Thursday, September 22, 2011

एसजे घराने की धुन में कूकती लता

बरसों बरस सितारा स्टेटस,शोहरत,पैसा और शीर्ष बने रहने का सौभाग्य....यदि यह सब किसी की झोली में एक साथ दमकता दिखाई दे तो समझ लीजिये कि संगीतकार शंकर-जयकिशन की बात हो रही है. दो विपरीत टेंपरामेंट, विरासत, संस्कार और पारिवारिक पृष्ठभूमि से दूध में शकर की तरह एक हो गये शंकरसिंह रघुवंशी और जयकिशन पंचोली की क़ामयाबी का अंदाज़ा सिर्फ़ इस बात से लगाया जा सकता है एसजे की जोड़ी ने किसी समय अभिनेता से ज़्यादा क़ीमत वसूली और एक फ़िल्म के एकाधिक हिट गानों का सिलसिला जारी रखा. इसमें कोई शक नहीं कि दुनिया भर में सत्तर के दशक तक यदि भारत के चित्रपट गीतों को गुनगुना कर याद करने की बारी आई तो एसजे का संगीत ही पहली पसंद होगा.एक माने में कहीं कहीं शंकर-जयकिशन भारत की तहज़ीब के सदाबहार राजदूत हैं. भव्य आर्केस्ट्रा के शौक़ीन एसजे का कोई काम हल्का-पतला नहीं है. उनके यहाँ आकर लता भी ऐसी सुनाई देतीं हैं जैसे वे अपने आराध्य मंगेश देवता के मंदिर से दीपक लगा कर बस बाहर ही आईं हैं और फ़लाँ गीत गा दिया है.वे जब एसजे घराने में गा रहीं होतीं तो प्रणय, विरह, उल्लास, ज़िन्दगी और रिश्तों के गीत अपनी श्रेष्ठता पर होते थे.साजों के ताने-बाने में मजाल है कि मेलड़ी हाथ मलती रह जाए. शंकर-जयकिशन टीम वर्क की एक ऐसी मिसाल गढ़ गये हैं जिसका अनुसरण बाद के सालों में कई जोड़ियों ने किया है.आश्चर्य तब होता है जब वे ड्रम बजवा रहे हों या ढोलक,वॉललिन,बाँसुरी,सितार

लता मंगेशकर की की उस सूझ को सलाम जो शब्दों के पार जाकर उसके मूर्त अर्थ ज़्यादा अमूर्त की ख़ुशबू को पकड़ लेती है.लता की आवाज़ की कोयल हमारे वजूद की अमराई को उत्फ़ुल्ल-प्रफ़ुल्ल कूक से भर देती है.आज के गीत और बीते ज़माने के गीत का मूलभूत फ़र्क़ है मेलडी.वह किस चीज़ और कहाँ बनती है. फ़र्क़ बस इतना सा है कि पहले गीत भीतर को भागता था .आज का आर्केस्ट्रा गाने को डिस्टर्ब कर रहा है-अजातशत्रु

बजवा रहे हों या अपना प्रिय एकॉर्डियन; हर पीस पर उनकी छाप नज़र आती है.लताजी को जिस सप्तक से उन्होंने गवाया है वह करिश्माई ही नहीं अविश्वनीय भी है.शंकर-जयकिशन न केवल अच्छी शायरी और कविता को चुना बल्कि संगीत में भी हर लम्हा नये प्रयोग किये. ग़ौरतलब है कि आपको एसजे के गीतों के अंतरों में अक्सर संगीत का मिज़ाज बदलता हुआ सुनाई देता है.
लता मंगेशकर भी गीत की रचना और धुन के अनुसार अपने कंठ का परिधान तय करतीं हैं.कहीं वे अपनी नायिका के लिये शोख़ बन गई हैं तो कहीं प्रेम की पीड़ा में पगी ऐसी जोगन जो सदियों से विरह की टेर लगा रहीं हैं.एसजे के संगीत में लता यदि आपको ठुमकने पर मजबूर कर सकतीं हैं तो कहीं गीत की इबारत को अपनी आवाज़ के जादू का स्पर्श देते हुए भीतर की यात्रा भी करवा सकतीं हैं.लताजी के पास एक अदभुत स्वर है यह तो जग-ज़ाहिर है और एक सफल गायिका के लिये ज़रूरी भी लेकिन उनके पास सबसे अहम क्वॉलिटी है वह नज़र जो संगीकार, गीतकार, निर्माता, अभेनित्री और गीत की सिचुएशन को पकड़ कर इतिहास रच देती है. इस बात को किसी और गायक के साथ तुलना या अपमान के रूप में न लें लेकिन ये सच है कि लताजी के बाद ऐसी सूक्ष्म दृष्टि परवरदिगार ने सिर्फ़ मोहम्मद रफ़ी को बख़्शी थी.
चलती फ़िरती भाषा में रचा गया ये गाता एसजे के हस्ताक्षर साज़ एकॉर्डियन से शुरू होता है और लताजी के बलखाते – इठलाते सुरों में नहला जाता है. देखा है तुझे कहीं न कहीं-लेकिन कहाँ याद आता नहीं...ऐसी बतियाती पंक्ति को लता-एसजे ही सजा सकते हैं.आइये हम भी बात बंद करें और गीत सुनें...


फिल्म : काली घटा
संगीतकार: शंकर जयकिशन


(अजातशत्रुजी का वक्तव्य लता दीनानाथ मंगेशकर ग्रामोफ़ोन रेकॉर्ड संग्रहालय,इन्दौर के प्रकाशन लता और सफ़र के साथी से एवं फोटो गूगल से साभार)

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