Thursday, September 25, 2008

लता/८० : स्वर उत्सव : संगीतकार शंकर-जयकिशन की अदभुत रचना.



आर.के बैनर के बाहर जाकर भी अपने सुरीलेपन को साबित करने वाली संगीतकार जोड़ी शंकर-जयकिशन आज स्वर उत्सव की मेहमान है. सुर-देवी लता मंगेशकर का ८० वाँ जन्मदिन अनक़रीब है और श्रोता-बिरादरी द्वारा चलाया गया यह आपकी प्रेमपूर्ण प्रतिक्रियाओं के प्रति नतमस्तक है. हमें कभी भी टिप्पणियों का लालच नहीं रहा है और हम मानते रहे हैं कि एक बड़ा संगीतप्रेमी वर्ग ऐसा है जो इन कालजयी रचनाओं को सुनकर उससे उपजे आनन्द को पीना और कहीं भीतर ही आनंदित होना चाहता है. आइये शंकर-जयकिशन (एस.जे)की बात कर लें.
राग भैरवी के अदभुत चितेरे एस.जे शंकरसिंह रघुवंशी और जयकिशन पंचोली अपने जीवन-काल में ही एक जीते-जागते युग बन गये थे. एस.जे का संगीत अवाम का संगीत तो था ही क्योंकि राज कपूर जैसे जनता के लाड़ले कलाकार और उनका क़रीबी संगसाथ था.लेकिन साथ ही यह भी कहना चाहेंगे कि शास्त्रीय संगीत के लिये जब जब भी कोई स्थान निकला एस.जे अपने बेस्ट फ़ार्म में नज़र आए.इस बात की पुष्टि के लिये १९५६ में बनी फ़िल्म बसंत-बहार के रूप में एक ही उदाहरण काफ़ी है.

एस.जे के पूरे संगीत में से यदि लताजी को निकाल दिया जाए तो वह बेसुरा सा प्रतीत होगा. इस जोड़ी ने लताजी के साथ ऐसी रचनाएं सिरजीं जो फ़िल्म संगीत का महत्वपूर्ण दस्तावेज़ है. एस.जे ने आर्केस्ट्रेशन में भव्यता के नये सोपान रचे. वॉयलिन,सितार,ढोलक,बाँसुरी के साथ एकॉर्डियन का खूबसूरत इस्तेमाल इस जोड़ी ने किया.साथ ही क्लेरोनेट,चैलो,मेण्डोलिन भी एस.जे के संगीत में बहुत मधुर सुनाई दी है. लेकिन यह भी महसूस कीजियेगा कि यदि श्रोता-बिरादरी की बिछात पर आज बज रहे गीत बड़े आर्केस्ट्रा की ज़रूरत नहीं है तो नहीं है . ज़रूरत के मुताबिक एस.जे नें यहाँ एकदम सॉफ़्ट धुन सिरज दी है.

शंकर-जयकिशन जैसे गुणी संगीतकारों के बारे में यह जानना भी रोचक होगा कि कुछ ही गीत हैं जो दोनो ने मिल कर बनाए हैं. वे दोनो काम को आपस में बाँट लिया करते थे और अपनी अपनी धुनो को रचते थे. हाँ किसी भी हालत में रेकॉर्डिंग साथ मिल कर ही करते.लताजी से जिस तरह से इस जोड़ी ने कोमल स्वरों (माइनर नोट्स)का उपयोग करवाया है वह विलक्षण है.फ़िल्म सीमा के लिये लिखे गये इस गीत में शैलेन्द्र एक बार फ़िर चित्रपट के सूर-मीरा बन कर अपनी क़लम से शास्त्रीय संगीत की ऐसी बंदिश रच गए हैं कि उनके चरन पखारने को जी चाहता है
आज स्वर उत्सव में शंकर-जयकिशन की रची फ़िल्म सीमा (बलराज साहनी-नूतन)बंदिश मन मोहना बड़े झूठे राग जैजैवंती में है. मज़ा देखिये कि एक चित्रपट गायिका होने बावजूद शास्त्रीय संगीत को गाने की समर्थता को कैसे साबित किया है लताजी ने. एक छोटे से आलाप के साथ ली गई आमद जैसे मन के भीतर तक उतर जाती है.कहते हैं शंकर स्पाँटेनिटि के बेजोड़ खिलाड़ी थे. जैसे इसी गीत में देखिये उत्पात मचाती नायिका का जब ह्र्दय परिवर्तन हुआ हो तो कैसी बंदिश रची जाए.ये भी सिचुएशन है कि नायक बलराज साहनी और नूतन के बीच एक आत्मीयता पनपी सी दिखाई दे रही है और फ़िल्म सीमा का जो कथानक है उस हिसाब से हीरो-हिरोइन को झाड़ के नीचे तो नहीं नचाया जा सकता. दिग्दर्शकीय कौशल को संगीतकार कैसे विस्तार दे सकता है उसका नमूना है यह गीत.मन मोहना बड़े झूठे यह मुखड़ा अपेक्षाकृत नीचे स्वर से शुरू हुआ है कारण यह भी है कि आगे अंतरे में स्वर को तार सप्तक भी ले जाना है. लताजी का पीछा करती सारंगी भी एस.जे के संगीत कौशल की ही करामात है.शास्त्रीय गायन में अमूमन सारंगी और हारमोनियम ही इस्तेमाल होता है सो यहाँ भी उस मर्यादा का निर्वाह किया है संगीतकार ने.अंतरा समाप्त होते होते एक तान लेकर मनमोहना की तिहाई लताजी ने ली है उस्ताद बड़े ग़ुलाम अली ख़ाँ साहब का वक्तव्य याद हो आता है......कमबख़्त ग़लती से भी बेसुरा नहीं गाती;ये तो हक़ीक़त में उस्तादों की उस्ताद है.वाक़ई इस और इस जैसे दीगर कई शास्त्रीय संगीत आधारित रचनाएँ गाते सुनना यानी इस सुरकंठी पर मर जाना है.....शायद यही अंतिम जुमला है जो अति-वाचाल मनुष्य लताजी के लिये हक़लाते हुए बोल सकता है.
आइये मनमोहने वाली फ़िल्म सीमा की इस बंदिश को सुनते सुनते लता मंगेशकर और शंकर-जयकिशन के संगीत वैभव में रची मिसरी को कानों में घोल लें तो आज के समय में पसर रहा शोर कुछ कम हो सके.दोस्तों चित्रपट संगीत का अहसान हम पर जिसने लता मंगेशकर नाम की अचूक औषधी हमें दी जो बढ़ती उम्र को कुछ देर के लिये रोक लेती है........जैजैवंती गा रही हैं विदूषी लता मंगेशकर...पंडित दीनानाथ मंगेशकर के घर की सबसे सुरीली बेटी.




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मनमोहना बड़े झूठे
हार के हार नहीं माने
मनमोहना
बने थे खिलाड़ी पिया
निकले अनाड़ी पिया
मोसे बेइमानी करे
मुझसे ही रूठे
मनमोहना
तुम्हरी ये बाँसी कान्हा
बनी गल फाँसी
तान सुनाके मेरा
तन मन लूटे
मनमोहना


4 टिप्पणियाँ:

mamta said...

इतना विस्तार से लिखने के लिए शुक्रिया ।
वैसे लता की आवाज की मिठास का कोई मुकाबला नही है।
लता,शंकर-जयकिशन , शैलेन्द्र के कॉम्बिनेशन ने बहुत सुरीले गीत दिए है संगीत जगत को।

Harshad Jangla said...

मनमोहना .... मनमोहक गीत, अनमोल संगीत , भावपूर्ण शब्द .... कोई भी प्रशंसा कम पड़ेगी |
विस्तृत जानकारी और मधुर गीत देने के लिए धन्यवाद |
सुरीली यात्रा अति आनंद दायक होती जा रही है |
-हर्षद जांगला
एटलांटा, युएसए

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` said...

बेहतरीन प्रस्तुति ~~
बेहद कर्णप्रिय गीत है
बस आनँद ही आनँद !
- लावण्या

दिलीप कवठेकर said...

हम नतमस्तक हैं-

लता जी ..
शंकर जयकिशन ...
और
आप तीनों ......

 
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