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Wednesday, December 31, 2008

बाबा तेरी सोनचिरैया जावै अनजाने की डगरिया: श्रोता बिरादरी की वार्षिक पेशकश । लता जी का एक सलोना गीत ।

पिछले कई दिनों से लगातार संदेश आ रहे थे कि श्रोता-बिरादारी क्‍यों निष्‍िक्रिय हो गया । इसे फिर से सक्रिय किया जाए । दरअसल श्रोता-बिरादरी की महफिलें दीपावली के बाद से थोडी अनियिमित हुई हैं पर अब कोशिश यही रहेगी कि इस मंच से सुर लगातार छेड़े जाते रहें । और कुछ ऐसे गाने आपको सुनवाए जाएं जिनकी वजह से श्रोता-बिरादरी आपकी जिंदगी का ज़रूरी हिस्‍सा बन जाए ।

पिछले दिनों मुंबई में जाने-माने रिकॉर्ड संग्रहकर्ता सुमन चौरसिया की पुस्‍तक का विमोचन किया हुआ । सुमन चौरसिया को अगर आप ना जानते हों तो पहले उनका परिचय करा दिया जाए । इंदौर के नज़दीक राऊ के गांव पिगडंबर में रहने वाले सुमन चौरसिया देश के जाने माने रिकॉर्ड संग्रहकर्ता हैं । उन्‍होंने अपना तन मन धन रिकॉर्ड जमा करने में लगा दिया है ।

suman chourasiaसुमन चौरसिया के संग्रहालय से लता जी के अस्‍सीवें जन्‍मदिन पर अस्‍सी गीत चुने गए और जाने माने गीत समीक्षक अजातशत्रु ने उनकी मीमांसा
की । कुल मिलाकर इस पुस्‍तक में साढ़े पांच सौ पेज हैं और है गीतों के इतिहास का अनमोल ख़ज़ाना । अरे मैंने आपको इस पुस्‍तक का नाम तो बताया ही नहीं । 'बाबा तेरी सोनचिरैया' ।

 cover page

जब मुझे इस पुस्‍तक का नाम पता चला तभी से दिमाग़ में घंटी बज रही थी कि हो ना हो ये किसी गाने का मुखड़ा है । आखिरकार इंटरनेट पर खोजा तो ये गीत मिल गया । सन 1956 में आई फिल्‍म आवाज़ का गीत है ये संगीत सलिल चौधरी का है । और गीत शैलेंद्र का । ये फिल्‍म जिया सरहदी ने बनाई थी ।

आईये ये गीत सुनें और वैसे सुनें जैसे सुना जाना चाहिए ।

मुझे लगता है कि ये गीत शैलेंद्र के सिवाय और कोई लिख ही नहीं सकता था । जाने कितने घरों में बेटी को लाड़ से दादा दादी सोन चिरैया और मैना पुकारते रहे हैं । ये हमारी परंपरा का और हमारी मान्‍यताओं का हिस्‍सा रहा है । बेटी की विदाई के कातर पल और उन पलों का उजाड़ दुख, शैलेंद्र बता रहे हैं कि कैसे बेटी के जाने से घर ही नहीं........पनघट ताल तलैया सब सूने हो जायेंगे । सलिल दा ने इस गाने का अद्भुत संयोजन किया है । लगता है हमारे गांव-घर का कोई लोकगीत है जिसके कच्‍चेपन को 'पका' दिया गया है । लता जी की आवाज़ के तो कहने ही क्‍या । जिस तन्‍मयता और जिस इनवॉल्‍वमेन्‍ट से लता जी ने इस गीत को निभाया है उसने इस गाने को अनमोल बना दिया है ।

आईये सुनें और सोचें कि ये गीत 'बाबुल की दुआएं लेती जा' जैसा लोकप्रिय क्‍यों नहीं हआ ।

 

बाबा तेरी सोनचिरैया, जावै अनजाने की नगरिया ।
कौन देस से ये सौदागर आया
सोने का पिंजरा दिखला के मैना को ललचाया
सूने भए पनघट ताल तलैया
बाबा तेरी सोनचिरैया ।।
जान बूझ के दिल का बंधन का तोड़ा
अनजाने से नाता जोड़ा साथ हमारा तोडा
रोवत बहना रोवत भैया
बाबा तेरी सोन चिरैया ।।

Sunday, October 12, 2008

कई किशोर कुमार प्रेमी पहली बार ही सुनेंगे ये मार्मिक ग़ैर फ़िल्मी गीत

बलिहारी हो आपकी सुमन भाई (श्री सुमन चौरसिया) कैसी अदभुत और सुरीली सौग़ात दे दी आपने आज किशोर कुमार प्रेमियों के लिये. सबसे पहले श्रोता बिरादरी के असंख्य श्रोता-पाठकों की ओर से साधुवाद स्वीकारें.उम्मीद है आपसे ऐसे ही कई अनमोल हीरे उपहार के रूप में संगीतप्रेमियों को मिलते रहेंगे.
श्रोता-बिरादरों,  

किशोर कुमार । इस नाम के साथ कौन सी तस्‍वीर उभरती है आपके दिल में । एक मसखरे की । एक खिलंदड़ व्‍यक्ति की । एक ऐसा व्‍यक्ति जो बेहद जिंदादिल था और शरारतों का हिमालय था । जिसके स्‍क्रीन प्रेजेन्‍स के 
सामने अच्‍छे अच्‍छे कलाकार 'नरभसा' जाते थे । ऐसा क्‍यों है कि किशोर कुमार को सामान्‍य श्रोता और दर्शक केवल और केवल हास्‍य-कलाकार के रूप में याद करते हैं । मीडिया में किशोर दा का सही आकलन नहीं किया गया । सभी ने कहा कि वो बहुत मज़ाकिया थे, अपनी तरंग में रहते थे वग़ैरह वग़ैरह । पर उस भाई के बारे में सोचिए जो अपने दादामुनि के कहने पर उनके घर पर गाना गा रहा है 'जिंदगी का सफ़र है ये कैसा सफ़र कोई समझा नहीं कोई जाना नहीं'। दादा मुनि अपनी पत्‍नी के जाने से दुखी हैं । 
जिंदगी के एकाकीपन को महसूस कर रहे हैं । और दादा‍मुनी के जन्‍मदिन पर उन्‍हें अकेला देखकर किशोर उनके घर उनकी फ़रमाईश पर 13 अक्‍तूबर के दिन गा रहा है--'जिंदगी का सफ़र'। ये वही किशोर है जो मुंबई की भागदौड़ से वापस लौटना चाहता है । जिसे फिल्‍म उद्योग के नकली रिश्‍तों से ऊब हो गयी है । जिसे खंडवा पुकार रहा है । पर बंबई उसे रोक रहा है । बंबई और खंडवा की खीचमतान में एक दिन काल अपनी चाल चलता है और किशोर कुमार को ईश्‍वर अपने पास बुला लेते हैं । वही किशोर जिससे दादामुनि अपने जन्‍मदिन पर 'सफर' का वो गीत सुनते थे, 
दादामुनि के जन्‍मदिन को ही दुनिया से गया । कैसी विडंबना थी ये । 

13 अक्टूबर 1987 को किशोर दा हमसे बिछुड़े,यानी कल उनकी बीसवीं बरसी होगी.मित्रों क्या लगता है कि यह हरफ़नमौला और ज़िन्दादिल कलाकार हमारे बीच से अनुपस्थित है.उनके गीतों का जादू ही कहिये कि गुज़रे पच्चीस बरसों में संगीत का रंग,तेवर और मिज़ाज बदल गया होगा लेकिन किशोर कुमार कभी अप्रासंगिक नहीं हुए. ख्यात स्तंभकार और गुज़रे ज़माने के संगीत टीकाकार श्री अजातशत्रुजी एक जगह लिखते हैं.....किशोर कुमार जैसा इंन्टेलीजेंट, अलर्ट,फ़ुर्तीला गायक कलाकार आज तक नहीं हुआ.फ़िल्म आराधना के बाद अगर किशोर कुमार युवावर्ग पर छा गए तो इसलिये कि उनकी आवाज़ में ग़ज़ब का खिलंदड़पन था,ग़ज़ब की उर्जा थी और ग़ज़ब की उन्मुक्तता थी.

आज श्रोता बिरादरी पर सुनाया जा रहा गीत राजा मेहंदी अली ख़ाँ ने लिखा है और संगीतबध्द किया है भोला श्रेष्ठ ने जो अपने ज़माने के लाजवाब अरेंजर थे.उनकी बेटी सुषमा श्रेष्ठ ने एक ज़माने में मम्मी बोलो बोलो...पापा बोलो बोलो,मम्मी को पापा से पापा को मम्मी से प्यार है गाकर धूम मचा दी थी. बाद में यही सुषमा श्रेष्ठ पूर्णिमा के नाम से पार्श्वगायन करने लगीं

बहरहाल किशोर दा ने इस गीत में एक ग़ज़ब का दर्द सिरजा है. निसंदेह इस दौर में के.एल.सहगल और पंकज मलिक का स्वर फ़िजाँओं में गूँज रहा था जिसका असर किशोर दा की आवाज़ पर भी नज़र आ रहा है.सादी सी धुन है जिसके अंतरों में भी एकरूपता है और राजा साहब के शब्द हमेशा की तरह बेजोड़ शायरी का पता दे रहे हैं.लेकिन इस रचना में किशोर कुमार की गायकी अपनी पराकाष्ठा पर है.सनद रहे कि ये किशोर दा की गान-यात्रा के एकदम शुरूआती दौर का गीत है लेकिन दर्द को उकेरने हुनर बेमिसाल है. हाँ ये ज़रूर कहना चाहेंगे कि किशोर कुमार को सुनते वक़्त हमेशा ध्यान रखें कि इस कुदरती कलाकार ने कभी किसी उस्ताद से तालीम हासिल नहीं कि और गली-मुहल्ले के गवैये की तरह शुरूआत कर देश के शीर्षस्थ पार्श्वगायक के रूप में बेहिसाब शोहरत हासिल की.

भूलने वाले मुहब्बत का ज़माना याद कर
आ मेरी उजड़ी हुई दुनिया को फ़िर आबाद कर,


फूल मुरझा हुए हैं और रोती है बहार
जाने वाले ढूँढती है तुझको आँखे बार बार
आँख कहती है कि रो
कहता है दिल फ़रियाद कर

बाग़ में बेताब देखा है बहारों ने मुझे
रात को बेख़्वाब देखा है सितारों ने मुझे
दिल तो ऐसी ज़िन्दगी की क़ैद से आज़ाद कर

याद तेरी जा नहीं सकती दिले बरबाद से
पहले तुझसे थी मुहब्बत अब है तेरी याद से
मेरे अरमानों की दुनिया शौक़ से बरबाद कर



किशोर दर्द की गाढ़ी आवाज़ । किशोर उमंग की उछलती आवाज़ । किशोर प्रेम की उन्‍मत्‍त आवाज़ । कितने रूप थे, कितने रूप हैं किशोर के । किशोर दा....हम तुम्‍हें भूल ना पाएंगे । किशोर दा तुम एक ध्रुव तारे की तरह हमारी तन्‍हाईयों को रोशन करते रहोगे । 

Saturday, October 11, 2008

कल सुनिये किशोर कुमार का एक दुर्लभ ग़ैर-फ़िल्मी गीत

श्रोता-बिरादरी का सौभाग्य है कि जाने माने ग्रामोफ़ोन रेकॉर्ड संकलनकर्ता श्री सुमन चौरसिया के सौजन्य से किशोर कुमार प्रेमियों के लिये एक दुर्लभ ग़ैर-फ़िल्मी रचना
सुनवाने जा रही है. आपकी जानकारी के लिये बता दें कि सुमन भाई म.प्र.की सांस्कृतिक
राजधानी इन्दौर के उप-नगर पिगडम्बर में रहते हैं और तक़रीबन 28,000 ग्रामोफ़ोन
रेकॉर्ड्स के संकलनकर्ता हैं.अभी अभी गए भारतरत्न लता मंगेशकर के जन्म दिन(28 सितम्बर) की पूर्व संध्या पर उन्होंने अपने निवास को लता दीनानाथ मंगेशकर ग्रामोफ़ोन रेकॉर्ड संग्रहालय के रूप में तब्दील कर दिया है. सुमन भाई ने श्रोता-बिरादरी के संगीतप्रेमियों के लिये एक सौग़ात के रूप में यह रचना उपलब्ध करवाई है जिसके लिये आप-हम सभी उनके आभारी है. 13 अक्टूबर को किशोर दा की पुण्यतिथि है सो एक दिन पहले इस रचना को सुनना वाक़ई रोचक होगा.

रविवार 12 अक्टूबर की सुबह के नौ बजे के आसपास श्रोता-बिरादरी ज़रूर तशरीफ़
लाएँ और सुनें ये अनमोल गीत

 
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