Sunday, September 7, 2008

आशाजी आपको क्या कहें - स्वर-किन्नरी या एक मीठा शर्बत ?


पिचहत्तर की पायदान आकर उस स्वर का मीठापन जस का तस है. क्या कहें उन्हें स्वर-किन्नरी या मीठा शर्बत.जीवन के तमाम संघर्ष,प्रतिस्पर्धा और बेकसी को धता बतातीं आशा भोंसले ने भरपूर जीवन जिया है. उनके स्वर यात्रा को देखें तो उसमें कभी किसी क़िस्म का नैराश्य नज़र नहीं आता. वे अपने नाम के अनुरूप आशा जगाती एक रोशन मुस्तक़बिल गढ़तीं नज़र आतीं है. उनके तमाम गीतों को सुनें और गुनें तो तसदीक होती है इस बात की किसिम किसिम की कविता और धुन को आवाज़ देने वाली पिचहत्तर बरस की आशा भोंसले में एक मासूम सी बच्ची हमेशा ज़िन्दा रही है.

आशाजी के स्वर-वैभव को रेखांकित करते हुए बहुत लम्बा लिखा जा सकता है लेकिन श्रोता-बिरादरी की रिवायत के मुताबिक कलाकार के गीत को सुनकर ही हम अपने मन की व्याख्या को गढ़े तो बेहतर.

आज सुना जा रहा गीत फ़िल्म जागते रहो का है.गीतकार हैं शैलेंन्द्र और संगीतकार सिरजा है सलिल चौधरी ने.सिचुएशन वही साहेब बीवी और ग़ुलाम वाली है. शराबी पति अंतराल के बाद घर लौटे हैं और पत्नी उन्हें बहलाने के लिये उन्हीं की फ़रमाइश पर एक गीत गाने के लिये विवश हैं.शैलेंद्र ने नारी के दर्द को हमेशा अपने क़लम से एक बेजोड़ अंदाज़ में रचा है और गाते वक़्त तो आशाजी एक तपस्विनी गृहिणी बन कर उभरीं हैं.साज़ों का बेजा इस्तेमाल सलिल चौधरी के घराने में वर्जित है.बास गिटार के साथ वॉयलिन,बाँसुरी,सारंगी,साइड रिद्म में स्टिक और सुरीला मंजीरा कैसा सात्विक मंज़र रच रहा है.

गाने की शुरूआत आशा के आलाप से होती है और फिर वायलिन की विकल स्‍वरलहरी पर सवार गाना सीधे आपके कलेजे पर असर करता है । आमतौर पर बहुत ही 'लाउड' गीतों से पहचानी जाने वाली आशा के कंठ की कोमलता इस तरह के गानों में खूब उभरती है । आशा जी ने अपने कंठ से‍ जितने प्रयोग किये हैं वो अन्‍यत्र दुर्लभ हैं । यक़ीन मानिए उतने प्रयोग लता जी ने भी नहीं किये । इस गाने की रफ्तार मद्धम है और भावों का प्रवाह सघन । ये रहे इस गाने के बोल

ठंडी ठंडी सावन की फुहार
पिया आज खिड़की खुली मत छोड़ो
आवे झोंके से पगली बयार
पिया आज बाती जली मत छोड़ो
पिया आज खिड़की ।।

दिये की ज्‍योति अंखियों में लागे
पलकों पे निंदिया सवार
पिया आज बाती जली मत छोड़ो
पिया आज खिड़की ।।

पपीहे ने मत की अग्नि बुझा दी
प्‍यासा रहा मेरा प्‍यार
पिया आज बाती जली मत छोड़ो
ठंडी ठंडी ।।

इतना जबर्दस्‍त एक्‍सेप्रसिव और इतना छोटा गाना है ये । कुल तीन मिनिट पैंतालीस सेकेन्‍ड का ।
बाती सी काँपती आशाजी आवाज़ दिल पिघला देती है.यहाँ मुखड़े में ठंडी ठंडी सावन की फ़ुहार में सिर्फ़ की पर ग़ौर करियेगा,एक की शब्द पर ठहर कर ठंड को आशाजी ने जो एक अतिरिक्त एक्स्प्रेशन दिया है बस वही इस सर्वकालिक महान गायिका की ताक़त है. सलिल दा ने तो धुन सुना दी होगी,शैलेंद्रजी ने गीत के शब्द दे दिये होंगे लेकिन ये जो अतिरिक्त खेल आशाजी ने किया है उसे सुनकर तो धूनी रमाता जोगी भी उठकर संसार में लौट आए.भारतीय नारी की अस्मिता,उसके समर्पण भाव और अपने घर-संसार के प्रति उसकी प्रतिबध्दता को जी गईं हैं आशा भोंसले.हमारे घर-आंगन की बहू बेटियों का अखंड स्वर हैं आशाजी.वह इस गीत में हाड़-मांस की आशा से ऊपर उठकर विरह की देह बन गईं हैं और शैलेंद्र और सलिल चौधरी के हाथ थामकर हमारे दर पर आ खड़ी हुईं हैं.

चलते चलते दो बातें
शंभु मित्रा और अमित मित्रा ने फिल्‍म 'जागते रहो' की पटकथा लिखने के साथ साथ इसका निर्देशन भी किया था ।
भारत की सार्थक-फिल्‍मों में सरताज माने जाने वाली इस फिल्‍म के संवाद थे ख्‍वाजा अहमद अब्‍बास के और छायांकन राधू करमाकर का था । सन 1957 में इस फिल्‍म को कार्लोवी वेरी अंतरराष्‍ट्रीय फिल्‍म समारोह में ग्रां प्री से सम्‍मानित किया गया था ।


दूसरी बात ये कि इस हफ्ते संगीतकार सलिल चौधरी और गुलाम हैदर दोनों की पुण्‍यतिथि थी । श्रोता-बिरादरी दोनों को नमन कर रही है । गुलाम हैदर के बारे में फिर कभी तफ्सील से बातें करेंगे ।

7 टिप्पणियाँ:

अमिताभ मीत said...

क्या बात है भाई. सुकूनबख्श. कर्णप्रिय. बहुत ही मीठी धुन .... आशा जी को कुछ कहने के ज़रूरत है क्या ? कुछ न कहें बस डूब जाएँ इस मधुर आवाज़ में .....

पारुल "पुखराज" said...

"kaahey ko byaahi bides" isi dhun sa hai...baar baar yaad aa rahaa hai...saath hi behtreen post ke liye aabhaar..

Udan Tashtari said...

बहुत आनन्द आया. आभार.

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` said...

श्रोता बिरादरी की सँगीत गँगा से हम सभी को जो तृप्ति व आनँद मिलता है उसके लिये आपका आभार और आशा जी आप जीयेँ और गाती रहेँ .
.शतम्` जीवेन शरद:
(the B/W Pic. of asha ji's is simply specataculer !!)
स स्नेह,
- लावण्या

Sajeev said...

कमाल है इतने गीत सुने हैं बचपन से अब तक, पर कुछ गीत आप लोग ऐसे ला देते हैं जो या तो पहले कभी नही सुने या फ़िर इतने ध्यान से कभी नही सुने, आपको पढने के बाद गीत सुनना और भी सुखद लगता है, आशा जी को जन्मदिन की बधाई

siddheshwar singh said...

यह गीत पहली बार सुना,
गाना जबरदस्त और अपन मस्त !
और आशा जी की तस्वीरें- बहुत सुंदर!

Manish Kumar said...

asha ji ki aawaz ke kya kahne...bahut pyara geet sunvaya aapne

 
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