गरजत बरसत सावन आयो रे ; लायो न संग में हमरे बिछरे बलमवा.
गरजत बरसत सावन आयो रे
लायो न संग में
हमरे बिछड़े बलमवा
सखी क्या करूं हाय
रिम – झिम, रिम - झिम मेहा बरसे
तरपे जियरवा मीन समान
पर गयी फीकी लाल चुनरिया,
पिया नहीं आये...
गरजत बरसत आयो रे...
पल पल छिन छिन पवन झकोरे
लागे तन पर तीर समान,
नैनं जल सो गीली चदरिया,
अगन लगाये,
गरजत बरसत सावन आयो रे...
इस गीत की पंक्तियों को पढ़ें तो लगता है अमीर ख़ुसरो की लिखीं हैं लेकिन ये तो हमारे साहिर लुधियानवी साहब का कारनामा है हुज़ूर. फ़िल्म बरसात की रात की एक बेहतरीन म्युज़िक फ़िल्म थी (इस विषय पर ज़्यादा नहीं वरना एक पूरी पोस्ट इसी फ़िल्म के संगीत पर लिखी जा सकती है)और साहिर-रोशन जुगलबंदी का नायाब नमूना. पूरब के अंग को साहिर साहब ने अपने क़लम से सजा कर इस मौसमी बंदिश क्या ख़ूब सँवारा है. ये पूरा गीत उपमाओं का गीत है.जियरवा मीन यानी मछली जैसा तड़प रहा है,पवन झकोरे तन पर तीर समान लग रहे हैं गोया साहिर साहब ने एक पूरा समाँ रच दिया है बिरहन की फ़िलिंग्स और बरसते सावन का.एक लम्बे इंतज़ार के लिये साहिर ने क्या बढ़िया मुहावरा रच दिया है कि प्रियतम की इतनी लम्बी प्रतीक्षा हो गई है कि लाल चूनर मध्दिम पड़ गई है.सरकाई लो खटिया जाड़ा लगे जैसे गीत में जो छिछोरापन है उसके सामने इस मौसमी रचना में नैनं जल सो गीली चदरिया , अगन लगाए कैसी गरिमा से लिखा गया है...इस लिहाज़ से ये कहना बेमानी न होगा कि गुज़रे ज़माने के गीत भाषा का लहजा और संस्कार भी तो रचते थे.
रोशन साहब जो बाक़ायदा शास्त्रीय संगीत की तालीम लेकर फ़िल्म इंडस्ट्री में आए थे मल्हार अंग की इस रचना में दो स्वरों (सुमन कल्याणपुर और कमल बारोट ) से क्या ख़ूबसूरत गवा गए हैं . कमलजी की आवाज़ में एक प्यारा सा नैज़ल है जो ऐसा आभास देता है जैसे कोई अभ्यासी गायिका नहीं हमारे घर की बहन बेटी झूला-गीत गा रही हैं.और सुमन ताई की लहरदार आवाज़ में मुरकियाँ इस बंदिश की रौनक़ बढ़ा रही है. रोशन साहब ने इस गीत में कोई आलाप देने के बजाय सरोद और सारंगी के एक प्री-ल्यूड से गीत को आमद दी है. इस गीत में सरोद बार बार बजा है और बड़ा सुरीला बजा है . ये सरोद पीसेज़ बजाये हैं ज़रीन दारूवाला ने और सांरगी के छोटी छोटी बानगियाँ पं.रामनारायणजी के गज (जिससे सारंगी बजाई जाती है) से ऐसी बजीं है जैसे घने बादल में बिजली चमक रही हो..तबले और जलतरंग पर एक ख़ूबसूरत शुरूआत रची गई है जिस पर उभरता दोनो गायिकाओं का मीठा स्वर छा गया है.तीन मिनट के इस खेल में रोशन साहब ने साबित कर दिया है कि इस तरह से भी क्लासिकल मौसीक़ी की ख़िदमत की जा सकती है.
फिल्म 'मल्हार' में भी इसी तरह का एक गीत था बोल थे 'गरजत बरसत भीजत आईलो' । अपनी रचना और धुन में ये गीत भी कम नहीं है । कमाल की बात ये है कि उत्तर के लोकगीत और शास्त्रीय रचनाओं से प्रेरित होकर दो सुंदर गीत तैयार हुए हैं । वो भी एकदम एक जैसे । पी. एल. संतोषी की फिल्म 'बरसात की रात' आज से अड़तालीस साल पहले आई थी । क्या आपने इस बात पर विचार किया कि जब बारिश आती है तो हमारे होठों पर चालीस पचास साल पहले के गीत ही क्यों सजते हैं । क्या इसका मतलब ये समझा जाये कि पिछले लगभग तीस बरस बारिश के अनमोल गीतों की दृष्टि से एकदम वीरान सुनसान बीत गए । बदलते दौर के साथ बदलती प्राथमिकताओं का संकेत है ये ।
'श्रोता-बिरादारी' पर हम गॉसिप नहीं करते । पर फिर भी एक अहम मुद्दे का खुलासा आपके सामने कर रहे हैं । फिल्म-संगीत की दुनिया के बहुत ही वरिष्ठ और भरोसेमंद सूत्रों के हवाले से हमारी जानकारी में ये बात आई है कि कई गीत जो साहिर लुधियानवी के नाम हैं, दरअसल उन्हें जांनिसार अख्तर ने लिखा है । और ये गीत उनमें से एक गिना जाता है । हालांकि इन बातों की पक्के तौर पर पुष्टि कभी नहीं की जा सकती । पर कहते हैं कि जांनिसार बेहद मनमौजी थे और साहिर बहुत बिज़ी । इसलिए बिज़ी शायर ने मनमौजी शायर की मुंबई में डटे रहने में 'मदद' की थी । चलिये छोडि़ये इन बातों को और सावन के इस गीत को झूला बनाकर ऊंची ऊंची पींगें लीजिये ।
इस गाने को हमने तीन रूपों में चढ़ाया है ।
श्रोता बिरादरी की अगली पेशकश कल होगी । कल किशोर दा का जन्मदिन है ।

टिप्पणियाँ:
Regards
Extremely well described article.A great song.
Shukriya Shrota Biradari Team.
-Harshad Jangla
Atlanta, USA
( या जाँनिसार खाँ साहब ही )
जैसे गुणीजनोँ ने कालजयी गीतोँसे सजाया ..
बहुत सुँदर, शास्त्रीय गीत सुनवाया आपलोगोँने -
खुशी हुई :)
-- लावण्या
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