श्रोता बिरादरी - सुनने-सुनाने का सुरीला सिलसिला
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Saturday, August 2, 2008

लगातार दो दिनों तक बने रहियेगा...श्रोता – बिरादरी के साथ....

समय पलक झपकते ही बीत जाता है. कहते हैं समय के पँख होते हैं;
पाँव नहीं. पिछले हफ़्ते श्रोता-बिरादरी को दो बार मौक़ा मिला आपसे बतियाने का.
31 जुलाई को रफ़ी साहब की बरसी पर जारी गीत पर मिले प्रतिसाद के
लिये आभार . आइये एक बार फ़िर एक नये गीत को याद करें;सुनें;गुनें
और हाँ ये गीत है ही ऐसा कि साथ में गुनगुनाएँ भी.
मल्हार के रंग में भीगी ये बंदिश आपके मन के आनंद को रोशन करेगी
इसका पूरा यक़ीन है हमें.

रविवार की सुबह नौ बजे के अनक़रीब श्रोता-बिरादरी की सुरीली बिछात आपकी मुंतज़िर रहती है. इस गीत को सुनने के बाद हमें फिर ये मानना पड़ता है कि फ़िल्म संगीत के बेजोड़ सृजनधर्मियों ने जो काम किया है वह कितना लाजवाब है. चित्रपट विधा में समय की जो सीमा है उसमें रहते हुए ,शास्त्रीय संगीत का मान बढ़ाते हुए और सबसे महत्वपूर्ण ...कविता की गरिमा पर क़ायम रहते हुई कैसे कैसे नायाब
कलेवर रचे हैं हमारे गुणी गीतकारों,गायकों,और संगीतकारों ने.गीत आपका सुना हुआ और सराहा हुआ है लेकिन इस मौसम की रंगत में इज़ाफ़ा करता हुआ ज़रा ज़्यादा ही सुरीला सुनाई देता है.

सुनियेगा ज़रूर....कल सुबह यानी 3 अगस्त को ये ख़ास गीत.

और हाँ आपको एक ख़ुशखबर देना तो भूल ही गये....4 अगस्त को फ़िर मिल रहे हैं रमाकु रशोकि का जन्मदिन मनाना है न हमें – आपको।
तो लगातार दो दिन तक श्रोता-बिरादरी के साथ बने रहियेगा.....ये आप ही की तो महफ़िल है जनाब.

Saturday, July 19, 2008

रविवारीय सुबह में झरेंगी गीत/संगीत की मनभावन बूँदें.

अब तक तो आपको श्रोता-बिरादरी की आदत पड़ ही गई होगी.हम
आपके प्रेमपूर्ण प्रतिसाद से अभिभूत् हैं और उम्मीद है कि आप
सुरीलेपन को महदूद रखने के इस सिलसिले के हमसफ़र बने रहेंगे.

देश के कई अंचलों में बारिश की आमद हो चुकी है तो कई जगह
सावन अभी भी सूना सूना है. लेकिन संगीत में वह ताक़त है कि
जो मिल जाए उसका उत्सव मनवा देता है और जो नहीं मिला
उसका दर्द भुला देता है. समझ लीजिये कुछ इसी तरह का मजमा
जमा देगी श्रोता बिरादरी की 20 जुलाई की प्रविष्टि.

एक सर्वकालिक गुणी और रचनाशील संगीतकार की बेजोड़ रचना है
यह. श्वेत श्याम कलेवर के दौर में भी संगीत का इन्द्रधनुष रचाती सी.
गीत के बोल ऐसे कि आपको लगे कि ये भाषा तो आप घर में
बोलते आए हैं.....और गायकी...शायद उसे व्यक्त करने के लिये
हमारे शब्द उतने सुरीले नहीं हो सकते; जितनी ये आवाज़ें.

याद रखियेगा; रविवार की सुबह नौ बजे के अनक़रीब श्रोता-बिरादरी
मुख़ातिब होती है आपसे.कल भी ये सिलसिला जारी रहेगा.

हाँ आपको इस पोस्ट से बाख़बर करने का मकसद
इतना भर है कि आप एस.एम.एस. या ई मेल के
ज़रिये श्रोता-बिरादरी की नई पायदान की सूचना
अपने देस-परदेस में बसे मित्रो/परिजनों तक पहुँचा सकें....

आप ख़ुद भी तो श्रोता-बिरादरी का हिस्सा हैं न ?

आइये सुरीलेपन
को संक्रामक बनाएँ.