Saturday, September 27, 2008

लता/८०: स्वर उत्सव: कैसे दिन बीते कैसे बीती रतियाँ, पिया जाने ना- पण्डित रविशंकर

मित्रों, श्रोता बिरादरी का लता/८० स्वर उत्सव अपने आखिरी पड़ाव पर पहुंच रहा है। आज चौहदवीं कड़ी में हम आपको एक ऐसे संगीतकार का गीत सुना रहे हैं जो मूल रूप से फिल्म-संगीतकार नहीं हैं । बल्कि विख्‍यात सितार वादक हैं । जी हाँ आज का गीत संगीतबद्ध किया है सुप्रसिद्ध सितारवादक भारत रत्न पण्डित रविशंकर ने ।
पण्डित रविशंकर ने मात्र तीन फिल्मों में संगीत दिया अनुराधा, गोदान और मीरा । अनुराधा के दो गीतों में मन्ना डे ने अपना स्वर दिया बाकी के सारे गीत स्वयं लताजी ने ही गाये।
आज हम आपको अनुराधा फिल्म का ही एक गीत सुनवाने जा रहे हैं जिसे पंडितजी ने राग मांज खमाज में ढ़ाला है। यह कुछ कुछ विरह गीत सा है। जैसा कि आप गीतों की महफिल में इस फिल्म की समीक्षा ( फिल्म समीक्षा: अनुराधा 1960) में पढ चुके है कि फिल्म के नायक निर्मल चौधरी एक डॉक्टर है और उन्हें दिन रात अपने मरीजों की ही चिन्ता लगी रहती है। उनके पास अपने परिवार के साथ बिताने के लिये समय है ही नहीं। उनकी पत्नी अनुराधा भी एक कलाकार है/थी।

इस बात के लिये अनुराधा को अपने पति से ज्यादा शिकायत नहीं पर कई बार वह आहत हो जाती है और ऐसे में एक दिन एक दुर्घटना में घायल हो कर दीपक (अभि भट्टाचार्य) उनके घर आते हैं। दीपक अनुराधा को चाहते थे और अनुराधा के पिता दोनों का विवाह भी करना चाहते थे पर विवाह नहीं हो पाता। ऐसे में दीपक अनु को गीत गाने के लिये बाध्य करते है और अनुराधा गीत में ही अपने पति से शिकायत करती है कि कैसे दिन बीते कैसे बीती रतियाँ पिया जाने ना... लेकिन कितनी शालीनता से, शिकायत तो है पर इस शिकायत में कटाक्ष या नाराजगी का पुट पहीं है। शिकायत में भी प्रेम ही छलकता है।

लताजी ने पण्डितजी के संगीत के साथ पूरा न्याय किया और ऐसा माहौल उतपन्न करने में सफल रही कि गीत सुनने वाले( देखने वाले नहीं) भी यह महसूस करने लगते हैं कि वाकई नायिका की शिकायत कितनी सही है।
नायिका कहती है रुत मतवाली भी आ कर चली जाती है पर मेरे मन की तो मेरे मन में ही रह जाती है, और शैलेन्द्र साहब के शब्दों की खूबसूरती देखिये, कजरा ना सोहे, बदरा ना सोहे.. नायिका को काजल और बादल कुछ भी अच्छा नहीं लग रहा, और आगे नायिका कहती है कि जब मेरी सहेलियाँ मेरी उदासी का कारण पूछेंगी तो मैं उन्हें क्या कहूंगी?...श्रोता बिरादरी लता उत्‍सव के ज़रिए आपको समय के साथ बदलती लता जी की आवाज़ से भी अवगत करा रही है । हैरत ये होती है कि अलग अलग गानों में लता जी के स्‍वर में अदभुत बदलाव नज़र आता है बल्कि कहें कि सुनाई देता है । लता जी जब इस गाने को गाती हैं तो हमें लगता है मानो लता नहीं बल्कि अनुराधा गा रही है । वो अनुराधा जिसकी मन:स्थिति को कोई नहीं समझता है ।
इस गाने को सुनिए और महसूस कीजिए कि कितना दुर्लभ संगम है ये पंडित रविशंकर, शैलेंद्र और लता जी का ।


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हायऽऽऽ
कैसे दिन बीते कैसे बीती रतिया
पिया जाने ना, हाय

नेहा लगा के मैं पछताई
सारी सारी रैना निन्दिया न आई
जान के देखो मेरे जी की बतिया
पिया जाने ना, हाय
कैसे दिन बीते ......

रुत मतवाली आ के चली जाये
मन में ही मेरे मन की रही जाये
खिलने को तरसे नन्ही नन्ही कलियाँ
पिया जाने न, हाय
कैसे दिन बीते .......

कजरा न सोहे गजरा न सोहे
बरखा न भाये बदरा न सोहे
क्या कहूँ जो पूछे मोसे मोरी सखियाँ
पिया जाने न, हाय

कैसे दिन बीते कैसे बीती रतिया
पिया जाने न


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चित्र ट्रिब्यून इण्डिया से साभार

3 टिप्पणियाँ:

दिलीप कवठेकर said...

My misfortune indeed.Not able to hear this song.

I am still taking full aaswaad of tis song!!How come?

Have you tried this ? Just imagine the song with its notations with orchestra and read the lyrics!!

You will certainly create that magic resonating in your ears, in your soul.Great listening.

Ravishankar is one of the greatest musician/magician of sur. His sense of rythem and its variety is also unparallel.

Credit of the orchestrisation should also go to his equally talented peer, Ragunath Seth, who has arranged music for this song!!

Harshad Jangla said...

Great song with great music and exclusive voice of Didi.
Thanx.

-Harshad Jangla
Atlanta, USA

दिलीप कवठेकर said...

अब कहीं जाकर यह गाना सुनने की मुराद पूरी हुई.

आपने सुना ही होगा. एक उच्च कोटि का संगीतकार, उतने ही बलन का अरेंजर, मगर कहानी के डिमांड के अनुसार, बडे सीमित इंटरल्युड से यह गाना पेश किया गया है.

भाव पक्ष से भरपूर इस गीत का USP है इसके बोल, जिसमें नायिका के विरह और मजबूरी को सुरों के लालित्य से आप और हम स्वयं भोगते है.

बांसुरी की संक्षिप्त हारमोनी से शुरु किये गये इस गीत में तबला भी अपेक्षा से थोडा अधिक वेग (tempo)से बजाया गया है,जो दिन और रात के जल्दी जल्दी बीतने का संकेत सुरों के माध्यम से हमारे अंतरमन में बुनता है.(ऐसी बांसुरी की हारमोनी हम अक्सर सलिलदा के वाद्य रचना में सुनते आये है)

दूसरे अंतरे में एक और संकेत आया है. नायक और नायिका के मिलन नही हो पाने की एक और पीडा शैलेंद्र जी व्यक्त की है.मतवाली रुत के व्यर्थ जाने और नन्हे बच्चों की आस की वेदना को यहां बडे ही शालीन और अपरोक्ष रूप से नायिका के मन से लिकल कर होंठों पर लाया गया है.
(आज की पीढी़ चकरा जाये..)
वाह, शैलेन्द्र और वाह रविशंकर और अंत में वाह वाह लता!!

 
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