Wednesday, September 28, 2011

लताजी का ८३वाँ जन्मोत्सव और उन्हीं की पसंद के ८३ गीत

दुनिया की सबसे सुरीली आवाज़ आज जीवन के तिरासी वर्ष पूर्ण कर रही है.लता मंगेशकर नाम की इस चलती-फ़िरती किंवदंती ने हमारी तहज़ीब,जीवन और परिवेश को हर रंग के गीत से नवाज़ा है. हम भारतवासी ख़ुशनसीब हैं जिन्हें लता मंगेशकर का पूरा संगीत विरासत के तौर पर उपलब्ध है.

हज़ारों गीतों की ये दौलत उन सुनने वालों की अकूत संपदा है जिस पर कोई भी संगीतप्रेमी समाज फ़ख्र करता है. कोशिश थी कि लता मंगेशकर के जन्मदिन पर अनूठी सामग्री आप तक पहुँचाए. इस बारे में कुछ प्रयास चल ही रहा था कि ज्ञात हुआ कि प्रमुख हिंदी अख़बार नईनिया में देश के बहुचर्चित युवा कवि यतीन्द्र मिश्र द्वारा संकलित उन ८३ गीतों का प्रकाशन हो रहा है जो लताजी द्वारा भी पसंद किये गये हैं. मालूम हो कि यतीन्द्रजी भारतरत्न लता मंगेशकर पर एक पुस्तक लिख रहे हैं.इसके लिये वे लगातार लताजी के बतियाते रहते हैं और प्रकाशन की भावभूमि पर सतत चर्चा चलती है.यतीन्द्रजी ने दीदी की रुचि,उनकी तबियत और ह्रदय के पास रहने वाले ८३ सुरीले मोतियों की गीतमाला तैयार की है जिसे लताजी ने भी व्यक्तिगत रूप से सराहा है. इस सूची को श्रोता-बिरादरी पर जारी करते हुए हम यतीन्द्र मिश्र और नईदुनिया के प्रति साधुवाद प्रकट करते हैं.

जब तक टिमटिमाते तारों की रात रहेगी
झील की हवाओं में उदास गुमसुमी रहेगी
बादलों के पीछे चाँद धुंधलाता रहेगा
चिर किशोरी लता की निष्पाप आवाज़
हम पर सुखभरी उदासी बरसाती रहेगी.
-अजातशत्रु

यह सूची उन गायक-गायिकाओं और संगीतप्रेमियों के लिये अत्यंत महत्वपूर्ण है जो लता मंगेशकर के गीतों में दिलचस्पी रखते हैं. इस सूचि का कालखण्ड विस्तृत है और इसमें लताजी के प्रिय संगीतकारों की धुनों की बानगी भी सुनाई देती है. आशा है लताजी के तिरासीवें जन्मदिन ये सुरीला नज़राना आप संगीतप्रेमी पाठकों के लिये एक अनूठे दस्तावेज़ का काम करेगा.
आज सुनिए कुछ गीत और हाँ कामना भी करें कि सृष्टि के इस मिश्री स्वर को हमारी उमर लग जाए.....

गीत- दर्द-ए-दिल तू ही बता
फिल्म : जश्‍न
संगीतकार: रोशन



गीत: आ प्यार की बाँहों में
फिल्म चाँद ग्रहण ( अप्रदर्शित)
संगीत जयदेव
गीत- क़ैफ़ी आज़मी



लता-८३ और लताजी के पसंद के ८३ गीत
१. आएगा...आएगा आने वाला... (महल) खेमचन्द्र प्रकाश १९४८
२. बेदर्द तेरे दर्द को सीने से लगा के... (पद्मिनी) गुलाम हैदर १९४८
३. हवा में उड़ता जाए मोरा लाल दुपट्टा... (बरसात) शंकर-जयकिशन १९४९
४. साजन की गलियाँ छोड़ चले... (बाजार) श्याम सुंदर १९४९
५. उठाए जा उनके सितम... (अंदाज) नौशाद १९४९
६. तुम न जाने किस जहाँ में खो गए... (सजा) एसडी बर्मन १९५१
७. बेईमान तोरे नैनवा निंदिया न आए... (तराना) अनिल विश्वास १९५१
८. तुम क्या जानो तुम्हारी याद में... (शिन शिनाकी बूबला बू) सी. रामचन्द्र १९५२
९. मोहे भूल गए साँवरिया... (बैजू बावरा) नौशाद १९५२
१०. ए री मैं तो प्रेम दीवानी... (नौ बहार) रोशन १९५२
११. वो तो चले गए ऐ दिल... (संगदिल) सज्जाद हुसैन १९५२
१२. वंदे मातरम्‌... (आनंद मठ) हेमंत कुमार १९५२
१३. जोगिया से प्रीत किए दुख होए... (गरम कोट) पं. अमरनाथ १९५२
१४. ये जिन्दगी उसी की है... (अनारकली) सी. रामचन्द्र १९५३
१५. ये शाम की तनहाइयाँ... (आह) शंकर-जयकिशन १९५३
१६. जादूगर सईंयाँ छोड़ो मोरी बईंयाँ... (नागिन) हेमंत कुमार १९५४
१७. जो मैं जानती बिसरत हैं सैंया... (शबाब) नौशाद १९५४
१८. न मिलता गम तो बरबादी के अफसाने... (अमर) नौशाद १९५४
१९. देखोजी बहार आई बागों में खिली कलियाँ... (आज़ाद) सी. रामचन्द्र १९५५
२०. मनमोहना बड़े झूठे... (सीमा) शंकर-जयकिशन १९५५
२१. आँखों में समा जाओ इस दिल में... (यास्मीन) सी. रामचन्द्र १९५५
२२. गुजरा हुआ जमाना आता नहीं दुबारा... (शीरीं-फरहाद) एस. मोहिन्दर १९५६
२३. रसिक बलमा... दिल क्यूँ लगाया... (चोरी-चोरी) शंकर-जयकिशन १९५६
२४. मैं पिया तेरी तू माने या न माने.... (बसंत बहार) शंकर-जयकिशन १९५६
२५. ऐ मालिक तेरे बंदे हम... (दो आँखें बारह हाथ) वसंत देसाई १९५७
२६. छुप गया कोई रे दूर से पुकार के... (चम्पाकली) हेमंत कुमार १९५७
२७. हाय जिया रोए पिया नहीं आए... (मिलन) हंसराज बहल १९५८
२८. औरत ने जनम दिया मरदों को... (साधना) एन. दत्ता १९५८
२९. आ जा रे परदेसी मैं तो कब से खड़ी... (मधुमती) सलिल चौधरी १९५८
३०. हम प्यार में जलने वालों को... (जेलर) मदन मोहन १९५८
३१. बैरन नींद न आए... (चाचा जिंदाबाद) मदन मोहन १९५९
३२. जाने कैसे सपनों में खो गई अँखियाँ... (अनुराधा) पं. रविशंकर १९६०
३३. बेकस पे करम कीजिए सरकारे मदीना... (मुग़ल-ए-आज़म) नौशाद १९६०
३४. अजीब दास्ताँ है ये... (दिल अपना और प्रीत पराई) शंकर-जयकिशन १९६०
३५. ओ सजना बरखा बहार आई... (परख) सलिल चौधरी १९६०
३६. ज्योति कलश छलके... (भाभी की चूड़ियाँ) सुधीर फड़के १९६१
३७. जा रे जा रे उड़ जा पंछी... (माया) सलिल चौधरी १९६१
३८. अल्लाह तेरो नाम, ईश्वर तेरो नाम... (हम दोनों) जयदेव १९६१
३९. ढूँढो-ढूँढो रे साजना मोरे कान का बाला... (गंगा-जमुना) नौशाद १९६१
४०. दिल का खिलौना हाय टूट गया... (गूँज उठी शहनाई) बसंत देसाई १९६१
४१. एहसान तेरा होगा मुझ पर... (जंगली) शंकर-जयकिशन १९६१
४२. ऐ मेरे दिले नादाँ तू गम से न घबराना... (टावर हाउस) रवि १९६२
४३. कहीं दीप जले कहीं दिल... (बीस साल बाद) हेमंत कुमार १९६२
४४. आपकी नजरों ने समझा... (अनपढ़) मदन मोहन १९६२
४५. पवन दीवानी न माने उड़ावे मोरा... (डॉ. विद्या) एसडी. बर्मन १९६२
४६. जुर्मे उल्फत पे हमें लोग सजा देते हैं... (ताजमहल) रोशन १९६३
४७. रुक जा रात ठहर जा रे चंदा... (दिल एक मंदिर) शंकर-जयकिशन १९६३
४८. लग जा गले कि फिर ये हंसीं रात... (वो कौन थी) मदन मोहन १९६४
४९. ए री जाने ना दूँगी... (चित्रलेखा) रोशन १९६४
५०. जीवन डोर तुम्हीं संग बाँधी... (सती सावित्री) लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल १९६४
५१. तुम्हीं मेरे मंदिर तुम्हीं मेरी पूजा... (खानदान) रवि १९६५
५२. काँटों से...आज फिर जीने की तमन्ना है... (गाइड) एसडी बर्मन १९६५
५३. दिल का दिया जला के गया... (आकाशदीप) चित्रगुप्त १९६५
५४. ये समाँ...समाँ है ये प्यार का... (जब-जब फूल खिले) कल्याणजी-आनंदजी १९६५
५५. सुनो सजना पपीहे ने कहा... (आए दिन बहार के) लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल १९६६
५६. रहें न रहें हम महका करेंगे... (ममता) रोशन १९६६
५७. नयनों में बदरा छाए... (मेरा साया) मदन मोहन १९६६
५८. कुछ दिल ने कहा... (अनुपमा) हेमंत कुमार १९६६
५९. दुनिया करे सवाल तो हम क्या जवाब दें... (बहू बेगम) रोशन १९६७
६०. छोड़ दे सारी दुनिया किसी के लिए... (सरस्वतीचन्द्र) कल्याणजी-आनंदजी १९६८
६१. हमने देखी है इन आँखों की महकती... (खामोशी) हेमंत कुमार १९६९
६२. बिंदिया चमकेगी चूड़ी खनकेगी... (दो रास्ते) लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल १९६९
६३. ना जिया लागे ना... (आनंद) सलिल चौधरी १९७०
६४. बैंया न धरो ओ बलमा... (दस्तक) मदन मोहन १९७०
६५. मेघा छाए आधी रात बैरन बन गई... (शर्मिली) एसडी बर्मन १९७१
६६. रैना बीती जाए श्याम न आए... (अमर प्रेम) आरडी बर्मन १९७१
६७. ठाढ़े रहियो ओ बाँके यार रे... (पाकीजा) गुलाम मोहम्मद १९७२
६८. बाँहों में चले आओ... (अनामिका) आरडी बर्मन १९७३
६९. आज सोचा तो आँसू भर आए... (हँसते जख्म) मदन मोहन १९७३
७०. ये दिल और उनकी निगाहों के साए... (प्रेम पर्वत) जयदेव १९७३
७१. आप यूँ फासलों से गुजरते रहे... (शंकर हुसैन) खय्याम १९७७
७२. ईश्वर सत्य है...सत्यम्‌ शिवम्‌ सुंदरम्‌... (सत्यम्‌ शिवम्‌ सुंदरम्‌) लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल १९७८
७३. सावन के झूले पड़े तुम चले आओ... (जुर्माना) आरडी बर्मन १९७९
७४. सोलह बरस की बाली उमर को... (एक-दूजे के लिए) लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल १९८०
७५. ये कहाँ आ गए हम... (सिलसिला) शिव-हरि १९८१
७६. ऐ दिले नादाँ...आरजू क्या है... (रजिया सुल्तान) खय्याम १९८३
७७. दिल दीवाना बिन सजना के माने न... (मैंने प्यार किया) राम-लक्ष्मण १९८९
७८. मेरे हाथों में नौ नौ चूड़ियाँ हैं...(चाँदनी)शिव-हरि १९८९
७९. यारा सिली सिली...(लेकिन) ह्रदयनाथ मंगेशकर १९९०
८०. सिली हवा छू गई...(लिबास) आर.डी.बर्मन १९९१
८१. दिल हूम हूम करे...(रूदाली) भूपेन हज़ारिका १९९४
८२ माई नी माई मुंडेर पे तीरी...(हम आपके हैं कौन) राम-लक्ष्मण १९९४
८३ लुका छिपी बहुत हुई...(रंग दे बसंती) ए.आर.रहमान २००६
  • अजातशत्रु का वक्तव्य लता दीनानाथ मंगेशकर ग्रामोफ़ोन रेकॉर्ड संग्रहालय,इन्दौर के प्रकाशन बाबा तेरी सोन चिरैया से साभार
  • लता जी का फोटो से fillum साभार

Tuesday, September 27, 2011

मेरी उमर से लम्बी हो गईं,बैरन रात जुदाई की

विलक्षण मौलिकता में पश्चिमि रंग मिला कर कोई संगीतकार कोई नया सोपान रच दे तो समझ जाइयेगा कि ये करिश्मा दादा सचिनदेव बर्मन के हस्ते ही हो रहा है.संगीतकारों की भीड़ में जो व्यक्ति अलग नज़र आता है उसमें बर्मन दा का नाम बाइज़्ज़त शामिल किया जा सकता है. वाद्यों को जिस ख़ूबसूरती से बर्मन दा इस्तेमाल करते हैं वह न केवल चौंकाता है बल्कि एक लम्हा इस बात की तस्दीक की करता है कि छोटे बर्मन या पंचम दा को रचनात्मकता के सारे गुण घुट्टी में ही मिले थे.आर्केस्ट्रा की बेजोड़ कसावट बर्मन दा ख़ासियत है .उन्हें मिली संगीतकार की कुदरती प्रतिभा का ही नतीजा है कि “पिया तोसे नैना लागे रे” से लेकर “सुनो गज़र क्या गाए” जैसी विपरीत मूड की रचनाएँ उनके सुरीरे संगीत की उपज हैं.यह स्वीकारने में संकोच नहीं करना चाहिये कि सचिनदेव बर्मन की मौजूदगी चित्रपट संगीत के समंदर का वह प्रकाश स्तंभ है जिसके आसरे मेलड़ी के दस्तावेज़ रचने की नित नई राह रची गई है.क्लब गीत,लोक गीत और शास्त्रीय संगीत का आधार बना कर बांधी गई धुने सिरजने वाला ये बंगाली राजा पूरे देश में पूजनीय है.

लता तिरासी और तिरासी अमर गीत:
२८ सितम्बर को लताजी का जन्मदिन है.वे ८३ बरस की हो जाएंगी. कल श्रोता बिरादरी की कोशिश होगी कि वह आपको लताजी के ऐसे ८३ सुरीले गीतों की सूची पेश कर दे जो स्वर-कोकिला को भी पसंद हैं.बस थोड़ा सा इंतज़ार कीजिये और ये सुरीला दस्तावेज़ आप तक आया ही समझिये.



आइये अब सचिन दा और लता दी के बीच के सांगीतिक रिश्ते की बात हो जाए.अनिल विश्वास के बाद वे सचिन दा ही हैं जिनके लिये सृष्टि की ये सबसे मीठी आवाज़ नतमस्तक नज़र आतीं हैं.यूँ ये विनम्रता लताजी ने अपने तमाम संगीतकारों के लिय क़ायम रखी लेकिन सचिन दा की बंदिशों में लता-स्वर से जो अपनापा झरता है वह एक विस्मित करता है. लता-सचिन का संगसाथ शुभ्रता,पवित्रता और भद्रता का भावुक संगम हे.

श्रोता-बिरादरी की जाजम पर गूँज रहा नग़मा विरह गीतिधारा का लाजवाब रूपक गढ़ रहा है. छोटे छोटे आलाप और मुरकियों के साथ लता मंगेशकर की गान-विशेषज्ञता की अनूठी बानगी है ये गीत. सन २०११ में जब लता स्वर उत्सव समारोहित हो रहा है तब इस गीत को ध्वनि-मुद्रित हुए ५५ बरस हो चुके हैं और फ़िर भी लगता है कि अभी पिछले महीने ही इसे पेटी पैक किया गया है. कारण यह है कि समय और कालखण्ड बदल गया हो लेकिन घनीभूत पीड़ा के पैमाने नहीं बदले. मोबाइलों,ईमेलों और मल्टीप्लैक्सों के ज़ख़ीरों के बावजूद यादों के तहख़ाने में ऐसी सुरधारा दस्तेयाब है जो आज भी हमारी इंसानी रूहों को झिंझोड़ कर रख देने में सक्षम है. सालों बाद भी ये गीत आप सुनेंगे तो शर्तिया कह सकते हैं कि सचिन घराने का लोभान वैसा ही महकेगा जैसा सन १९५५ में जन्म लेते समय महका होगा. मुखड़े में लम्बी हो गई शब्द में ऐसा लगता है जैसे ये जुदाई सदियों की है. अंतरे में लताजी अपने तार-सप्तक को स्पर्श कर ठिकाने पर किस ख़ूबसूरती से लौट आईं हैं ये जानने के लिये आपको ये गाना दो-तीन बार ज़रूर सुनना चाहिये.
चलिये सचिन देव बर्मन और लता मंगेशकर के इस अदभुत गीत में गोते लगाते हैं.


फ़िल्म : सोसायटी
वर्ष : १९५५
संगीतकार : सचिनदेव बर्मन.

Sunday, September 25, 2011

चित्रपट गीतों का गुमनाम शहज़ादा;जमाल सेन

समय है कि किसी नाक़ाबिल को को झोली भर कर श्रेय देता है और किसी में आकंठ प्रतिभा होने के बाद भी नहीं. राजस्थानी मरूभूमि के बाशिंदे जमाल सेन साहब भी कुछ ऐसे ही थे जिनके साथ वक़्त की बेरहमी में खूब सताया. पर प्रतिभा कब हार मानती है. वे वक़्त के थपेड़ों से बेख़बर मेलडी को सिरजते रहे. आज लता स्वर उत्सव में आज जमाल सेन का भावुक स्मरण कर हम एक तरह से मधुरता को अपना सलाम पेश कर रहे हैं या यूँ कहें श्राद्ध पर्व में उनकी आत्मा की शांति का अर्घ्य दे रहे हैं.
जमाल सेन जी को राज-रजवाड़ों की तहज़ीब विरासत में मिली. नृत्य और राजस्थानी लोक संगीत में पारंगत थे. फ़िल्म संगीत की ओर पैसे के लिये आये लेकिन कभी भी पाप्युलर कल्चर के नाम पर धुनों का कचरा नहीं किया. यदि निष्पक्ष रूप से लता-गीतों का शतक रचा जाय (यथा भतृहरि का श्रंगार शतक) तो निश्चित रूप से जमाल सेन का वह गीत उसमें ज़रूर शामिल होगा जो आप श्रोता बिरादरी की रविवारीय पेशकश है. ख़रामा ख़रामा हम इस उत्सव की समापन बेला की ओर आ रहे हैं तो लाज़मी है कि कुछ ऐसा सुन लिया जाए जो आजकल नहीं सुना जा रहा है. एच.एम.वी के एलबम रैयर जेम्स भी यह गीत शुमार किया गया है. इस विस्मृत से संगीतकार की चर्चित फ़िल्में थीं

शोख़ियाँ,दायरा,अमर शहीद पतित पावन और कस्तूरी. गाने की शुरूआत में पखावज की छोटी सी आमद और बाद में हारमोनियम के ताल पर गूँजता मंजीरा इस गीत के ठेके को समृध्द करता है.शुरूआती दोहे के बाद सितार के छोटे छोटे कट लता का दिव्य स्वर क़यामत ढ़ाता है. सुपना बन साजन आए में सुपना बन को लताबाई ने जैसी फ़िरत दी है वह करिश्माई है. फ़िर दोहरा दें कि जहाँ जहाँ हमारे समय की इस किवंदंती ने सरल गाया है उसे दोहराना कठिन हो गया है.


लता मंगेशकर जिस आवाज़ और जज़्बाती गायिकी को लेकर आईं वह आंइस्टीन के सापेक्षतावाद की विज्ञानिक खोज की तरह युगांतरकारी घटना है.इतिहास के चौराहे पर एक नितांत नया मोड़ या बहती हुई नदी का एक कम्पलीट टर्न-अबाउट.इस आवाज़ में ताज़गी थी.झरने सी खलखलाहट थी.अछूते वन-प्रांतर का पावित्र्य था. लता के कंठ में अनजाने वही किया जो विवेकानंद की वाणी ने पाश्च्यात्य में किया-अजातशत्रु



लता मंगेशकर इस गीत में महज़ एक गायिका नहीं अपने समय की समग्र संस्कृति बन गईं हैं. ख़ूशबू और बेतहाशा ख़ूशबू का वितान सजातीं लता किसी कुंजवन की कोमल सखी सी विचर रहीं हैं इस गीत में. नायिका तो परदे के चलके के साथ ओझल हो जाती है लेकिन ये गीत उसकी मासूम छवि हो हमारे मानस में हमेशा जीवंत बना देते हैं. अजातशत्रुजी एक जगह लिखते हैं कि लता एक अलहदा सी सुवास हैं. अब उसे कोई नाम नहीं दिया जा सकता. पर महसूस किया जा सकता है. यह तत्व अन्य गायक-गायिका में नहीं मिलता. लता के गले में तुलसी की पत्ती है.
लगता है लता जमाल सेन की धुन को पिछले जन्म में सुन चुकीं हैं.वे जिस सहजता से इन शब्दों को अपने कंठ में उतार कर हमारे कानों को संगीत का अलौकिक आचमन करवा रहीं हैं वह हमारे कलुष को धोने के लिये काफ़ी है. इस गीत को सुनते वक़्त लगता है हम मीरा के मंदिर हैं जहाँ वे अपने साँवरे को ये गीत सुनाते सुनाते मोगरे की माला पहना रहीं हैं. अब सुन भी लीजिये ये गीत और लता मंगेशकर को जुग जुग जीने की दुआ दे दीजिये...

Get this widget | Track details | eSnips Social DNA

फिल्म: शोखियाँ
संगीत : जमाल सेन
गीत केदार शर्मा
सोयी कलियाँ हँस पड़ी झुके लाज से नैन,
वीणा की झंकार से तड़पन लागे नैन
सपना बन साजन आये
हम देख देख मुस्काये
ये नैना भर आये, शरमाये-२
सपना बन साजन आये-२
बिछ गये बादल बन कर चादर-२
इन्द्रधनुष पे हमने जाकर-२
झूले खूब झुलाये-२
ये नैना भर आये, शरमाये
सपना बन साजन आये
नील गगन के सुन्दर तारे-२
चुन लिये फूल, समझ अति न्यारे -२
झोली में भर लाये -२
ये नैना भर आये, शरमाये
सपना बन साजन आये
मस्त पवन थी, हम थे अकेले-२
हिलमिल कर बरखा संग खेले-२
फूले नहीं समाये -२
ये नैना भर आये, शरमाये
सपना बन साजन आये


(अजातशत्रु का वक्तव्य लता दीनानाथ मंगेशकर ग्रामोफ़ोन रेकॉर्ड संग्रहालय,इन्दौर के प्रकाशन बाबा तेरी सोन चिरैया से साभार)

Saturday, September 24, 2011

उस्ताद अली अकबर ख़ाँ साहब के साथ सुकंठी लता

शास्त्रीय संगीत लताजी को घुट्टी में मिला है. चित्रपट संगीत से फ़ारिग़ होकर लताजी अपना सर्वाधिक समय क्लासिकल म्युज़िक सुनने में लगातीं आईं हैं. वे ख़ुद भिंडी बाज़ार वाले अमानत अली ख़ाँ साहब की शाग़िर्द रहीं हैं. उन्हें बड़े ग़ुलाम अली ख़ाँ साहब का गायन बहुत पसंद है और वे समकालीन शास्त्रीय संगीत पर सतत नज़दीकी नज़र रखतीं हैं.पं.दीनानाथ मंगेशकर ख़ुद एक समर्थ गायक रहे हैं और ये क़िस्सा तो बहुत बार कहा जा चुका है कि एक बार कोल्हापुर में पण्डितजी अपने विद्यार्थेयों को किसी बंदिश का अभ्यास करने का कह कर कुछ देर के लिये बाहर गये थे और जब लौटे तो देखा बमुश्किल ६ -७ बरस की लता राग भीमपलासी गाकर अपने उम्र में बड़े विद्यार्थियों की क्लास ले रहीं हैं. संभवत: यह पहली घटना थी जब पं.दीनानाथ मंगेशकर को अपने घर में छुपे हीरे की जानकारी मिली और वे उसी दिन से अपनी लाड़ली हेमा(लताजी के बचपन का नाम) को तराशने में जुट गये.

“लता की आवाज़ मीठी शमशीर सी हमारा कलेजा चीरती जाती है और आनंद के अतिरेक से हम कराह पड़ते हैं.मन होता है लता को समूची क़ायनात से छिपाकर,डिबिया में बंद करके सितारों में रख दिया जाए.उनका सिरजा सुख कहाँ बरदाश्त होता है.-अजातशत्रु


आज श्रोता-बिरादरी पर मैहर घराने के चश्मे चराग़ उस्ताद अली अकबर ख़ाँ साहब मरहूम के संगीत निर्देशन में निबध्द फ़िल्म आंधियाँ की रचना सुनवा रहे है.आप जानते ही होंगे कि ख़ाँ साहब मैहर के बाबा अल्लाउद्दीन ख़ाँ साहब के सुपुत्र-शिष्य थे और एक विश्व-विख्यात सरोद वादक. फ़िल्म आंधियाँ के बारे में ख़ाँ साहब ने एक रोचक क़िस्सा सुनाया था कि
जब उन्हे चेतन आनंद ने बतौर संगीत निर्देशक अनुबंधित करने मुम्बई बुलाया तो ख़ाँ साहब ने कहा मैं पहले अपने वालिद साहब से इजाज़त लेना चाहूँगा क्योंकि हम क्लासिकल मौसीक़ी वाले लोग हैं और फ़िल्म संगीत के लिये उनका ऐतराज़ हो सकता है. अली अकबर मुम्बई से मैहर आए और फ़िल्म संगीत के बारे में आज्ञा मांगी. बाबा बोले अली अकबर संगीत देने में तो कोई बुराई नहीं लेकिन मैं चाहूँगा कि तुम एक गीत की धुन बना कर मुझे सुनाओ. अगर मुझे लगा कि ये तुम्हारे बलन का काम है तो ठीक वरना तुम इस फ़िल्म का प्रस्ताव ठुकरा देना.ख़ाँ साहब ने वैसा ही किया. पहला गाना तैयार हुआ. उन दिनों कैसेट रेकॉर्डर जैसा कोई इंतज़ाम नहीं था सो बाबा को मुम्बई लाया गया और स्टुडियो में धुन सुनाई गई.बाबा ने धुन पसंद की और इस तरह से आंधियाँ फ़िल्म का संगीत निर्देशन अली अकबर ख़ाँ साहब ने किया.
लताजी के बारे में रोज़ बात हो रही है सो आज चाहेंगे इस सृष्टि के इस पावन स्वर के बारे में आज कुछ विशेष न कहा जाए और सीधे गीत सुना जाए.महसूस करने की बात ये है कि उस्ताद अली अकबर ख़ाँ साहब फ़िल्म माध्यम में काम कर रहे हैं तो चित्रपट संगीत के अनुशासन से बाख़बर हैं और फ़िर भी अपना जुदा अंग परोस पाए हैं.



फिल्म : आँधियाँ
संगीत: उस्ताद अली अकबर खाँ
गीत : पण्दित नरेन्द्र शर्मा


है कहीं पर शादमानी और कहीं नाशादियाँ
आती हैं दुनिया में सुख-दुख की सदा यूँ आँधियाँ, आँधियाँ -२
है कहीं पर शादमानी और कहीं नाशादियाँ

क्या राज़ है, क्या राज़ है- क्या राज़ है, क्या राज़ है
आज परवाने को भी अपनी लगन पर नाज़ है, नाज़ है
क्यों शमा बेचैन है, ख़ामोश होने के लिये -२
आँसुओं की क्या ज़रूरत -२
दिल को रोने के लिये -२
तेरे दिल का साज़ पगली -२
आज बेआवाज़ है -२
है कहीं पर शादमानी और कहीं नाशादियाँ

आऽहै कहीं पर शादमानी और कहीं नाशादियाँ -२
आती हैं दुनिया में सुख-दुख की सदा यूँ आँधियाँ, आँधियाँ

आईं ऐसी आँधियाँ
आईं ऐसी आँधियाँ, आँधियाँ
बुझ गया घर का चिराग़
धुल नहीं सकता कभी जो पड़ गया आँचल में दाग़ -२
थे जहाँ अरमान -थे जहाँ अरमान
उस दिल को मिली बरबादियाँ, बरबादियाँ
है कहीं पर शादमानी और कहीं नाशादियाँ -२

ज़िंदगी के सब्ज़ दामन में -२
कभी फूलों के बाग़
ज़िंदगी के सब्ज़ दामन में
ज़िंदगी में सुर्ख़ दामन में कभी काँटों के दाग़ -२
कभी फूलों के बाग़ कभी काँटों के दाग़
फूल-काँटों से भरी हैं ज़िंदगी की वादियाँ

है कहीं पर शादमानी और कहीं नाशादियाँ
आती हैं दुनिया में सुख-दुख की सदा यूँ आँधियाँ, आँधियाँ -२
है कहीं पर शादमानी और कहीं नाशादियाँ


(अजातशत्रु का वक्तव्य लता दीनानाथ मंगेशकर ग्रामोफ़ोन रेकॉर्ड संग्रहालय,इन्दौर के प्रकाशन बाबा तेरी सोन चिरैया से साभार)

 
template by : uniQue  |    Template modified by : सागर नाहर   |    Header Image by : संजय पटेल