Sunday, August 24, 2008

घर आ जा घिर आई बदरा साँवरिया - पंचम दा की अप्रतिम पहली धुन

साठ के दशक की शुरूआत थी.लताजी और संगीतकार सचिनदेव बर्मन में अनबन चल रही थी. उन्हीं के पुत्र राहुलदेव बर्मन जिसे सब प्यार से पंचम कहते थे ; ने क़ौल ले रखा था कि पहला गीत तो लता मंगेशकर के साथ ही रेकॉर्ड करूंगा. पंचम दा को फ़िल्म मिली छोटे नवाब(1961) ये फ़िल्म पंचम के ताज़िन्दगी मित्र रहे हास्य अभिनेता महमूद ने बनाई थी । अब चूँकि पिता से लताजी का अबोलो था तो आज प्रस्तुत होने जा रहे गीत घर आजा घिर आई बदरा साँवरिया की रिहर्सल भी पंचम दा ने अपने घर की सीढ़ियों पर बाजा लेकर लता दी के साथ की. जब भी राहुलदेव बर्मन का संगीत सुनें एक बात पर ज़रूर ग़ौर कीजियेगा कि ये हुनरमंद संगीतकार रिदम का राजा है. ख़ास कर जहाँ भी ख़ालिस तबला बजा है वहाँ तो कमाल ही हुआ है. ऐसा नहीं कि बहुत द्रुत में काम हुआ है पर आम तौर बजने वाली तालों से हटकर पंचम ताल को अलग अंदाज़ में बांधते हैं रिदम के नये नये अंदाज़ आपको इनके गाने में सुनने को मिलेंगे.मेहबूबा हो मेहबूबा (शोले)आजकल पाँव ज़मी पर नहीं पड़ते मेरे(घर)ओ माँझी रे नदिया की धारा (ख़ुशबू)जिस गली में तेरा घर ना हो बालमा (कटी पतंग)या लकड़ी की काठी काठी पे घोड़ा(मासूम)कुछ ऐसे गीत हैं जिनमें आपको रिदम के जुदा जुदा रंग दिखाई देंगे.

ये इल्ज़ाम भी राहुलदेव बर्मन ने झेला कि संगीत की विकृति को इस संगीतकार ने शुरू किया लेकिन हमें ये नहीं भूलना चाहिये संगीत हमेशा समकालीन परिदृश्य का हमक़दम रहा है. क्या ऐसा इल्ज़ाम लगाने वाले लोग पंचम दा की कि सर्वकालिक श्रेष्ठ कृति 1942 - ए लव स्टोरी को भूल जाते हैं जिसका एक एक गीत उत्कृष्टता की कसौटी पर खरा उतरता है. ये भी याद रखना ज़रूरी होगा कि पंचम दा को उस्ताद अली अकबर ख़ाँ से सरोद सीखने का मौक़ा मिला है और उन्होने समय पर सरोद,सितार और बाँसुरी का बेहतरीन उपयोग अपने गीतों में किया है.

फ़िल्म छोटे नवाब का यह गीत लताजी के विरह गीतों की सूचि में बेझिझक शुमार किया जा सकता है. राग मालगुंजी (याद करें पं.विनायकराव पटवर्धन और पं.नारायणराव व्यास की ख्यात ख़याल रचना ब्रज में चरावत गैया) में निबध्द इस रचना को लताजी ने जिस शिद्दत से गाया है वह उन्हें वैष्णव पंथ की साधिका बना देता है. और पंचम दा को देखिये मैहर घराने के शाग़िर्द होने के नाते पं रविशंकर की सितार के सुर तो उनके कानों में पड़े ही होंगे तो कैसे छिड़ी है सितार इस गीत के इंटरल्यूड में. दोनो अंतरों की प्रथम पंक्ति सूना सूना घर मोहे डसने को आए रे और कस मस जियरा कसम मोरी दूनी रे के ठीक बाद उठी सारंगी की तड़प पर भी ध्यान दीजियेगा तो पाएंगे की शब्द और स्वर से ज़्यादा एक वाद्य कैसे बोलता है. फ़िर वही बात की लता जी गाने की उठान में जान ले लेतीं हैं इस गीत के मुखड़े में घर शब्द को लता जी ने जो पीड़ा दी है वह अन्य गायिकाओं से उन्हें विशिष्ट बनाती है.
दिलचस्‍प बात ये है कि पंचम की शुरूआत एक छोटी फिल्‍म से हुई थी । जाने-माने हास्‍य अभिनेता मेहमूद की बनाई फिल्‍म थी 'छोटे नवाब' । मेहमूद, पंचम और अमीन सायानी तीनों गहरे दोस्‍त
थे । मेहमूद ने फिल्‍म 'भूत बंगला' में तो अमीन सायानी से एक्टिंग भी करवाई थी । बहरहाल, पंचम ने इस फिल्‍म को 'छोटी' फिल्‍म मानकर संगीत नहीं दिया और जमकर मेहनत की । ये गाना शैलेंद्र ने लिखा है । राहुल देव बर्मन और शैलेंद्र की जोड़ी के कम ही गाने मुझे याद आते हैं । उस समय किसी को अंदाज़ा भी नहीं था कि इस फिल्‍म और इस गाने के ज़रिए एक इतिहास बन जाएगा । पर देखिए आज सैंतालीस साल बाद भी इस गाने को सुनें तो हर बार नया ही लगता है ।
इसलिए हम इसे कालजयी गीतों की श्रेणी में रखते हैं । इस गाने से पहले आपको आर.डी.बर्मन और लता जी की आवाजें भी सुनाई देंगी । 

shockwave player


घर आ जा घिर आए बदरा सांवरिया
मोरा जिया धक धक रे, चमके बिजुरिया ।।
सूना सूना घर मोहे डसने को आए रे 
खिड़की पे बैठी बैठी सारी रैन जाए रे
टप टिप सुनत मैं तो भई रे बावरिया ।।
घर आ जा ।।
कसमस जियरा कसक मोरी दूनी रे
प्‍यासी प्‍यासी अंखियों की गलियां हैं सूनी रे
जाने मोहे लागी किस बैरन की नजरिया ।।
घर आ जा ।।

समय की ताब में ये गीत पुराने नहीं पड़ते,पुरानी पड़तीं हैं हमारी रिवायते,हमारी सोच और हम ख़ुद . बेहतर होगा कि हम मन से स्वस्थ बने रहने के लिये इन गीतों की जुगाली करते रहें और शायद अब तक हमने कहा न हो लेकिन यही मक़सद है श्रोता-बिरादरी पर आपको न्योता देने का ...हर हफ़्ते....फ़िर मिलते हैं..अल्ला हाफ़िज़.

(चित्र: जनवरी १९९४ में राहुलदेव बर्मन का निधन हुआ.उसके कुछ अर्सा पहले लता अलंकरण १९९२-९३ प्राप्त करने वे इन्दौर गये थे. वहीं लिया गया ये चित्र.छायाकार वरिष्ठ कैमरामेन शरद पण्डित)

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4 टिप्पणियाँ:

मीत said...

"छोटे नवाब" में पंचम दा ने जो संगीत दिया वो अविस्मरणीय है. इस फ़िल्म के कुछ और गीत कमाल के हैं. और ये गीत : "घर आजा घिर आई ......" का तो कोई जवाब ही नहीं ..... संगीत, गीत.......... और ये आवाज़ .... दिन की शुरुआत इस से शीरीं क्या होती .............?

दिलीप कवठेकर said...

किसी अच्छे पोस्ट की क्या विशेशतायें है?

बहुत कठीण काम है दादा.

गाने का चयन, समयानुरूप, और दिल के अंतरतम में घुस जाने वाला.उसकी ऒडिओ या विडीयो क्लिप लगाना, और उससे भी या सबसे ज़रूरी, उस गीत के पीछे के रचनाकारों के भाव, मकसद, संगीत संयोजन , वाद्य वृंद प्रयोग (उसकी उपादेयता भी) और शब्दों का सारगर्भित विश्लेषण करना.

यहीं बातें यहां मौजूद हैं जो इसे अलग मकाम पर ले जाती है.पढने वाला भी अभिभूत हो वर्तमान से छूट कर भूत काल में ट्रांसपोर्ट हो जाता है और यादों की जुगाली में खो जाता है.क्या यही उपादेयता नहीं इस उपक्रम की?

श्रोता बिरादरी के नुमाईंदों , क्या यह सही है ?

अब प्रस्तुत गीत की ओर..

आपके हर शब्द में वह रस टपक रहा है, जो पंचमदा नें गीत को सिरजते हुए लता की मीठी मधुर आवाज़ से घोला था.

ताल वाद्यों के प्रयोगात्मक क्रियेटीवीटी के तो किंग थे पंचमदा. अभी विविध भारती के संगीत सरिता में भारतीय ताल वाद्यों पर कर्यक्रम आ रहा है, जिसमें तबले या ढोलक के अलावा अलग अलग विशिष्ट ध्वनी लिये साईड रिदम में प्रयोग होने वाले अनसुने वाद्यो के बारे में बताया जा रहा है. उसमें जो भी गीत उधृत किये जा रहे है, उनमें आरडी के गीतों की बहुलता है. क्या यही उस प्रयोगशील गुलुकार की महत्ता नही दर्शाती?

यह गीत , और इन जैसे गीत की अंदर की टीस या कसक हम पुरुषों को भी तडपाती है ,तो वे खवातीन जो इन्हे मेहसूस करती होंगी उन पर क्या बीतती होगी?
’घर आजा ’ स्थाई पर आते ही ताल में’घर’शब्द पर खाली मात्रा का प्रयोग आज समझ में आया. क्या आप हमें वहां नही ले चलते तो क्या हम जा पाते?

गीत सुनने के बाद, और पढने के बाद की जुगाली की स्वयंस्फ़ूर्त प्रणीती यहां टिप्पणी से अभिव्यक्त हो रही है, जो आपके अनुग्रह के अनुरूप ही है शायद.अतिउत्साह अगर हो तो क्षमा.

अफ़लातून said...

क्या गजब पोस्ट और वैसी ही टिप्पणियाँ। आर.डी. बर्मन स्वयं माउथ ऑर्गन भी बजाते थे।

सजीव सारथी said...

बहुत बार सुना है ये गीत पहले भी, पर आज कुछ ज्यादा ही अच्छा लगा... जाने क्यों ....

 
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