ आगे इसलिये भी नज़र आतीं हैं कि वे अपनी आवाज़ से शालीनता,कोमलता,स्वच्छता,स्निग्धता,और पवित्रता की अनोखी इबारत रच देतीं हैं. उनको सुनते हुए लगता है कि एक भारतीय नारी किसी तीर्थ-स्थल पर साफ़-सुथरे पाँवों से विचर रही है जिसके तलुवों को अभी तक किसी भी संसारी धूल ने स्पर्श नहीं किया है. आप तो इस शब्द-विलास को छोडिये गीत सुनिये.



गीत: जब तक जागे चाँद गगन में..
फिल्म: शिव कन्या
1954
गीत: भरत व्यास
संगीत: मन्‍ना डे

Thursday, September 15, 2011

तूने जहाँ बना कर अहसान क्या किया है?

लताजी की संगीतयात्रा के गलियारे में जितना पीछे जाओ,मेलोड़ी पसरी पड़ी मिलेगी. श्रोता-बिरादरी के इस मजमें में कोशिश है कि प्रतिदिन एक नये गीत और संगीतकार से आपको रूबरू करवाया जाए. एक घराने में रह कर, तालीम हासिल कर और परम्परा का अनुसरण कर तो कई कलाकारों ने सुयश पाया है लेकिन लताजी अलग-अलग तबियत,तासीर और तेवर वाले गुणी संगीतकारों को सुन कर हर बार करिश्मा कर जातीं हैं. अजातशत्रुजी एक जगह लिखते हैं कि लताजी भीतर से एकदम विरक्त हैं. स्वभाववश भी और बचपन से भुगत चुके तल्ख़ अनुभवों के कारण. असल में लता सिर्फ़ स्वयं से बात करतीं हैं या भगवान से. अजातशत्रुजी की बात की पुष्टि प्रस्तुत गीत से हो जाती है. मुखड़े में ही लताजी परमपिता से शिकायत भरे लहजे या पीड़ा को अभिव्यक्त करते हुए जब गीतकार आई.सी.कपूर की पंक्तियों को स्वर देतीं हैं तो लगता है सारे जहान का दर्द इस आवाज़ में सिमट आया है. तमाम बेबसी,दु:ख की तीव्रता और अपने कष्ट में शिकायतों का बयान क्या ख़ूबसूरती कर गईं है हमारे समय की यह स्वर-किन्नरी.

“सच तो यह है कि इस ज़माने में जब चारों तरफ़ नाउम्मीदी,उदासी और तन्हारी पसरी हुई है और ख़ुशी –चहक की लौ धुँधलाती जा रही है,भले और कोमल गीत दिल को राहत और सुक़ून दे जाते हैं.अतीत के सिनेमा का हम पर यह बड़ा अहसान है”-अजातशत्रु

पंकज राग के सुरीले ग्रंथ (प्रकाशक:राजकमल) में लिखा है कि आज पूर्णत: विस्मृत गोविंदराम एक ज़माने में इतने महत्वपूर्ण संगीतकार थे कि जब के.आसिफ़ ने ’मुग़ल-ए-आज़म’फ़िल्म की योजना बनाई थी तो संगीतकार के रूप में गोविंदराम को ही चुना था. जब के.आसिफ़ साहब ने अपनी तस्वीर का निर्माण शुरू की तब तक गोविंदरामजी इस दुनिया से कूच कर चुके थे. संगीतकार सी.रामचंद्र के काम में सज्जाद साहब के बाद सबसे ज़्यादा गोविंदराम ही प्रतिध्वनित हुए हैं.इस गुमनाम संगीतकार ने १९३७ में फ़िल्म जीवन ज्योति से अपने कैरियर की शुरूआत की. उनकी आख़िरी फ़िल्म थी मधुबाला-शम्मी कपूर अभिनीत नक़ाब (१९५५) जिसमें लताजी के कई सुरीले गीत हैं.

लता स्वर उत्सव के बहाने हम संगीत के सुनहरे दौर की जुगाली कर रहे हैं. इन तमाम गीतकारों,संगीतकारों और लता मंगेशकर के प्रति हमारी सच्ची आदरांजली यही है कि किसी तरह से हम इस अमानत को नये ज़माने के श्रोताओं तक ले जाने का प्रयास करें. इंटरनेट के उदभव के बाद ये थोड़ा आसान हुआ है. सुनकार मित्रों से गुज़ारिश है कि अपने तईं आप भी श्रोता-बिरादरी के इस उत्सव को प्रचारित करें.अपने ट्विटर अकाउंट या फ़ेसबुक दीवार पर इस संगीत समागम का ज़िक्र करें.क्योंकि जब तक यह ख़ज़ाना युवा पीढ़ी तक नहीं पहुँचेगा तब तक इन कोशिशों का अंतिम मकसद पूरा न होगा.



फ़िल्म:माँ का प्यार
वर्ष: १९४९
गीतकार:आई.सी.कपूर
संगीतकार:गोविंदराम


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(अजातशत्रुजी का वक्तव्य लता दीनानाथ मंगेशकर ग्रामोफ़ोन रेकॉर्ड संग्रहालय प्रकाशित ग्रंथ बाबा तेरी सोन चिरैया से साभार)



लता स्वर उत्सव 2011
पहला गीत: वो चाँदनी, वो चाँद वो सितरे बदल गए
दूसरा गीत: रात जा रही है नींद आ रही है

Wednesday, September 14, 2011

मीठी लोरी : रात जा रही है नींद आ रही है

लता स्वर उत्सव के दूसरे दिन और और हिन्दी दिवस प्रसंग पर प्रस्तुत गीत पं.नरेन्द्र शर्मा का जैसे महान हिन्दी सेवी के प्रति श्रोता-बिरादरी की भावपूर्ण आदरांजली है. चित्रपट गीतों में हिन्दी गीतिधारा और विविध भारती जैसे लोकप्रिय संस्थान की स्थापना में पण्डितजी का अवदान अविस्मरणीय है. स्वयं लताजी पण्डितजी को पापाजी जैसा आदर संबोधन देतीं थीं और हिन्दी गीतों के बोलों की अदायगी और उच्चारण के लिये हमेशा मशवरा किया करतीं थीं. इस गीत में लताजी के गायन पर मराठी नाट्य संगीत और नूरजहाँ प्रभाव स्पष्ट सुनाई देता है. रात जा रही है के “है” को जिस खरज से लताजी गा रही हैं वह नूरजहाँ युग की मीठी याद ही तो है. अंतरें में झर रहीं और आदोंलित करने वाली मुरकियाँ मराठी नाट्य संगीत में सदैव सुनाई देती हैं.

“कुदरत ने लता की टेर फ़िल्मों और निर्माताओं के नोटों या पात्र या सिचुएशन के लिये नहीं बनाई. वह ज़माने को राहत बख़्शने के लिये भेजा गया पावन स्वर है”
-अजातशत्रु

मूलत: यह एक लोरी गीत है .इंसानी रिश्तों और भक्ति भाव के गीतों को तो लताजी कुछ अधिक समर्पित भाव से गातीं रहीं हैं.सुनने में लताजी का हरएक गीत आसान सुनाई देता है लेकिन कभी आप उसे आज़मा कर देखें तो महसूस करेंगे कि जो गीत लताजी ने जितनी सरलता से गाया है उसे दोहराना उतना ही कठिन है. लताजी के ऐसे गीतों की महास्वामिनी हैं. इस गीत में पं.नरेन्द्र शर्मा के प्रति भी श्रध्दा से मन जाता है. वे एक समर्थ कवि होते हुए भी चित्रपट गीत माध्यम को कितनी विशेषज्ञता से निभाते हैं.

संगीतकार वसंत देसाई के किसी भी गीत को सुनना यानी शास्त्रीय संगीत के अलौकिक आरोह-अवरोह का आचमन करना है लेकिन वे लोकरूचि को समझने वाले भी बेजोड़ निर्देशक थे. प्रार्थना और राष्ट्र-भक्ति को अभिव्यक्त करने वाले गीतों में वे महाराष्ट्र के लोक संगीत का बखूबी इस्तेमाल करते थे.तीन मिनट की संगीत विधा में जो मधुरता वसंत देसाई ने जगाई है वह हम सुनकारों की अनमोल धरोहर है. संयोग है कि लता स्वर उत्सव के प्रथम एवं द्वितीय दोनों गीतों में गिटार सुनाई दी है.
तो आनंद लीजिये आधी सदी से ज़्यादा लता मंगेशकर;प.नरेन्द्र शर्मा और पं.वसंत देसाई(देसाईजी के नाम के आगे पण्डित लगाना बनता है) की इस इस तिकड़ी से सिरजे गये गीत का.हाँ नेक मशवरा है कि इस गीत को रात्रि बेला में सुने और कुछ देर के लिये भूल जाएँ कि फ़िलहाल कौन सा साल चल रहा है.

फ़िल्म : उध्दार
गीतकार:पं.नरेन्द्र शर्मा
संगीतकार:पं.वसंत देसाई
वर्ष:१९४९

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(एक दुर्लभ चित्र स्मृति : महाराष्ट्र दिवस की प्रस्तुति में साफ़ा बांधे हुए संगीतकार वसंत देसाई और माइक्रोफ़ोन पर लता मंगेशकर.यह चित्र एवं श्री अजातशत्रु की टिप्पणी लता दीनानाथ मंगेशकर ग्रामोफ़ोन रेकॉर्ड संग्रहालय प्रकाशित पुस्तक “बाबा तेरी सोन चिरैया” से साभार)

Tuesday, September 13, 2011

वो चाँदनी वो चाँद सितारे बदल गये !

श्रोता-बिरादरी लता जन्म उत्सव के पहले गीत को पेश करते हुए अभिभूत है. यूँ लताजी के गीत सुनने के लिये किसी ख़ास मौक़े की ज़रूरत नहीं होती. क्योंकि जब यह पावन स्वर गूँज रहा हो तब हमारे कानों में उत्सव की आमद होना ही है. आज जब हम ट्विटर के 140 शब्द वाले युग में प्रवेश कर गये हैं;हमने तय किया कि आपके और लताजी के बीच में शब्दों की दीर्घ औपचारिकता आवश्यक नहीं. 28 सितम्बर तक कोशिश होगी कि श्रोता-बिरादरी अपने सुरीले श्रोताओं के साथ एक से बढिया एक गीत साझा करे. हर रंग का गीत इसमें शुमार करने का इरादा है और प्रति दिन आपको एक अलग संगीतकार की बंदिश सुनने को मिले ऐसा प्रयास रहेगा. इस उत्सव के लिये लिखी जाने वाले पोस्ट्स के अंत में लताजी के गायन और चित्रपट संगीत पर जादुई क़लम चलानेवाले जाने माने स्तंभकार और लेखक अजातशत्रु की टिप्पणी जारी की जाएगी. उम्मीद है अजातशत्रु के शब्द इन इस उत्सव की मधुरता को द्विगुणित करेंगे.

"लता के दर्दीले नग़में कलेजे का माँस तोड़ ले जाते हैं.उनकी कमसिन आवाज़ से जो मार्मिकता पैदा होती है,
हम में यह खेद पैदा करती है कि हाय ! हाय ! हमारे सामने से एक मासूम जीवन बर्बाद हो गया और हम कुछ न कर सके"-अजातशत्रु

लता स्वर उत्सव 2011 प्रथम रचना संगीतकार अनिल विश्वास की है. अनिल दा वह पहले व्यकि हैं जिन्होंने लताजी को मराठी नाट्य संगीत और मलिका-ए- तरन्नुम के प्रभाव से मुक्त किया. अच्छी कविता और उसमें संगीत का विलक्षण प्रभाव अनिल दा की ख़ासियत रही है. यहाँ प्रस्तुत ग़ज़ल प्रेम धवन की रची हुई है
जिनकी अनिल दा के साथ बढ़िया समझ रही. सिने संगीत जगत में अनिल विश्वास का वह दर्जा है जो अदाकारी में अशोककुमार का.दोनो गरिमामय,परिष्कृत और बौध्दिक-मानसिक तौर पर एकदम स्तरीय.अनिल विश्वास के संगीत की सबसे बड़ी ख़ासियत रही है भद्रता,मिठास,मेलोड़ी के साथ कुछ नया और अनोखा रच देने का जुनून. प्रस्तुत गीत में देखिये हवाइन गिटार से उपजा आलाप कैसी बेचैनी पैदा कर रहा है और उसे परवाज़ देती है लताजी की पवित्र आवाज़.



अनिल विश्वास-लता मंगेशकर की जुगलबंदी से उपजे मोतियों की लड़ी में दमकता ये मोती...


फ़िल्म: बड़ी बहू
वर्ष: 1951
गीतकार:प्रेम धवन
(लता दीनानाथ मंगेशकर ग्रामोफ़ोन रेकॉर्ड संग्रहालय प्रकाशित पुस्तक “बाबा तेरी सोन चिरैया” से साभार)
लता जी का फोटो "चन्द्रकांता" से साभार

Wednesday, August 3, 2011

आज पण्डित किसोरदास खण्डवावासी का जन्मदिन है !

किशोर कुमार के बारे में जितनी बात की जाए कम है.वे हँसी और ख़ुशी को विस्तार देने वाले ऐसे सजग कलाकार हैं जिसने ख़ुद अपनी अदाकारी और गायकी का शास्त्र गढ़ा. वे ज़िन्दादिली का पर्याय थे लेकिन कुछ मार्मिक अवसरों पर अपने अभिनय और गायन से रुला देने का हुनर भी रखते थे.

गायक,अभिनेता, निर्माता,संगीतकार के अलावा एक कवि भी था जो किशोर दा में छुपा हुआ था और कुछ कम ही प्रकट हो पाया. कहते हैं दूर गगन की छाँव में फ़िल्म के नग़मे उन्होंने ही लिखे. ज़िन्दादिली उनमें कूट कूट कर भरी थी. एक बार फ़िल्म स्तंभकार और लेखक जयप्रकाश चौकसे ने किशोर दा से पूछा कि फ़िल्म उद्योग उन्हें कंजूस मानता है,क्यों ? किशोर दा ठहाका लगाते हुए बोले क्या कोई कंजूस चार शादियाँ करता है. किशोर कुमार ने चौकसे जी को वह कक्ष दिखाया जिस
में वीडियो कैसेट्स भरीं पड़ीं थी और ये सारी फ़िल्में हॉरर

थीं जो उन्होंने ख़ास तौर पर विदेश से मंगवाईं थीं.कमरे में एक पलंग पर लेट कर किशोर दा इन फ़िल्मों का रसपान करते.ये तब की बात है जब ओरिजनल वीडियो कैसेट्स बहुत महंगे थे.किशोर दा ने चौकसेजी से उन सैकड़ों कैसेट्स को दिखाते हुए पूछा क्या कंजूस आदमी इस तरह ख़र्च करता है. यह चौंकाने वाला सत्य है कि मनमौजी किशोरकुमार को डरावनीं फ़िल्में पसंद थीं.वे कहते थे कि इन फ़िल्मों में भावना का विवेचन बहुत अच्छे ढंग से होता है और तर्कहीनता के कारण डर में से हास्य रस उपजता है. इस तरह की विरोधाभासी बात किशोरकुमार की बलन का कलाकार ही सोच सकता है. हॉरर और हास्य की जुगलबंदी के लिये स्मशान में अलख जगाने वाले कलेजा लगता है.

आइये किशोर कुमार को उनके जन्मदिन पर याद करते हुए उन्हीं की रची इस पान महिमा का आनंद लीजिये और महसूस कीजिये कि कितना विलक्षण कवि इस हरफ़नमौला फ़नक़ार में हर वक़्त मौजूद रहता था.
पान महिमा:
पान सो पदारथ सब जहान को सुधारत
गायन को बढ़ावत जामें चूना चौकसाई है
सुपारिन के साथ साथ मसाल मिले भाँत भाँत
जामें कत्थे की रत्तीभर थोड़ी सी ललाई है
बैठे हैं सभा माँहि बात करें भाँत भाँत
थूकन जात बार बार जाने का बढ़ाई है
कहें कवि ’किसोरदास’ चतुरन की चतुराई साथ
पान में तमाखू किसी मुरख ने चलाई है

-पं.किसोरदास ’खण्डवावासी’
पता:बम्बई बाजार रोड,गाँजा गोदाम के साथ
सामने लायब्रेरी के निकल वाला बिजली खंबा जिसपे लिखा है
डोंगरे का बालामृत

ग़ौर कीजिये कि किस कसावट के साथ इस छंद के अनुशासन निभाया गया है. ऐसा लगता है जैसे किसी धुरंधर कविराज ने इसे रचा है. हास्य का पुट देने वाले के लिये उन्होंने इस कविराज का पता भी किशोरी छटा में ही दिया है.


एक बार किशोर कुमार के गायक-पुत्र अमितकुमार ने बताया था कि
बाबा (किशोर दा) पंचम दा (स्व.राहुलदेव बर्मन) के साथ एक गीत की रिहर्सल कर रहे थे. पंचम दा किसी पंक्ति को गाते और हारमोनियम पर बजा कर सुनाते तो किशोर दा उस संगीत को सुनकर कहते ’केबीएच-केबीएच’ . एक दो बार कह चुकने के बाद पंचम दा से रहा नहीं गया सो पूछ बैठे दादा ये केबीएच क्या है ? किशोर दा बोले देख पंचम तेरी धुन इतनी बढिया है कि हर बार " क्या बात है " कहने को जी चाहता है तो ये थोड़ा लम्बा हो जाता है तो मैंने तेरे लिये ये एब्रीवेशन बना लिया है केबीए़च......देखें तो ये बहुत साधारण बात है..लेकिन एक कलाकार की स्फ़ूर्तता (स्पाँटिनिटि) क्या ख़ूब बयान करती है.
किशोर दा इन्दौर के क्रिश्चियन कॉलेज में अपने सहपाठियों को अर्थशास्त्र में माल्थस का सिध्दांत भी पूरा का पूरा गाकर सुनाते थे.

किशोरकुमार का जन्मदिन इस बात का पुर्नस्मरण भी करवाता है कि हमने जीते जी कलाकारों की क़द्र नहीं की. आज बमुश्किल किशोर दा की लाइव रेकॉर्डिंग्स उपलब्ध हैं. हमारे तकनीकी रूप से समृध्द समय में आज भी दस्तावेज़ीकरण के लिये चिंता नज़र नहीं आती. किशोरदा के इंटरव्यू बमुश्किल मिलते हैं. ऐसी कोई चीज़ें उपलब्ध ही नहीं हो पातीं जिनसे इस बेमिसाल कलाकार की स्मृतियों को ज़िन्दा रखा जा सके. हम किशोरप्रेमियों को उनके गीतों और फ़िल्मों का ही सहारा है जिसके ज़रिये हम उन्हें हम तक़रीबन हर दिन याद कर लेते हैं.

आइये आज श्रोता-बिरादरी की जाजम पर आपको सुनवाते हैं एक दुर्लभ गीत.
सुनिये और दिन भर किशोर दा को याद कीजिये...



गीत: माइकल है तो साइकिल है
गायक: किशोर कुमार एवं आशा भोंसले
फ़िल्म: बेवकूफ़
संगीतकार: एस. डी . बर्मन
गीतकार:
कलाकार: किशोर कुमार एवं माला सिन्हा
वर्ष: 1960
Video Link : http://www.youtube.com/watch?v=_Q4au-j3pts

आज की इस पोस्ट का विवरण म.प्र.संस्कृति संचालनालय द्वारा प्रकाशित स्मारिका "किशोर विमर्श" और नईदुनिया के प्रकाशन "फ़िल्म-संस्कृति" से साभार.
  • इस गीत को हमारे अनुरोध पर अर्चनाजी ने खोज कर हमें इसका लिंक खोज दिया, अर्चनाजी का भी बहुत बहुत धन्यवाद।

Saturday, July 30, 2011

तेरे बगैर-तेरे बगैर


कुछ बरस पहले मदनमोहन के बेटे संजीव कोहली ने उनके अन-रिलीज्ड गानों को एक सीडी में पिरोकर रिलीज़
किया था। इसे नाम दिया गया 'तेरे बगैर'।


इस सीडी में लता मंगेशकर, मोहम्मद रफ़ी, आशा भोसले, तलत मेहमूद और किशोर कुमार के गाए अनमोल गीत हैं। सबसे ज़्यादा चौंकाते हैं दो गीत । एक रफ़ी साहब का गाया हुआ शीर्षक गीत "कैसे कटेगी ज़िंदगी तेरे बग़ैर-तेरे बग़ैर (राजा मेहंदी अली ख़ॉं-१९६५)' दूसरा गीत लताजी ने गाया है बोले हैं "खिले कमल सी काया (इंदीवर-१९७२) 'दोनों गायक महान क्यों हैं यदि जानना हो तो इन दो गीतों को सुनिये और अगर यह समझना हो कि कोई संगीतकार किसी गीत की घड़ावन कैसे करता है तब भी इन दोनों गीतों सुनिये। इन गीतों को सुनने के बाद आपको ये भी अंदाज़ा हो जाता है कि मदनमोहन के भीतर महज़ एक संगीतकार नहीं एक कवि और शायर भी हर पल ज़िंदा रहा। यही वजह है कि जब आप इन दोनों गीतों को सुनते हैं तो समझ में आता है कि कविता को सुरीली ख़ुशबू कैसे पहनाई जाती है।



चूँकि हम इन दिनों रफ़ी उत्सव मना रहें हैं सो आज श्रोता बिरादरी में हम रफ़ी साहब को ख़ासतौर पर याद कर रहे हैं 'तेरे बग़ैर' अलबम के शीर्षक गीत के ज़रिए।

song: kaise kategi zindagi tere bagair.
lyrics: raja mehdi ali khan
singer: mohd. rafi
duration: 4 28


कैसे कटेगी जिन्दगी तेरे बगैर-तेरे बगैर
पाऊंगा हर शै में कमी तेरे बगैर-तेरे बगैर
फूल खिले तो यूँ लगा फूल नहीं ये दाग़ हैं
तारे फ़लक पे यूं लगे जैसे बुझे चिराग हैं।
आग लगायें चाँदनी तेरे बगैर- तेरे बगैर
कैसे कटेगी जिन्दगी-तेरे बगैर-तेरे बगैर
चाँद घटा में छुप गया सारा जहाँ उदास है
कहती है दिल की धड़कने तू कहीं आस-पास है।
आ के तड़प रहा है कि जी तेरे बगैर-तेरे बगैर
पाऊंगा हर शै में कमी तेरे बगैर-तेरे बगैर
कैसे कटेगी जिन्दगी तेरे बगैर-तेरे बगैर

Thursday, July 28, 2011

उनके स्वर ने रचा था सुगम संगीत का शास्त्र


रफ़ी साहब को श्रोता-बिरादरी की संगीतमय स्वरांजलि की दूसरी क़िस्त में आज फ़िर लाए हैं एक सुमधुर ग़ैर फ़िल्मी रचना. जब रफ़ी साहब की आवाज़ को सुनते हैं तो लगता है कहीं दूर से आ रहा ये स्वर हमारी आत्मा का सत्व क़ायम रखने आया है. रफ़ी साहब का एक गीत या ग़ज़ल सुन लो जीवन सँवरा हुआ सा लगता है.क्या विलक्षण गायकी है उनकी कि हम उनको सिर्फ़ सुर का आसरा लेकर मुहब्बत करने लगते हैं.

रफ़ी साहब के आरंभिक कालखण्ड को छोड़ दें तो उनका स्वर अंतिम गीत तक जस का तस सुनाई देता है. हाँ धुन या सिचुएशन या अभिनेता के मूड़ को रिफ़्लेक्ट करते हुए वे अपनी आवाज़ को करिश्माई तरीक़े से बदल ज़रूर लेते हैं. ग़ैर फ़िल्मी रचनाओं में भी वे अदभुत समाँ रचते हैं. कविता या शायरी की पावनता पर क़ायम रहते हुए वे कुछ ऐसा गा गये हैं जो सुगम संगीत की दुनिया के लिये एक शास्त्र सा बन गया है.

रफ़ी साहब तो चले गये लेकिन ..... हमारे दिलों में सुरीले संगीत की एक स्थायी अगरबत्ती जला गये हैं. मुलाहिज़ा फ़रमाएँ ये रचना....



गज़ल: दिल की बात कही नहीं जाती....
शायर: मीर तकी "मीर"
मौसिकी: ताज अहमद खान

रफी साहब का चित्र से साभार

Tuesday, July 26, 2011

श्रोता-बिरादरी पर मोहम्मद रफ़ी का भावपूर्ण स्मरण



३१ जुलाई को हरदिल अज़ीज़ गायक मोहम्मद रफ़ी साहब की बरसी आती है. शायद ही देश का कोई ऐसा भाग हो जहाँ रफ़ी साहब को इस दिन पूरी शिद्दत से याद न किया जाता हो. श्रोता-बिरादरी एक लम्बे अंतराल के बाद आपसे रूबरू है और इसका नेह बहाना बन गये हैं मोहम्मद रफ़ी साहब।

आज से ३१ जुलाई तक प्रतिदिन एक गाना और रफ़ी सा.के जीवन से जुड़ा कोई रोचक तथ्य श्रोता-बिरादरी पर जारी होगा. कोशिश होगी कि इन नग़मों में वे हों जो कम सुने जाते हैं। उम्मीद करते हैं कि एक बार फ़िर श्रोता-बिरादरी अपने सुरीलेपन के साथ आपके मन-आँगन में बनी रहे।

तो आज शुरू करते हैं संगीतकार नौशाद साहब द्वारा सिरजे गये ऐसे शब्दों से महान रफ़ी साहब को समर्पित हैं। जग-ज़ाहिर है कि मो.रफ़ी के करियर को बनाने में नौशाद की धुनों का बहुत बड़ा योगदान है. मुलाहिज़ा फ़रमाएँ:
अल्लाह अल्लाह रफ़ी की आवाज़
रूहे-महमूदो-जान-ए-बज़्मे अयाज़
उसकी हर तान,उसकी हर लय पर
बजने लगते थे ख़ुद दिलो के साज़

महफ़िलों के दामनों में साहिलों के आसपास
यह सदा गूँजेगी सदियों तक दिल के आसपास
मोहम्मद रफ़ी,मोहम्मद रफ़ी,मोहम्मद रफ़ी.



कितनी राहत है दिल टूट जाने के बाद-२
जिंदगी से मिले मौत आने के बाद..
कितनी राहत है....
लज्जते सज़दा-ए-संग-ए-डर क्या कहें
होश ही कब रहा सर झुकाने के बाद
क्या हुआ हर मसर्रत अगर छिन गई
आदमी बन गया ग़म उठाने के बाद
रात का माज़रा फिर से पूछो शमीम
क्या बनी बज़्म पर मेरे आने के बाद
जिंदगी से मिले मौत आने के बाद
शायर: शमीम जयपुरी
संगीत: ताज़ अहमद खान

कल फ़िर मिलते हैं;रफ़ी साहब के एक और लाजवाब गीत के साथ.अल्ला-हाफ़िज़.

चित्र मो. रफ़ी.कॉम से साभार

 
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