Wednesday, September 21, 2011

रोशन-लता की जुगलबंदी का बेजोड़ दस्तावेज़

हमारे अंधेरों और हमारी उदासियों को बेधकर एक महीन आवाज़ पिछली आधी सदी से ज़्यादा समय से हमारे ख़ून और तहज़ीब में शामिल होती जा रही है. लता मंगेशकर को सिर्फ़ एक आवाज़ और नाम की तरह विचारना मुमकिन नहीं. वे एक ऐसा जीवित आश्चर्य हैं जिसमें कई पीढ़ियाँ अपनी आत्मा का अकेलापन ढूंढती है.उस अकेलेपन को जो पीड़ा की पवित्रता में छ्टपटाता रहता है. क्या आप महसूस नहीं करते कि लता को सुनते हुए वक़्त ठहर सा जाता है. इस आवाज़ का आसरा लेकर हमनें अपनी ख़ुशियाँ और ग़म तलाशे हैं. अंधेरों और रोशनी को जिया है.उस ठहरे वक़्त में आवाज़ का एक झरना बह रहा है....लता नाम का झरना. एक स्वर की शक्ल लेकर ये झरना हमें नहला कर पाक़ साफ़ कर रहा है. लता मंगेशकर का पावन स्वर भावनाओं और संवेदनाओं की एक अमूर्त थपथपाहट है , संभवत:पहली और इस सृष्टि की आख़िरी भी.इस स्वर में अतीत की स्मृतियों को पुर्नजीवित करने का अपरिभाषेय सामर्थ्य है, और भविष्य के आकारों को गढ़ने का अदभुत शक्ति भी.

उपरोक्त इबारत स्वर-सामाज्ञी लता मंगेशकर के अमृत महोत्सव(२००४) की बेला में हिन्दी पत्रकारिता की नर्सरी कहे जाने वाले प्रकाशन नईदुनिया में प्रकाशित हुई थी.
इसी परिशिष्ट प्रकाशित इंटरव्यू में लताजी ने कहा था कि उन्हें अच्छी तरह से याद तो नहीं लेकिन ये बात सन १९४२ की है और उन्होनें वसंत जोगलेकर की मराठी फ़िल्म किती हसाल में पहला गाना गाया था.

लता यानी एक निर्मल,स्वच्छ,मासूम स्वर.फ़िर इसी में मिली हुई उनकी अंदरूनी और सहज छवि,जो किसी वनकन्या या आश्रमबाला की है,गीत को इस दुनिया की चीज़ नहीं रहने देती. सब स्वच्छ और पवित्र हो जाता है.इसके अलावा वे शब्द की आत्मा को पूरा जज़्ब क्र लेतीं हैं और गीत के बजाय उसके भाव को गाती हैं.
-अजातशत्रु

तब लताजी के बाबा पं.दीनानाथजी ज़िन्दा थे और बहुत परम्परावादी व्यक्ति थे. वे लड़कियों के स्टेज और फ़िल्म में काम करने को बहुत बुरा मानते थे. लताजी बतातीं हैं कि पिताजी के अनुशासन के कारण घर में स्‍नो पाउडर तक लाने की इजाज़त नहीं थी. किती हसाल के लिये दीनानाथ के बड़ी मुश्किल से अनुमति दी थी और उसके बाद उनकी मृत्यु हो गई.बाद में मंगेशकर परिवार के हालात कुछ ऐसे बने कि लताजी को फ़िल्मों में काम करने आना पड़ा और पहली फ़िल्म थी पहली मंगळागौर जिसमें अभिनेत्री स्नेहलता प्रधान की छोटी बहन का काम लताजी ने किया था. हीरो थे शाहू मोडक.कालांतर में ज़िन्दगी की मुश्किलों से पार पाते हुए लताजी ने क़ामयाबी का जो फ़लसफ़ा रचा वह एक सुनहरी इतिहास है और कोई भी इस गुज़रे वक़्त और उसके अभावों से प्रेरणा लेकर अपनी ज़िन्दगी को नई परवाज़ दे सकता है.

बहरहाल आज लता स्वर उत्सव पर रोशनलाल नागरथ याने संगीतकार रोशन साहब की आमद है.रोशन और मिठास एक दूसरे की पूरक हैं. लताजी ने अपने हर संगीतकार की तरह रोशन सा. को भी पूरे मनोयोग से गाया है. रोशन और लता की जुगलबंदी में जो मधुरता चित्रपट संसार को मिली वह लाजवाब है. रोशन साहब को मिठास का शहज़ादा कहना उचित होगा. बंदिश प्रणयभाव की हो या विरह की वे मेलड़ी को किसी हाल में कुरबान नहीं होने देते. उनकी बंदिशे ऐसा ताज़ा ताज़ा शहद है जो हमारे कान से आत्मा में उतर कर हमें पावन कर गुज़रता है. इसमें कोई शक नहीं कि रोशन की मौसीक़ी में लता नाम की जो नारी प्रकट होती है वह पूजनीय हो गई है. रोशन साहब की धुन को सुनकर मन का चोर मर जाता है और इंसान अपने कपट को छोड़कर फ़िर से वैसा ही भोलाभाला बन जाता है जैसा उसे ईश्वर ने बनाया था. लता मंगेशकर आप न होतीं तो हम भोलेपन को कैसे पहचानते ?
सुनिये ये गीत और बताइये कि बेवफ़ाई के दर्द की जिस बर्नी में पैक किया गया है वह आज कौन से बिग बाज़ार में मिलेगी.



दर्दे दिल तू ही बता
फिल्म : जश्‍न - 1955
संगीत: रोशन लाल नागरथ


लता जी का फोटो के www.timepass69.com सौजन्य से

1 टिप्पणियाँ:

Lavanya Shah said...

poora article padha aur ab geet sun rahee hoon - lajawaab post ke liye dhanywaad - pehlee baar suna ye rare geet . Roshan saa'b ke kya kehne ... Wah !

 
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