श्रोता बिरादरी शुरू कर रही है भारतरत्न लता मंगेशकर के गीतों से सजा स्वर उत्सव...28 सितम्बर तक रोज़ सुनिये एक बेजोड़ लता-गीत.मित्रों के साथ भी इस उत्सव को साझा कीजिये
श्रोता बिरादरी
यूनुस खान, संजय पटेल, सागर नाहर
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कुछ संगीतमय चिट्ठे
कहाँ से पधारे आप
वाद- संवाद
दोस्तों की दुनियाँ
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मित्रों ,
आपकी शिकायत जायज भी है कि हम इस ब्लॉग पर नियमित ध्यान नहीं दे पा रहे हैं,दीपिका को हर रविवार किसी अच्छे गाने का इंतजार रहता है तो सुनीलजी कहते हैं कि क्यों ना इस ब्लॉग को बंद करने की सूचना दे दी जाये या फिर किसी और को सौंप दिया जाये?
पर मित्रों आप इन दिनों देख रहे होंगे कि हम तीनों के अपने ब्लॉग पर भी हम नियमित नहीं लिख पा रहे हैं, कारण जो कोई भी हो पर हम अपनी गलती स्वीकार करते हैं, हमारी कोशिश रहेगी कि हर रविवार नहीं पर ज्यादा से ज्यादा पोस्ट इस ब्लॉग पर हम लिखें।
आज कई दिनों बाद हम आपको एक ऐसा गीत सुनवाने जा रहे हैं हमें आशा है कि इसे सुनकर आपकी नाराजगी कुछ हद तक कम जरूर होगी। यह गीत है पंडित वसंत देसाई द्वारा संगीतबद्ध मुरली मनोहर कृष्ण कन्हैया...
इस गीत में आपको शास्त्रीय गीत के साथ रैप गाने का भी असर दिखाई देगा।
मुरली मनोहर कृष्ण कन्हैया
जमुना के तट पे विराजे हैं- 2
मोर मुकुट पर कानों में कुण्डल
कर में मुरलिया मुरलिया मुरलिया साजे है
इतने में दी दिखाई राधा
राधा राधा राधा
पनघट पर से आय रही
कतराय रही, शरमाय रही
मुसकाय रही बलखाय रही
इधर बंशी में लहर सी उठी
कृष्ण के मुख पर सजने लगी
पर आप ही आप से
बजने लगी बजने लगी बजने लगी
लम्बा सा घूँघट काढ़ लिया
बंशी के सुरों पर झूम गई
हर सरत डगरिया मोह ली
मोहन की ओर ही
दुमकित दुमकित दुमकित धूम गई
फिर कृष्ण कन्हैया नटखट ने
राधा की कलैया थाम लई
राधा ने पुकारा- 2
हाय दई कोई आओ सखी कोई आओ सखी
फिर हाथ छुड़ा कर बोली हटो -2
अब जावो डगरिया छोड़ मोरी
कहा कृष्ण ने चुप रह
वरना दूँगा गगरिया फोड़ तोरी
राधा तब उसकी शोख़ी पर कुछ बिगड़ी भी
मुसकाई भी
फिर कॄष्ण से पूछा
कौन हो तुम क्या नाम है जी
क्या काम है जी क्या काम है जी
ओ
हमें गोप गुआला कहते हैं \-२
और कृष्ण दिया है नाम हमें नाम हमें
कोई नटवर गिरधर कहता है \-२
और कोई कहे घनश्याम हमें
घनश्याम नहीं तुम काले हो \-२
तुम नटखट हो मतवाले हो मतवाले हो
चितचोर हो माखन चोर नहीं \-२
सुख\-चैन चुराने वाले हो
घनश्याम नहीं
राधा ने उनको हाथ दिया
और कृष्ण ने उनका साथ दिया
कुछ बात हुई कुछ घात हुई
इतने में सूरज डूब गया \-२
राधा की पायल जाग उठी
दोनों में कला की राग उठी
अब रैन को दीप सँवारे थे
और नील गगन पे तारे थे
रैन को दीप सँवारे थे
और नील गगन पे तारे थे
राधा को विदा के इशारे
राधा को विदा के इशारे थे
राधा ने आँचल बाँध लिया
मुरली को सम्भाला माधव ने
दुनिया की सबसे सुरीली आवाज़ आज जीवन के तिरासी वर्ष पूर्ण कर रही है.लता मंगेशकर नाम की इस चलती-फ़िरती किंवदंती ने हमारी तहज़ीब,जीवन और परिवेश को हर रंग के गीत से नवाज़ा है. हम भारतवासी ख़ुशनसीब हैं जिन्हें लता मंगेशकर का पूरा संगीत विरासत के तौर पर उपलब्ध है.
हज़ारों गीतों की ये दौलत उन सुनने वालों की अकूत संपदा है जिस पर कोई भी संगीतप्रेमी समाज फ़ख्र करता है. कोशिश थी कि लता मंगेशकर के जन्मदिन पर अनूठी सामग्री आप तक पहुँचाए. इस बारे में कुछ प्रयास चल ही रहा था कि ज्ञात हुआ कि प्रमुख हिंदी अख़बार नईनिया में देश के बहुचर्चित युवा कवि यतीन्द्र मिश्र द्वारा संकलित उन ८३ गीतों का प्रकाशन हो रहा है जो लताजी द्वारा भी पसंद किये गये हैं. मालूम हो कि यतीन्द्रजी भारतरत्न लता मंगेशकर पर एक पुस्तक लिख रहे हैं.इसके लिये वे लगातार लताजी के बतियाते रहते हैं और प्रकाशन की भावभूमि पर सतत चर्चा चलती है.यतीन्द्रजी ने दीदी की रुचि,उनकी तबियत और ह्रदय के पास रहने वाले ८३ सुरीले मोतियों की गीतमाला तैयार की है जिसे लताजी ने भी व्यक्तिगत रूप से सराहा है. इस सूची को श्रोता-बिरादरी पर जारी करते हुए हम यतीन्द्र मिश्र और नईदुनिया के प्रति साधुवाद प्रकट करते हैं.
जब तक टिमटिमाते तारों की रात रहेगी झील की हवाओं में उदास गुमसुमी रहेगी बादलों के पीछे चाँद धुंधलाता रहेगा चिर किशोरी लता की निष्पाप आवाज़ हम पर सुखभरी उदासी बरसाती रहेगी. -अजातशत्रु
यह सूची उन गायक-गायिकाओं और संगीतप्रेमियों के लिये अत्यंत महत्वपूर्ण है जो लता मंगेशकर के गीतों में दिलचस्पी रखते हैं. इस सूचि का कालखण्ड विस्तृत है और इसमें लताजी के प्रिय संगीतकारों की धुनों की बानगी भी सुनाई देती है. आशा है लताजी के तिरासीवें जन्मदिन ये सुरीला नज़राना आप संगीतप्रेमी पाठकों के लिये एक अनूठे दस्तावेज़ का काम करेगा. आज सुनिए कुछ गीत और हाँ कामना भी करें कि सृष्टि के इस मिश्री स्वर को हमारी उमर लग जाए.....
गीत: आ प्यार की बाँहों में फिल्म चाँद ग्रहण ( अप्रदर्शित) संगीत जयदेव गीत- क़ैफ़ी आज़मी
लता-८३ और लताजी के पसंद के ८३ गीत
१. आएगा...आएगा आने वाला... (महल) खेमचन्द्र प्रकाश १९४८ २. बेदर्द तेरे दर्द को सीने से लगा के... (पद्मिनी) गुलाम हैदर १९४८ ३. हवा में उड़ता जाए मोरा लाल दुपट्टा... (बरसात) शंकर-जयकिशन १९४९ ४. साजन की गलियाँ छोड़ चले... (बाजार) श्याम सुंदर १९४९ ५. उठाए जा उनके सितम... (अंदाज) नौशाद १९४९ ६. तुम न जाने किस जहाँ में खो गए... (सजा) एसडी बर्मन १९५१ ७. बेईमान तोरे नैनवा निंदिया न आए... (तराना) अनिल विश्वास १९५१ ८. तुम क्या जानो तुम्हारी याद में... (शिन शिनाकी बूबला बू) सी. रामचन्द्र १९५२ ९. मोहे भूल गए साँवरिया... (बैजू बावरा) नौशाद १९५२ १०. ए री मैं तो प्रेम दीवानी... (नौ बहार) रोशन १९५२ ११. वो तो चले गए ऐ दिल... (संगदिल) सज्जाद हुसैन १९५२ १२. वंदे मातरम्... (आनंद मठ) हेमंत कुमार १९५२ १३. जोगिया से प्रीत किए दुख होए... (गरम कोट) पं. अमरनाथ १९५२ १४. ये जिन्दगी उसी की है... (अनारकली) सी. रामचन्द्र १९५३ १५. ये शाम की तनहाइयाँ... (आह) शंकर-जयकिशन १९५३ १६. जादूगर सईंयाँ छोड़ो मोरी बईंयाँ... (नागिन) हेमंत कुमार १९५४ १७. जो मैं जानती बिसरत हैं सैंया... (शबाब) नौशाद १९५४ १८. न मिलता गम तो बरबादी के अफसाने... (अमर) नौशाद १९५४ १९. देखोजी बहार आई बागों में खिली कलियाँ... (आज़ाद) सी. रामचन्द्र १९५५ २०. मनमोहना बड़े झूठे... (सीमा) शंकर-जयकिशन १९५५ २१. आँखों में समा जाओ इस दिल में... (यास्मीन) सी. रामचन्द्र १९५५ २२. गुजरा हुआ जमाना आता नहीं दुबारा... (शीरीं-फरहाद) एस. मोहिन्दर १९५६ २३. रसिक बलमा... दिल क्यूँ लगाया... (चोरी-चोरी) शंकर-जयकिशन १९५६ २४. मैं पिया तेरी तू माने या न माने.... (बसंत बहार) शंकर-जयकिशन १९५६ २५. ऐ मालिक तेरे बंदे हम... (दो आँखें बारह हाथ) वसंत देसाई १९५७ २६. छुप गया कोई रे दूर से पुकार के... (चम्पाकली) हेमंत कुमार १९५७ २७. हाय जिया रोए पिया नहीं आए... (मिलन) हंसराज बहल १९५८ २८. औरत ने जनम दिया मरदों को... (साधना) एन. दत्ता १९५८ २९. आ जा रे परदेसी मैं तो कब से खड़ी... (मधुमती) सलिल चौधरी १९५८ ३०. हम प्यार में जलने वालों को... (जेलर) मदन मोहन १९५८ ३१. बैरन नींद न आए... (चाचा जिंदाबाद) मदन मोहन १९५९ ३२. जाने कैसे सपनों में खो गई अँखियाँ... (अनुराधा) पं. रविशंकर १९६० ३३. बेकस पे करम कीजिए सरकारे मदीना... (मुग़ल-ए-आज़म) नौशाद १९६० ३४. अजीब दास्ताँ है ये... (दिल अपना और प्रीत पराई) शंकर-जयकिशन १९६० ३५. ओ सजना बरखा बहार आई... (परख) सलिल चौधरी १९६० ३६. ज्योति कलश छलके... (भाभी की चूड़ियाँ) सुधीर फड़के १९६१ ३७. जा रे जा रे उड़ जा पंछी... (माया) सलिल चौधरी १९६१ ३८. अल्लाह तेरो नाम, ईश्वर तेरो नाम... (हम दोनों) जयदेव १९६१ ३९. ढूँढो-ढूँढो रे साजना मोरे कान का बाला... (गंगा-जमुना) नौशाद १९६१ ४०. दिल का खिलौना हाय टूट गया... (गूँज उठी शहनाई) बसंत देसाई १९६१ ४१. एहसान तेरा होगा मुझ पर... (जंगली) शंकर-जयकिशन १९६१ ४२. ऐ मेरे दिले नादाँ तू गम से न घबराना... (टावर हाउस) रवि १९६२ ४३. कहीं दीप जले कहीं दिल... (बीस साल बाद) हेमंत कुमार १९६२ ४४. आपकी नजरों ने समझा... (अनपढ़) मदन मोहन १९६२ ४५. पवन दीवानी न माने उड़ावे मोरा... (डॉ. विद्या) एसडी. बर्मन १९६२ ४६. जुर्मे उल्फत पे हमें लोग सजा देते हैं... (ताजमहल) रोशन १९६३ ४७. रुक जा रात ठहर जा रे चंदा... (दिल एक मंदिर) शंकर-जयकिशन १९६३ ४८. लग जा गले कि फिर ये हंसीं रात... (वो कौन थी) मदन मोहन १९६४ ४९. ए री जाने ना दूँगी... (चित्रलेखा) रोशन १९६४ ५०. जीवन डोर तुम्हीं संग बाँधी... (सती सावित्री) लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल १९६४ ५१. तुम्हीं मेरे मंदिर तुम्हीं मेरी पूजा... (खानदान) रवि १९६५ ५२. काँटों से...आज फिर जीने की तमन्ना है... (गाइड) एसडी बर्मन १९६५ ५३. दिल का दिया जला के गया... (आकाशदीप) चित्रगुप्त १९६५ ५४. ये समाँ...समाँ है ये प्यार का... (जब-जब फूल खिले) कल्याणजी-आनंदजी १९६५ ५५. सुनो सजना पपीहे ने कहा... (आए दिन बहार के) लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल १९६६ ५६. रहें न रहें हम महका करेंगे... (ममता) रोशन १९६६ ५७. नयनों में बदरा छाए... (मेरा साया) मदन मोहन १९६६ ५८. कुछ दिल ने कहा... (अनुपमा) हेमंत कुमार १९६६ ५९. दुनिया करे सवाल तो हम क्या जवाब दें... (बहू बेगम) रोशन १९६७ ६०. छोड़ दे सारी दुनिया किसी के लिए... (सरस्वतीचन्द्र) कल्याणजी-आनंदजी १९६८ ६१. हमने देखी है इन आँखों की महकती... (खामोशी) हेमंत कुमार १९६९ ६२. बिंदिया चमकेगी चूड़ी खनकेगी... (दो रास्ते) लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल १९६९ ६३. ना जिया लागे ना... (आनंद) सलिल चौधरी १९७० ६४. बैंया न धरो ओ बलमा... (दस्तक) मदन मोहन १९७० ६५. मेघा छाए आधी रात बैरन बन गई... (शर्मिली) एसडी बर्मन १९७१ ६६. रैना बीती जाए श्याम न आए... (अमर प्रेम) आरडी बर्मन १९७१ ६७. ठाढ़े रहियो ओ बाँके यार रे... (पाकीजा) गुलाम मोहम्मद १९७२ ६८. बाँहों में चले आओ... (अनामिका) आरडी बर्मन १९७३ ६९. आज सोचा तो आँसू भर आए... (हँसते जख्म) मदन मोहन १९७३ ७०. ये दिल और उनकी निगाहों के साए... (प्रेम पर्वत) जयदेव १९७३ ७१. आप यूँ फासलों से गुजरते रहे... (शंकर हुसैन) खय्याम १९७७ ७२. ईश्वर सत्य है...सत्यम् शिवम् सुंदरम्... (सत्यम् शिवम् सुंदरम्) लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल १९७८ ७३. सावन के झूले पड़े तुम चले आओ... (जुर्माना) आरडी बर्मन १९७९ ७४. सोलह बरस की बाली उमर को... (एक-दूजे के लिए) लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल १९८० ७५. ये कहाँ आ गए हम... (सिलसिला) शिव-हरि १९८१ ७६. ऐ दिले नादाँ...आरजू क्या है... (रजिया सुल्तान) खय्याम १९८३ ७७. दिल दीवाना बिन सजना के माने न... (मैंने प्यार किया) राम-लक्ष्मण १९८९ ७८. मेरे हाथों में नौ नौ चूड़ियाँ हैं...(चाँदनी)शिव-हरि १९८९ ७९. यारा सिली सिली...(लेकिन) ह्रदयनाथ मंगेशकर १९९० ८०. सिली हवा छू गई...(लिबास) आर.डी.बर्मन १९९१ ८१. दिल हूम हूम करे...(रूदाली) भूपेन हज़ारिका १९९४ ८२ माई नी माई मुंडेर पे तीरी...(हम आपके हैं कौन) राम-लक्ष्मण १९९४ ८३ लुका छिपी बहुत हुई...(रंग दे बसंती) ए.आर.रहमान २००६
अजातशत्रु का वक्तव्य लता दीनानाथ मंगेशकर ग्रामोफ़ोन रेकॉर्ड संग्रहालय,इन्दौर के प्रकाशन बाबा तेरी सोन चिरैया से साभार
विलक्षण मौलिकता में पश्चिमि रंग मिला कर कोई संगीतकार कोई नया सोपान रच दे तो समझ जाइयेगा कि ये करिश्मा दादा सचिनदेव बर्मन के हस्ते ही हो रहा है.संगीतकारों की भीड़ में जो व्यक्ति अलग नज़र आता है उसमें बर्मन दा का नाम बाइज़्ज़त शामिल किया जा सकता है. वाद्यों को जिस ख़ूबसूरती से बर्मन दा इस्तेमाल करते हैं वह न केवल चौंकाता है बल्कि एक लम्हा इस बात की तस्दीक की करता है कि छोटे बर्मन या पंचम दा को रचनात्मकता के सारे गुण घुट्टी में ही मिले थे.आर्केस्ट्रा की बेजोड़ कसावट बर्मन दा ख़ासियत है .उन्हें मिली संगीतकार की कुदरती प्रतिभा का ही नतीजा है कि “पिया तोसे नैना लागे रे” से लेकर “सुनो गज़र क्या गाए” जैसी विपरीत मूड की रचनाएँ उनके सुरीरे संगीत की उपज हैं.यह स्वीकारने में संकोच नहीं करना चाहिये कि सचिनदेव बर्मन की मौजूदगी चित्रपट संगीत के समंदर का वह प्रकाश स्तंभ है जिसके आसरे मेलड़ी के दस्तावेज़ रचने की नित नई राह रची गई है.क्लब गीत,लोक गीत और शास्त्रीय संगीत का आधार बना कर बांधी गई धुने सिरजने वाला ये बंगाली राजा पूरे देश में पूजनीय है.
लता तिरासी और तिरासी अमर गीत: २८ सितम्बर को लताजी का जन्मदिन है.वे ८३ बरस की हो जाएंगी. कल श्रोता बिरादरी की कोशिश होगी कि वह आपको लताजी के ऐसे ८३ सुरीले गीतों की सूची पेश कर दे जो स्वर-कोकिला को भी पसंद हैं.बस थोड़ा सा इंतज़ार कीजिये और ये सुरीला दस्तावेज़ आप तक आया ही समझिये.
आइये अब सचिन दा और लता दी के बीच के सांगीतिक रिश्ते की बात हो जाए.अनिल विश्वास के बाद वे सचिन दा ही हैं जिनके लिये सृष्टि की ये सबसे मीठी आवाज़ नतमस्तक नज़र आतीं हैं.यूँ ये विनम्रता लताजी ने अपने तमाम संगीतकारों के लिय क़ायम रखी लेकिन सचिन दा की बंदिशों में लता-स्वर से जो अपनापा झरता है वह एक विस्मित करता है. लता-सचिन का संगसाथ शुभ्रता,पवित्रता और भद्रता का भावुक संगम हे. श्रोता-बिरादरी की जाजम पर गूँज रहा नग़मा विरह गीतिधारा का लाजवाब रूपक गढ़ रहा है. छोटे छोटे आलाप और मुरकियों के साथ लता मंगेशकर की गान-विशेषज्ञता की अनूठी बानगी है ये गीत. सन २०११ में जब लता स्वर उत्सव समारोहित हो रहा है तब इस गीत को ध्वनि-मुद्रित हुए ५५ बरस हो चुके हैं और फ़िर भी लगता है कि अभी पिछले महीने ही इसे पेटी पैक किया गया है. कारण यह है कि समय और कालखण्ड बदल गया हो लेकिन घनीभूत पीड़ा के पैमाने नहीं बदले. मोबाइलों,ईमेलों और मल्टीप्लैक्सों के ज़ख़ीरों के बावजूद यादों के तहख़ाने में ऐसी सुरधारा दस्तेयाब है जो आज भी हमारी इंसानी रूहों को झिंझोड़ कर रख देने में सक्षम है. सालों बाद भी ये गीत आप सुनेंगे तो शर्तिया कह सकते हैं कि सचिन घराने का लोभान वैसा ही महकेगा जैसा सन १९५५ में जन्म लेते समय महका होगा. मुखड़े में लम्बी हो गई शब्द में ऐसा लगता है जैसे ये जुदाई सदियों की है. अंतरे में लताजी अपने तार-सप्तक को स्पर्श कर ठिकाने पर किस ख़ूबसूरती से लौट आईं हैं ये जानने के लिये आपको ये गाना दो-तीन बार ज़रूर सुनना चाहिये. चलिये सचिन देव बर्मन और लता मंगेशकर के इस अदभुत गीत में गोते लगाते हैं.
फ़िल्म : सोसायटी वर्ष : १९५५ संगीतकार : सचिनदेव बर्मन.
समय है कि किसी नाक़ाबिल को को झोली भर कर श्रेय देता है और किसी में आकंठ प्रतिभा होने के बाद भी नहीं. राजस्थानी मरूभूमि के बाशिंदे जमाल सेन साहब भी कुछ ऐसे ही थे जिनके साथ वक़्त की बेरहमी में खूब सताया. पर प्रतिभा कब हार मानती है. वे वक़्त के थपेड़ों से बेख़बर मेलडी को सिरजते रहे. आज लता स्वर उत्सव में आज जमाल सेन का भावुक स्मरण कर हम एक तरह से मधुरता को अपना सलाम पेश कर रहे हैं या यूँ कहें श्राद्ध पर्व में उनकी आत्मा की शांति का अर्घ्य दे रहे हैं.
जमाल सेन जी को राज-रजवाड़ों की तहज़ीब विरासत में मिली. नृत्य और राजस्थानी लोक संगीत में पारंगत थे. फ़िल्म संगीत की ओर पैसे के लिये आये लेकिन कभी भी पाप्युलर कल्चर के नाम पर धुनों का कचरा नहीं किया. यदि निष्पक्ष रूप से लता-गीतों का शतक रचा जाय (यथा भतृहरि का श्रंगार शतक) तो निश्चित रूप से जमाल सेन का वह गीत उसमें ज़रूर शामिल होगा जो आप श्रोता बिरादरी की रविवारीय पेशकश है. ख़रामा ख़रामा हम इस उत्सव की समापन बेला की ओर आ रहे हैं तो लाज़मी है कि कुछ ऐसा सुन लिया जाए जो आजकल नहीं सुना जा रहा है. एच.एम.वी के एलबम रैयर जेम्स भी यह गीत शुमार किया गया है. इस विस्मृत से संगीतकार की चर्चित फ़िल्में थीं
शोख़ियाँ,दायरा,अमर शहीद पतित पावन और कस्तूरी. गाने की शुरूआत में पखावज की छोटी सी आमद और बाद में हारमोनियम के ताल पर गूँजता मंजीरा इस गीत के ठेके को समृध्द करता है.शुरूआती दोहे के बाद सितार के छोटे छोटे कट लता का दिव्य स्वर क़यामत ढ़ाता है. सुपना बन साजन आए में सुपना बन को लताबाई ने जैसी फ़िरत दी है वह करिश्माई है. फ़िर दोहरा दें कि जहाँ जहाँ हमारे समय की इस किवंदंती ने सरल गाया है उसे दोहराना कठिन हो गया है.
लता मंगेशकर जिस आवाज़ और जज़्बाती गायिकी को लेकर आईं वह आंइस्टीन के सापेक्षतावाद की विज्ञानिक खोज की तरह युगांतरकारी घटना है.इतिहास के चौराहे पर एक नितांत नया मोड़ या बहती हुई नदी का एक कम्पलीट टर्न-अबाउट.इस आवाज़ में ताज़गी थी.झरने सी खलखलाहट थी.अछूते वन-प्रांतर का पावित्र्य था. लता के कंठ में अनजाने वही किया जो विवेकानंद की वाणी ने पाश्च्यात्य में किया-अजातशत्रु
लता मंगेशकर इस गीत में महज़ एक गायिका नहीं अपने समय की समग्र संस्कृति बन गईं हैं. ख़ूशबू और बेतहाशा ख़ूशबू का वितान सजातीं लता किसी कुंजवन की कोमल सखी सी विचर रहीं हैं इस गीत में. नायिका तो परदे के चलके के साथ ओझल हो जाती है लेकिन ये गीत उसकी मासूम छवि हो हमारे मानस में हमेशा जीवंत बना देते हैं. अजातशत्रुजी एक जगह लिखते हैं कि लता एक अलहदा सी सुवास हैं. अब उसे कोई नाम नहीं दिया जा सकता. पर महसूस किया जा सकता है. यह तत्व अन्य गायक-गायिका में नहीं मिलता. लता के गले में तुलसी की पत्ती है. लगता है लता जमाल सेन की धुन को पिछले जन्म में सुन चुकीं हैं.वे जिस सहजता से इन शब्दों को अपने कंठ में उतार कर हमारे कानों को संगीत का अलौकिक आचमन करवा रहीं हैं वह हमारे कलुष को धोने के लिये काफ़ी है. इस गीत को सुनते वक़्त लगता है हम मीरा के मंदिर हैं जहाँ वे अपने साँवरे को ये गीत सुनाते सुनाते मोगरे की माला पहना रहीं हैं. अब सुन भी लीजिये ये गीत और लता मंगेशकर को जुग जुग जीने की दुआ दे दीजिये...
फिल्म: शोखियाँ
संगीत : जमाल सेन
गीत केदार शर्मा
सोयी कलियाँ हँस पड़ी झुके लाज से नैन, वीणा की झंकार से तड़पन लागे नैन सपना बन साजन आये हम देख देख मुस्काये ये नैना भर आये, शरमाये-२ सपना बन साजन आये-२ बिछ गये बादल बन कर चादर-२ इन्द्रधनुष पे हमने जाकर-२ झूले खूब झुलाये-२ ये नैना भर आये, शरमाये सपना बन साजन आये नील गगन के सुन्दर तारे-२ चुन लिये फूल, समझ अति न्यारे -२ झोली में भर लाये -२ ये नैना भर आये, शरमाये सपना बन साजन आये मस्त पवन थी, हम थे अकेले-२ हिलमिल कर बरखा संग खेले-२ फूले नहीं समाये -२ ये नैना भर आये, शरमाये सपना बन साजन आये
(अजातशत्रु का वक्तव्य लता दीनानाथ मंगेशकर ग्रामोफ़ोन रेकॉर्ड संग्रहालय,इन्दौर के प्रकाशन बाबा तेरी सोन चिरैया से साभार)
शास्त्रीय संगीत लताजी को घुट्टी में मिला है. चित्रपट संगीत से फ़ारिग़ होकर लताजी अपना सर्वाधिक समय क्लासिकल म्युज़िक सुनने में लगातीं आईं हैं. वे ख़ुद भिंडी बाज़ार वाले अमानत अली ख़ाँ साहब की शाग़िर्द रहीं हैं. उन्हें बड़े ग़ुलाम अली ख़ाँ साहब का गायन बहुत पसंद है और वे समकालीन शास्त्रीय संगीत पर सतत नज़दीकी नज़र रखतीं हैं.पं.दीनानाथ मंगेशकर ख़ुद एक समर्थ गायक रहे हैं और ये क़िस्सा तो बहुत बार कहा जा चुका है कि एक बार कोल्हापुर में पण्डितजी अपने विद्यार्थेयों को किसी बंदिश का अभ्यास करने का कह कर कुछ देर के लिये बाहर गये थे और जब लौटे तो देखा बमुश्किल ६ -७ बरस की लता राग भीमपलासी गाकर अपने उम्र में बड़े विद्यार्थियों की क्लास ले रहीं हैं. संभवत: यह पहली घटना थी जब पं.दीनानाथ मंगेशकर को अपने घर में छुपे हीरे की जानकारी मिली और वे उसी दिन से अपनी लाड़ली हेमा(लताजी के बचपन का नाम) को तराशने में जुट गये.
“लता की आवाज़ मीठी शमशीर सी हमारा कलेजा चीरती जाती है और आनंद के अतिरेक से हम कराह पड़ते हैं.मन होता है लता को समूची क़ायनात से छिपाकर,डिबिया में बंद करके सितारों में रख दिया जाए.उनका सिरजा सुख कहाँ बरदाश्त होता है.-अजातशत्रु
आज श्रोता-बिरादरी पर मैहर घराने के चश्मे चराग़ उस्ताद अली अकबर ख़ाँ साहब मरहूम के संगीत निर्देशन में निबध्द फ़िल्म आंधियाँ की रचना सुनवा रहे है.आप जानते ही होंगे कि ख़ाँ साहब मैहर के बाबा अल्लाउद्दीन ख़ाँ साहब के सुपुत्र-शिष्य थे और एक विश्व-विख्यात सरोद वादक. फ़िल्म आंधियाँ के बारे में ख़ाँ साहब ने एक रोचक क़िस्सा सुनाया था कि
जब उन्हे चेतन आनंद ने बतौर संगीत निर्देशक अनुबंधित करने मुम्बई बुलाया तो ख़ाँ साहब ने कहा मैं पहले अपने वालिद साहब से इजाज़त लेना चाहूँगा क्योंकि हम क्लासिकल मौसीक़ी वाले लोग हैं और फ़िल्म संगीत के लिये उनका ऐतराज़ हो सकता है. अली अकबर मुम्बई से मैहर आए और फ़िल्म संगीत के बारे में आज्ञा मांगी. बाबा बोले अली अकबर संगीत देने में तो कोई बुराई नहीं लेकिन मैं चाहूँगा कि तुम एक गीत की धुन बना कर मुझे सुनाओ. अगर मुझे लगा कि ये तुम्हारे बलन का काम है तो ठीक वरना तुम इस फ़िल्म का प्रस्ताव ठुकरा देना.ख़ाँ साहब ने वैसा ही किया. पहला गाना तैयार हुआ. उन दिनों कैसेट रेकॉर्डर जैसा कोई इंतज़ाम नहीं था सो बाबा को मुम्बई लाया गया और स्टुडियो में धुन सुनाई गई.बाबा ने धुन पसंद की और इस तरह से आंधियाँ फ़िल्म का संगीत निर्देशन अली अकबर ख़ाँ साहब ने किया.
लताजी के बारे में रोज़ बात हो रही है सो आज चाहेंगे इस सृष्टि के इस पावन स्वर के बारे में आज कुछ विशेष न कहा जाए और सीधे गीत सुना जाए.महसूस करने की बात ये है कि उस्ताद अली अकबर ख़ाँ साहब फ़िल्म माध्यम में काम कर रहे हैं तो चित्रपट संगीत के अनुशासन से बाख़बर हैं और फ़िर भी अपना जुदा अंग परोस पाए हैं.
फिल्म : आँधियाँ संगीत: उस्ताद अली अकबर खाँ गीत : पण्दित नरेन्द्र शर्मा है कहीं पर शादमानी और कहीं नाशादियाँ आती हैं दुनिया में सुख-दुख की सदा यूँ आँधियाँ, आँधियाँ -२ है कहीं पर शादमानी और कहीं नाशादियाँ
क्या राज़ है, क्या राज़ है- क्या राज़ है, क्या राज़ है आज परवाने को भी अपनी लगन पर नाज़ है, नाज़ है क्यों शमा बेचैन है, ख़ामोश होने के लिये -२ आँसुओं की क्या ज़रूरत -२ दिल को रोने के लिये -२ तेरे दिल का साज़ पगली -२ आज बेआवाज़ है -२ है कहीं पर शादमानी और कहीं नाशादियाँ
आऽहै कहीं पर शादमानी और कहीं नाशादियाँ -२ आती हैं दुनिया में सुख-दुख की सदा यूँ आँधियाँ, आँधियाँ
आईं ऐसी आँधियाँ आईं ऐसी आँधियाँ, आँधियाँ बुझ गया घर का चिराग़ धुल नहीं सकता कभी जो पड़ गया आँचल में दाग़ -२ थे जहाँ अरमान -थे जहाँ अरमान उस दिल को मिली बरबादियाँ, बरबादियाँ है कहीं पर शादमानी और कहीं नाशादियाँ -२
ज़िंदगी के सब्ज़ दामन में -२ कभी फूलों के बाग़ ज़िंदगी के सब्ज़ दामन में ज़िंदगी में सुर्ख़ दामन में कभी काँटों के दाग़ -२ कभी फूलों के बाग़ कभी काँटों के दाग़ फूल-काँटों से भरी हैं ज़िंदगी की वादियाँ
है कहीं पर शादमानी और कहीं नाशादियाँ आती हैं दुनिया में सुख-दुख की सदा यूँ आँधियाँ, आँधियाँ -२ है कहीं पर शादमानी और कहीं नाशादियाँ
(अजातशत्रु का वक्तव्य लता दीनानाथ मंगेशकर ग्रामोफ़ोन रेकॉर्ड संग्रहालय,इन्दौर के प्रकाशन बाबा तेरी सोन चिरैया से साभार)
पं.ह्रदयनाथ मंगेशकर और विदूषी लता मंगेशकर एकदूसरे के लिय बहुत आदर भाव रखते हैं.यूँ पण्डितजी अपनी दीदी से छोटे हैं लेकिन लताजी सिर्फ़ उम्र में बड़ी नहीं; जीवन व्यवहार में भी बड़ी हैं. स्टुडियो के भीतर छोटा भाई "बाळ" पण्डितजी हो जाते हैं. ज़ाहिर है एक संगीतकार का पाया गायक से ऊँचा होता है; होना भी चाहिये.
श्रोता-बिरादरी मौक़ा-बे-मौक़ा इस बात को स्थापित करने का प्रयास कर रही है कि चित्रपट संगीत विधा में पहला स्थान संगीतकार का है.गीतकार भी बाद में आता है क्योंकि गीतकार को तो निर्माता/निर्देशक और ख़ासतौर पर संगीतकार एक बना-बनाया नक्शा देते हैं कि उसे किस पट्टी में लिखना है. लेकिन संगीतकार तो धुन बनाते वक़्त वही कारनामा करता है जिसे आसमान में से तारे तोड़ कर लाना कहते हैं.वह शून्य में धुर खोजता है. उसके दिल में समाई बेचैनी का ही तक़ाज़ा है कि वह कुछ ऐसा रच जाता है जो सालों-साल ज़िन्दा रहता है.
आपने कई बार महसूस किया होगा कि आप शब्द भूल जाते हैं लेकिन धुन नहीं. आ लौट के आजा मेरे मीत याद न भी आए तो आप ल ल ला ला ल ल्ला ल ल्ला ला...तुझे मेरे मीत बुलाते हैं...ऐसा गुनगुना ही लेते हो....ये ल ल्ला ल ल्ला क्या है...यह है वह धुन जिसे सिरजने में संगीतकार ख़ून को पानी कर देता है. बहरहाल बात पं.ह्रदयनाथजी की हो रही है. लता स्वर उत्सव में ज़िक्र कर चुके हैं कि सज्जाद,अनिल विश्वास और ह्रदयनाथजी लता की गीत यात्रा के महत्वपूर्ण संगीतकार हैं और स्वर-कोकिला ने इनकी रचनाओं को अतिरिक्त एहतियात से गाया है.
ह्रदयनाथ मंगेशकर तान सम्राट उस्ताद अमीर ख़ाँ साहब के गंडाबंद शागिर्द हैं और मराठी चित्रपट और भावगीतों में बतौर गायक और संगीतकार उनकी ख़ास पहचान है. मालूम हो कि लता मंगेशकर के दो अत्यंत लोकप्रिय प्रायवेट एलबम चाला वाही देस (मीरा) और ग़ालिब ह्रदयनाथजी द्वारा ही संगीतबध्द हैं.
“लता हमेशा डूबकर गाती है.एक – एक शब्द से वे अपना माँस और साँस मिलातीं हैं.आगे जब वे गायन में समा जातीं हैं और आलाप और ताने इसतरह फ़ूटने लगते हैं जैसे तुलसी के बिरवा में फूल फूटें या नींद में बच्चा मुस्कुराए.यह हमारा सामूहिक पुण्य ही है कि भारतवर्ष को लता मिलीं-अजातशत्रु
लता स्वर उत्सव को एकरसता से बाहर निकालने के लिये आज लेकर आए हैं मिर्ज़ा ग़ालिब का क़लाम जो ह्रदयनाथ-लता सृजन का अदभुत दस्तावेज़ है. इस ग़ैर फ़िल्मी रचना को सुनें तो महसूस करें कि टीप के तबले और बिजली सी चमकती सारंगी ने इस ग़ज़ल के शबाब को क्या ग़ज़ब की दमक दी है. दर्दे मिन्नत कशे दवा न हुआ,कोई उम्मीद बर नहीं आती,कभी नेकी भी उसके ,फ़िर मुझे दीदा-ए-तर याद आया और आज सुनवाई जा रही ग़ज़ल रोने से और इश्क़ में बेबाक हो गये. लता का स्वर किस लपट के साथ सारंगी के आलाप पर छा गया है. छोटी छोटी मुरकियों से लताजी क्या ख़ूबी से इस ग़ज़ल को सजा गईं हैं. अंतरे की पहली पंक्ति (यथा: कहता है कौन नालाए बुलबुल को बे-असर)के आख़िरी लफ़्ज़ को ह्रदयनाथजी ने लताबाई से जिस तरह गवाया है वह इस बात की तसदीक करता है कि दोनो भाई बहन की क्लासिकल तालीम कितनी पक्की है. ह्रदयनाथजी के संगीत को सुनते हुए है एक सत्य और जान लें कि उनका संगीत कभी भी ख़ालिसपन का खूँटा नहीं छोड़ता. दूनिया जहान हर तरह का समझौता मुकमिन है लेकिन ह्रदयनाथ के संगीत में नहीं.लता-ह्रदयनाथ बेहद स्वाध्यायी लोग हैं.किसी भी काम को करते समय होमवर्क पहले करते हैं और यही वजह है कि पण्डितजी के निर्देशन में ज्ञानेश्वरी गाई जा रही हो,मीरा या ग़ालिब;आप हमेशा एक रूहानी लोक की सैर से लौटती हैं. आख़िर में एक क़िस्सा:
दीनानाथजी के जाने के बाद बैलगाड़ी से अपनी माँ के साथ लताजी के भाई बहन मुम्बई पहुँचे हैं.लम्बा सफ़र है.रास्ते में कुछ खाया नहीं.सभी की उम्र दस से कम है,ह्रदयनाथजी की भी.दोपहर मुम्बई पहुँचना हुआ है. एक रिश्तेदार के घर आसरा लेने पहुँचे हैं. पता मालूम नहीं कि लता कहाँ रहती है,काम करने कहाँ जाती है.रिश्तेदार अपनी नौकरी पर निकल गया है. दो दिन से भूखे हैं सभी और सामने आई है एक गिलास में पाँच लोगों के लिये मह़ज़ चाय.लताजी तक परिवार के मुम्बई आने की और रिश्तेदार के घर पहुँचने की ख़बर पहुँची है. वे एक बड़ी सी छबड़ी में वड़ा पाव,चाट पकौड़ियाँ और कुछ और व्यंजन लेकर रिश्तेदार के घर पहुँचीं हैं.व्यंजनों की ख़ुशबू और दो दिन की भूख. अपने प्यारे बाळ (ह्रदयनाथ) के हाथ एक वड़ा पाव दिया है. आगे की बात ह्रदयनाथजी से सुनिये “मैंने वड़ा-पाव हाथ में लिया और दीदी की ओर श्रध्दा से देख रहा हूँ.बहुत सारे प्रश्न हैं,तुम कहाँ थीं अब तक,तुम कितनी अच्छी हो हमारे लिये खाना लाई हो....वग़ैरह वग़ैरह..आधा ही खा पाया हूँ उस वड़ा-पाव और पेट भर गया..... उसके बाद एक से बढिया व्यंजन खाए हैं,शहाना रेस्टॉरेंट्स में गया हूँ.लेकिन सच कहूँ..दीदी के उस आधे वड़ा पाव से जो तृप्ति मिली थी वैसी तो कभी मिली ही नहीं!
प्रायवेट एलबम:ग़ालिब संगीतकार:ह्रदयनाथ मंगेशकर रचना: मिर्ज़ा गालिब مرزا اسد اللہ
(अजातशत्रुजी का वक्तव्य लता दीनानाथ मंगेशकर ग्रामोफ़ोन रेकॉर्ड संग्रहालय के प्रकाशन बाबा तेरी सोन चिरैया से साभार)
सन १९५५ की फ़िल्म गरम कोट में अमरनाथ के संगीत निर्देशन में मजरूह साहब का यह गीत पूरब के लोकगीतों की छाप लिये हुए है. संयोग ही हे कि एक बार फ़िर चाँद पर केन्द्रित गीत आपको लता स्वर उत्सव में सुनने को मिल रहा है. ये गीत आपको यादों के उन गलियारों की सैर करवाता है जहाँ गीतों का माधुर्य एक अनिवार्यता के रूप में चित्रपट संगीत का हिस्सा का हुआ करती थी.
चौंकाता है इस गीत में लताजी के स्वर में पत्ती लगना. इस पत्ती लगने को शास्त्रीय संगीत के पण्डित दुर्गुण मानते हैं.इसे पं.ओंकारनाथ ठाकुर और प.कुमार गंधर्व की गायकी में भी सुना गया है और काकू प्रयोग कहा गया है.लेकिन यदि हम शास्त्र की ओर न भी जाना चाहते हैं तो मलिका ए ग़ज़ल बेग़म अख़्तर को सुन लें जिनकी आवाज़ एक ख़ास तरह से फ़टती सुनाई देतीं हैं और अनूठी मिठास का आलोक रचतीं हैं.
“जिसे गाने में बोलना आ जाए वह ज़माने पर छा गया. याद रहे,बातचीत करना गायन नहीं है पर सारा गायन बातचीत की सहजता तक पहुँचने को तरसता है.नये ज़माने के गायक-गायिका समझ लें कि लता ने कभी गाया ही नहीं है. गाने को ’बोला’ है.ख़ुद लता कहतीं हैं ’मुझे बातचीत जितना आकर्षित करती है उतना गाना नहीं’....यही कारण कि लता इफ़ेट को कभी पूरा नहीं समझा जा सकता .बस सुनिये और आनंद से माथा पीटते रहिये...” अजातशत्रु
कुछ जानकार इसे स्वर में पत्ती लगना भी कहते हैं. और इस सुरीले फ़टने को किसी और शब्द कहने का ज़रिया न होने से कोई और नाम देना भी मुमकिन नहीं है. तो आप ऐसा करें कि इस गीत को सुनते हुए यहाँ हमारी पोस्ट पर निगाह भी रखें. जहाँ जहाँ भी लताजी के स्वर में पती लगी है वहाँ गीत के बोल को आपकी सुविधा के लिये अण्डरलाइन किया गया है.लताजी इतनी सिध्दहस्त गायिका हैं कि गीत की मांग और संगीत निर्देशक अमरनाथजी निर्देशन का मान रखते हुए एक ख़ास जगह पर तीनों अंतरों में एक शब्द विशेष पर पत्ती लगा रहीं हैं. वैसे इस तरह पती का लगना नैसर्गिक रूप से ही संभव होता है. लेकिन यहीं तो लता करिश्मा कर गईं है. इस तरह से स्वर को थोड़ा फ़टा दिखा कर लोक-संगीत की गायकी का स्मरण दिलवाने का प्रयास भी संगीतकार कर रहा है. वह जताना चाहता है भोजपुरी गीतों की परम्परा के अनुरूप ही लताजी का स्वर उस अनूठी मिठास को सिरज रहा है. लता मंगेशकर माधुरी का अमृत सरोवर है.उसमें डूबकर कुछ भी निकले , ग़रीब कानों की अमीर सौग़ात बन जाता है. बस सुनते रहिये;और बुरे से भले बनते रहिये. लता मंगेशकर ने जो आवाज़ पाई है सो तो पाई है लेकिन उस आवाज़ के आगे उन्होंने जो एक गरिमामय,शास्वत और शालीन नारी ह्र्दय-धन पाया है उसकी नकल नहीं हो सकती. सांरगी के इंटरल्यूड के साथ कोकिल-कंठी लता मंगेशकर को सुनते जाइये और चंदा को घर बुला लीजिये. घर आजा मोरे राजा, मोरे राजा आजा तेरे बिना चंदा उदास फिरे घर आजा मोरे राजा, मोरे राजा आजा, आजा तेरा नाम लेके रूठे, कहना ना माने मेरा -२ इत उत लेके डोलूँ, चंदा न सोए तेरा, चंदा न सोए तेरा कि तेरे बिना चंदा उदास फिरे आजा रे नन्हा तेरा बहले नहीं बहलाए कुम्हलाया मुखड़ा हाए मोसे न देखा जाए -२ मोसे न देखा जाए कि तेरे बिना चंदा उदास फिरे आजा रे अब तो आजा मेरे भी थके दो नैना अँगना अँधेरा छाया गया दिन आई रैना -२ गया दिन आई रैना कि तेरे बिना चंदा उदास फिरे घर आजा मोरे राजा, मोरे राजा आजा, आजा
फिल्म : गरम कोट 1955 संगीत: अमरनाथ गीत: मजरूह सुल्तानपुरी कथा: राजेन्द्र सिंह बेदी
(अजाशत्रु का वक्तव्य लता दीनानाथ मंगेशकर ग्रामोफ़ोन संग्रहालय के प्रकाशन लता और सफर के साथी से साभार)
लता स्वर उत्सव में अब तक कोशिश रही है कि कुछ अनसुने या कमसुने गीत सुनवाए जाएँ. आगे कुछ लोकप्रिय गीत भी आपको सुनने को मिल सकते हैं.जो भी गीत आपको सुनवाये जा रहे हैं या हमारी सूची में शुमार हैं उनमें दो चीज़े स्थायी हैं.लता मंगेशकर और मेलडी; वैसे लता और मधुरता बात एक ही है. लताजी की गान-यात्रा की मीमांसा करना हमारे बूते के बाहर है बल्कि किसी के भी लिये भी मुश्किल है क्योंकि गीत बन जाने के बाद उस पर टीका टिप्पणी कर देना बहुत आसान है लेकिन संगीतकार बनकर आसमान में से धुर सिरजना किसी पराक्रम की दरकार रखता है. लता मंगेशकर गीतों को गाते समय आशिंक रूप से ख़ुद एक नायिका का रूप भी धर लेतीं हैं. इस स्वांग में वे कभी विरहिणी हैं,कभी याचक,कभी प्रेमिका,कभी बहन और कभी ज़िन्दगी का फ़लसफ़ा रचतीं एक विदूषी.
आज लता स्वर उत्सव के चौथे दिन जारी किये जा रहे गीत में वे चाँद की उपमा देते हुए अपने प्रेमी को आह्वान कर रहीं है कि “जब तक गगन में चाँद के जगने तक मेरे चाँद तुम मत सोना”. हिन्दी प्रेमल गीतों की भावधारा में पं.भरत व्यास के शब्द एक गरिमामय मादकता पैदा करते हैं. इन शब्दों को सुनें तो आपको लगे कि यह गीत श्रंगार रस का बेहतरीन उदाहरण हो सकता है. तू छुपी है कहाँ, आ लौट के आजा मेरे मीत, आधा है चंद्रमा और तुम गगन के चंद्रमा जैसे हिन्दी गीतों से चित्रपट जगत में एक सम्माननीय गीतकार के रूप में पं. भरत व्यास हम सबके लिये अनजाना नाम नहीं हैं. चाँद या चंद्रमा को केन्द्र में रख कर उनके दो गीतों का उल्लेख तो ऊपर ही हो चुका है
“लता उस स्वच्छमना,कोमल और आदर्श प्रेमिका की याद दिलाती है जिसे अनादि से पुरूष खोजता आया है. लता उस अमूर्त नारी को सिरज देती है जो ब्रह्मरस है, सृष्टि में ईश्वर के होने का दमदार हलफ़नामा है. लता न होतीं तो शायद हमें इतनी शिद्दत से अहसास भी नहीं होता कि यह क़ायनात सत्यं, शिवं, सुन्दरम से भीगी हुई है. प्रणाम लता मंगेशकर; तुम ईश्वर की सबसे पावन भेंट हो.” -अजातशत्रु
आज सुनवाया जा रहा गीत हिन्दी कविता का बेजोड़ नमूना है. इस गीत के शब्दों के अलावा चौंका रहा है दादा मन्ना डे का संगीत संयोजन. हम मन्ना दा के गायन से ही परिचित रहे हैं लेकिन भक्ति-धारा की इस फ़िल्म का यह प्यारा गीत महमोहक है. लता मंगेशकर ने यहाँ भी चिर-परिचित कारनामा किया है और वे अपने संगीतकार की विनम्र अनुगामिनी बन गईं हैं. तुम खोना नहीं पंक्ति के पंच को सुनते हुए आपको लग जाएगा कि ये मन्ना डे की छाप वाली रचना है. गीत की सिचुएशन, कविता और धुन के निर्वाह में सुकंठी लता मंगेशकर इस सृष्टि की शायद सबसे विलक्षण स्वर अभिव्यक्ति हैं. मन्ना दा ने पूरे गीत में मेण्डोलिन का आसरा लिया है.मुखड़े में ही झिलमिल तारे करते इशारे पंक्ति के बाद लताजी का संक्षिप्त सा आलाप आसमान में बिजली सा चमका है. गीत की बंदिश हो या क्लिष्ट; वे संगीतकार की चुनौती पर हमेशा खरी उतरतीं आईं हैं.लताजी अपने समकालीन गायक-गायिकाओं से कुछ आगे इसलिये भी नज़र आतीं हैं कि वे अपनी आवाज़ से शालीनता,कोमलता,स्वच्छता,स्निग्धता,और पवित्रता की अनोखी इबारत रच देतीं हैं. उनको सुनते हुए लगता है कि एक भारतीय नारी किसी तीर्थ-स्थल पर साफ़-सुथरे पाँवों से विचर रही है जिसके तलुवों को अभी तक किसी भी संसारी धूल ने स्पर्श नहीं किया है. आप तो इस शब्द-विलास को छोडिये गीत सुनिये.
गीत: जब तक जागे चाँद गगन में.. फिल्म: शिव कन्या 1954 गीत: भरत व्यास संगीत: मन्ना डे
लताजी की संगीतयात्रा के गलियारे में जितना पीछे जाओ,मेलोड़ी पसरी पड़ी मिलेगी. श्रोता-बिरादरी के इस मजमें में कोशिश है कि प्रतिदिन एक नये गीत और संगीतकार से आपको रूबरू करवाया जाए. एक घराने में रह कर, तालीम हासिल कर और परम्परा का अनुसरण कर तो कई कलाकारों ने सुयश पाया है लेकिन लताजी अलग-अलग तबियत,तासीर और तेवर वाले गुणी संगीतकारों को सुन कर हर बार करिश्मा कर जातीं हैं. अजातशत्रुजी एक जगह लिखते हैं कि लताजी भीतर से एकदम विरक्त हैं. स्वभाववश भी और बचपन से भुगत चुके तल्ख़ अनुभवों के कारण. असल में लता सिर्फ़ स्वयं से बात करतीं हैं या भगवान से. अजातशत्रुजी की बात की पुष्टि प्रस्तुत गीत से हो जाती है. मुखड़े में ही लताजी परमपिता से शिकायत भरे लहजे या पीड़ा को अभिव्यक्त करते हुए जब गीतकार आई.सी.कपूर की पंक्तियों को स्वर देतीं हैं तो लगता है सारे जहान का दर्द इस आवाज़ में सिमट आया है. तमाम बेबसी,दु:ख की तीव्रता और अपने कष्ट में शिकायतों का बयान क्या ख़ूबसूरती कर गईं है हमारे समय की यह स्वर-किन्नरी.
“सच तो यह है कि इस ज़माने में जब चारों तरफ़ नाउम्मीदी,उदासी और तन्हारी पसरी हुई है और ख़ुशी –चहक की लौ धुँधलाती जा रही है,भले और कोमल गीत दिल को राहत और सुक़ून दे जाते हैं.अतीत के सिनेमा का हम पर यह बड़ा अहसान है”-अजातशत्रु
पंकज राग के सुरीले ग्रंथ (प्रकाशक:राजकमल) में लिखा है कि आज पूर्णत: विस्मृत गोविंदराम एक ज़माने में इतने महत्वपूर्ण संगीतकार थे कि जब के.आसिफ़ ने ’मुग़ल-ए-आज़म’फ़िल्म की योजना बनाई थी तो संगीतकार के रूप में गोविंदराम को ही चुना था. जब के.आसिफ़ साहब ने अपनी तस्वीर का निर्माण शुरू की तब तक गोविंदरामजी इस दुनिया से कूच कर चुके थे. संगीतकार सी.रामचंद्र के काम में सज्जाद साहब के बाद सबसे ज़्यादा गोविंदराम ही प्रतिध्वनित हुए हैं.इस गुमनाम संगीतकार ने १९३७ में फ़िल्म जीवन ज्योति से अपने कैरियर की शुरूआत की. उनकी आख़िरी फ़िल्म थी मधुबाला-शम्मी कपूर अभिनीत नक़ाब (१९५५) जिसमें लताजी के कई सुरीले गीत हैं.
लता स्वर उत्सव के बहाने हम संगीत के सुनहरे दौर की जुगाली कर रहे हैं. इन तमाम गीतकारों,संगीतकारों और लता मंगेशकर के प्रति हमारी सच्ची आदरांजली यही है कि किसी तरह से हम इस अमानत को नये ज़माने के श्रोताओं तक ले जाने का प्रयास करें. इंटरनेट के उदभव के बाद ये थोड़ा आसान हुआ है. सुनकार मित्रों से गुज़ारिश है कि अपने तईं आप भी श्रोता-बिरादरी के इस उत्सव को प्रचारित करें.अपने ट्विटर अकाउंट या फ़ेसबुक दीवार पर इस संगीत समागम का ज़िक्र करें.क्योंकि जब तक यह ख़ज़ाना युवा पीढ़ी तक नहीं पहुँचेगा तब तक इन कोशिशों का अंतिम मकसद पूरा न होगा. फ़िल्म:माँ का प्यार वर्ष: १९४९ गीतकार:आई.सी.कपूर संगीतकार:गोविंदराम
(अजातशत्रुजी का वक्तव्य लता दीनानाथ मंगेशकर ग्रामोफ़ोन रेकॉर्ड संग्रहालय प्रकाशित ग्रंथ बाबा तेरी सोन चिरैया से साभार)
लता स्वर उत्सव के दूसरे दिन और और हिन्दी दिवस प्रसंग पर प्रस्तुत गीत पं.नरेन्द्र शर्मा का जैसे महान हिन्दी सेवी के प्रति श्रोता-बिरादरी की भावपूर्ण आदरांजली है. चित्रपट गीतों में हिन्दी गीतिधारा और विविध भारती जैसे लोकप्रिय संस्थान की स्थापना में पण्डितजी का अवदान अविस्मरणीय है. स्वयं लताजी पण्डितजी को पापाजी जैसा आदर संबोधन देतीं थीं और हिन्दी गीतों के बोलों की अदायगी और उच्चारण के लिये हमेशा मशवरा किया करतीं थीं. इस गीत में लताजी के गायन पर मराठी नाट्य संगीत और नूरजहाँ प्रभाव स्पष्ट सुनाई देता है. रात जा रही है के “है” को जिस खरज से लताजी गा रही हैं वह नूरजहाँ युग की मीठी याद ही तो है. अंतरें में झर रहीं और आदोंलित करने वाली मुरकियाँ मराठी नाट्य संगीत में सदैव सुनाई देती हैं.
“कुदरत ने लता की टेर फ़िल्मों और निर्माताओं के नोटों या पात्र या सिचुएशन के लिये नहीं बनाई. वह ज़माने को राहत बख़्शने के लिये भेजा गया पावन स्वर है”
-अजातशत्रु
मूलत: यह एक लोरी गीत है .इंसानी रिश्तों और भक्ति भाव के गीतों को तो लताजी कुछ अधिक समर्पित भाव से गातीं रहीं हैं.सुनने में लताजी का हरएक गीत आसान सुनाई देता है लेकिन कभी आप उसे आज़मा कर देखें तो महसूस करेंगे कि जो गीत लताजी ने जितनी सरलता से गाया है उसे दोहराना उतना ही कठिन है. लताजी के ऐसे गीतों की महास्वामिनी हैं. इस गीत में पं.नरेन्द्र शर्मा के प्रति भी श्रध्दा से मन जाता है. वे एक समर्थ कवि होते हुए भी चित्रपट गीत माध्यम को कितनी विशेषज्ञता से निभाते हैं.
संगीतकार वसंत देसाई के किसी भी गीत को सुनना यानी शास्त्रीय संगीत के अलौकिक आरोह-अवरोह का आचमन करना है लेकिन वे लोकरूचि को समझने वाले भी बेजोड़ निर्देशक थे. प्रार्थना और राष्ट्र-भक्ति को अभिव्यक्त करने वाले गीतों में वे महाराष्ट्र के लोक संगीत का बखूबी इस्तेमाल करते थे.तीन मिनट की संगीत विधा में जो मधुरता वसंत देसाई ने जगाई है वह हम सुनकारों की अनमोल धरोहर है. संयोग है कि लता स्वर उत्सव के प्रथम एवं द्वितीय दोनों गीतों में गिटार सुनाई दी है.
तो आनंद लीजिये आधी सदी से ज़्यादा लता मंगेशकर;प.नरेन्द्र शर्मा और पं.वसंत देसाई(देसाईजी के नाम के आगे पण्डित लगाना बनता है) की इस इस तिकड़ी से सिरजे गये गीत का.हाँ नेक मशवरा है कि इस गीत को रात्रि बेला में सुने और कुछ देर के लिये भूल जाएँ कि फ़िलहाल कौन सा साल चल रहा है.
फ़िल्म : उध्दार
गीतकार:पं.नरेन्द्र शर्मा
संगीतकार:पं.वसंत देसाई
वर्ष:१९४९
(एक दुर्लभ चित्र स्मृति : महाराष्ट्र दिवस की प्रस्तुति में साफ़ा बांधे हुए संगीतकार वसंत देसाई और माइक्रोफ़ोन पर लता मंगेशकर.यह चित्र एवं श्री अजातशत्रु की टिप्पणी लता दीनानाथ मंगेशकर ग्रामोफ़ोन रेकॉर्ड संग्रहालय प्रकाशित पुस्तक “बाबा तेरी सोन चिरैया” से साभार)
लताजी के स्वर उत्सव में आज हमने आपको स्नेहल भाटकर का एक गीत सुनाने का निश्चय किया है। स्नेहल भाटकर ने कई हिन्दी फिल्मों में संगीत दिया जिनमें से प्रमुख है हमारी याद आयेगी। इस फिल्म का गीत कभी तन्हाईयों में बहुत प्रसिद्ध हुआ और साथ ही गीत की गायिका मुबारक बेगम भी।
यूनुस खान ने अपने ब्लॉग रेडियोवाणी पर स्नेहल भाटकर पर एक विस्तृत लेख भी लिखा था और उनके संगीतबद्ध गीत भी सुनवाये थे। आप उन्हें यहाँ देख सकते हैं।
स्नेहल भाटकर के निर्देशन में महान गायक - संगीतकार हेमंत कुमार ने भी गीत गाया था; लहरों पे लहर, उल्फ़त है जवां...बहरहाल आज हम जो आपको गीत सुनाने जा रहे हैं वह हिन्दी में ना होकर मराठी में है। कहते हैं ना संगीत किसी भाषा का मोहताज नहीं होता! इस गीत के बोल समझ में नहीं आते, अर्थ पता नहीं चलता ; फिर भी गीत सीधे दिल में उतर जाता है। इस गीत की खास बात यह है कि खुद स्नेहल भाटकर ने लताजी का साथ दिया है। स्नेहल एक अच्छे संगीतकार होने के साथ बहुत अच्छे गायक भी थे। स्नेहल भाटकर का २९ मई को निधन हो गया था।
आईये सुनते हैं इस सुमधुर मराठी गीत को।
जैसा कि आप जानते हैं कि 28 सितम्बर को भारत-रत्न लता मंगेशकर अपने जीवन के 80 वर्ष पूर्ण करने जा रहीं हैं।
श्रोता-बिरादरी लता जी के इस जन्मोत्सव को अविस्मरणीय बनाने के लिये लाई है, लता/80:स्वर-उत्सव...पन्द्रह नामचीन और रचनाधर्मी संगीतकारों के साथ लताजी की जुगलबंदी। हर दिन एक नया संगीतकार और आवाज़ हमारी जानी पहचानी। ये है इस उत्सव की पहली कड़ी
बहुत पुरानी बात है निर्माता एस मुखर्जी ने फिल्म शहीद 1948 के लिये लता जी को यह कह कर नापसंद कर दिया था कि उनकी आवाज बहुत ज्यादा पतली है। उस समय संगीतकार गुलाम हैदर ने मुखर्जी को चेतावनी दी थी कि देखियेगा एक दिन यह लड़की सबसे आगे निकलेगी, और वाकई एक दिन गुलाम हैदर की भविष्य वाणी सच निकली और लताजी ने अपनी आवाज से सब का मन मोह लिया।
लता जी को अगर सबसे ज्यादा प्रसिद्धी मिली तो वो थी संगीतकार खेमचन्द प्रकाश की संगीतबद्ध फिल्म जिद्दी 1948 के गीत चंदा रे जा रे जारे से। और आगे चल कर इन्हीं खेमचन्द प्रकाशजी ने लता जी से महल1949 फिल्म में गाना गवाया, आयेगा आने वाला... । यह गीत इतना प्रसिद्ध हुआ कि आज ७० साल बाद भी अगर कहीं बज रहा हो तो सुनने वाले के कदम ठिठक जाते हैं।1949 में चार फिल्म ऐसी आई जिनसे लता जी सबसे आगे निकल गई और वे फिल्में है बरसात, अन्दाज, दुलारी और महल!
आयेगा लता जी ने अपना पहला गीत भले ही मराठी में सदाशिव राव नार्वेकर और हिंदी में दत्ता दावजेकर के निर्देशन में गाया हो पर प्रसिद्धी तो आयेगा आने वाला से ही मिली। इन्ही खेमचन्द्रजी ने जिद्दी फिल्म में किशोरकुमार को पहला ब्रेक दिया और किशोर दा ने गीत गाया . जीने की दुवाय़ें क्यूं मांगू मरने की तमन्ना कौन करे कौन करे.....
फिलहाल, आपको खेमचंद प्रकाशजी की इस पहली कड़ी में आज श्रोता बिरादरी आपको वही गीत सुनवा रही है जिससे लता, स्वर कोकिला, स्वर साम्राज्ञी लता मंगेशकर बनी।
और वह गीत है गीत है चंदा रे जा रे जा रे।
प्रस्तुत गाने में बिरहन नायिका अपने प्रीतम की शिकायत कर रही है और चंदा से कह रही है कि मेरा यह संदेश मेरे प्रियतम को जा कर सुनाओ। हिन्दी फिल्मों में इस थीम पर कई गाने बने हैं इसमें कभी मैना, कभी चंदा तो कभी वर्षा के पहले बादलों के माध्यम से नायिका अपना संदेश भेज रही है। परन्तु इस गाने की तो बात ही निराली है। राग छाया नट में बना यह गीत एक बार सुनने से लताजी के चाहकों का मन नहीं भरता।
गीतकार प्रेम धवन ने इतना बढ़िया गीत लिखा कि उसके बारे में लिख पाना बहुत ही मुश्किल काम है।
पहले पैरा में नायिका कह ( गा) रही है किसके मन में जाय बसे हो हमरे मन में अगन लगाये .. हाय इस मासूमियत पर कौन ना मर जाये! नायिका आगे कहती है हमने तोरी याद में बालम , दीप जलाये दीप बुझाये और
श्रोता-बिरादरी लता जी के इस जन्मोत्सव को अविस्मरणीय बनाने के लिये लाई है, लता/80:स्वर-उत्सव...पन्द्रह नामचीन और रचनाधर्मी संगीतकारों के साथ लताजी की जुगलबंदी। हर दिन एक नया संगीतकार और आवाज़ हमारी जानी पहचानी|
यहाँ शिकायत करते हुए कहती है फिर भी तेरा मन ना पिघला हमने कितने नीर बहाये.. नायिका जब यह पंक्तियां गाती है हमारी आंखों के सामने खेमचन्द्रजी और और लताजी वह प्रभाव पैदा करने में सफल होते हैं। मानो हमारी आंखो के सामने ही नायिका अपने प्रियतम से यह शिकायत कर रही है।
आगे नायिका दूसरे अंतरे में कहती है घड़ियां गिन गिन दिन बीतत हैं अंखियों में कट जाये रैना, तोरी आस लिये बैठे हैं हंसते नैना रोये नैन, यहां हम आपको एक बात बताना दाहेंगे कि दोनों अंतरे की तीसरी पंक्तियों में संगीत अपनी लय से थोड़ा अलग होता है ( पहली बार फिर भी तेरा मन ना पिघला और दूसरी बार अब) हमने तोरी याद में प्रीतम पग पग पे है नैन बिछाये, चंदा रे.. और यह थोडा सा अलग लय से हटना ही इस गीत का सबसे मजबूत पहलू है। यही गीत को ज्यादा प्रभावशाली बनाता है।
दो अंतरों के बीच में संगीतकार ने जल तरंग का बहुत सुंदर उपयोग किया है। वह बहुत ही सुंदर है। उस जमाने के संगीतकारों ने खेमचन्द्र जी से एक बात यह सीखी होगी कि गीत में वाद्ययंत्रों का उपयोग एक सीमा में ही होना चाहिये। आपने ध्यान दिया होगा कि इस गीत में भी वाद्ययंत्र बहुत कम होते हुए भी गीत में सही तरीके से उपयोग होने से गीत इतना सुंदर बन पाया है।
इस गीत में जितना कमाल संगीतकार और गायिका ने किया है उतना ही कमाल गीतकार प्रेम धवन ने किया है। शब्दों को गीत में इतनी खूबसूरती से पिरोना हरेक के बस की बात नहीं।
आइये गीत सुनते हैं
चंदा रे जा रे जा रे
पिया से संदेसा मोरा कहियो ना मोरा तुम बिन जिया लागे रे पिया मोहे इक पल चैन ना आए ।।
किसके मन में जाय बसे हो हमरे मन में अगन लगा के हमने तोरी याद में बालम दीप जलाए दीप बुझाए
फिर भी तेरा मन ना पिघला हमने कितने नीर बहाए ।। चंदा रे ।।
घडि़यां गिन गिन दिन बीतत है अंखियों में कट जाये रैना तोरी आस लिए बैठै हैं हंसते नैना रोते नैना
हमने तोरी राह में पीतम पग पग पे है नैन बिछाए चंदा रे ।।
कल की कड़ी में बारी होगी संगीतकार नौशाद की ।
लगातार जारी है लता/80 स्वर-उत्सव
अपनी धुनों में ख़ालिस भारतीयपनका जादू जगाने वाले संगीतकार एस.एन.त्रिपाठी की सन 1959 में आई फ़िल्म है रानी रूपमती। त्रिपाठीजी के ज्यादातर काम में शास्त्रीय संगीत या लोक संगीत का असर सुनाई देता है। परवरदिगारे आलम तेरा ही है सहारा (हातिमताई) जरा सामने तो आओ छलिये (जनम जनम के फ़ेरे) झूमती चली हवा याद आ गया कोई (संगीत सम्राट तानसेन) के अलावा चौथा गीत था आ लौट के आजा मेरे मीत (रानी रूपमती) इसी फ़िल्म के एक अन्य गीत का ज़िक्र श्रोता-बिरादरी के पहले पुष्प के रूप में आज कर रहे हैं....उड़ जा भंवर और आ जा आ जा भँवर ....
एस एन त्रिपाठी की ज़्यादातर फ़िल्मे पौराणिक या भक्ति फ़िल्में ही हैं लेकिन उसमें भी उन्होंने मेलडी के ऐसे कलेवर इजाद किये हैं जो समग्र रूप से चित्रपट संगीत के सुरीलेपन की नई इबारत रचते हैं। उनकी प्रयोगधर्मिता का अंदाज़ इसी बात से लगाया जा सकता है कि आज प्रस्तुत गीत को उन्होंने राग दरबारी में कम्पोज़ कर पहले मन्ना डे गवाया है और फ़िर यही गीत राग सारंग में स्वर-मूर्ति लता मंगेशकर के कंठ झरा है।
गाने का आग़ाज़ मन्नाडे की खरजदार आवाज़ के हल्के-से आलाप से होता है । मन्ना डे जिनकी प्रतिभा का सही आकलन भारतीय फिल्म संगीत में नहीं हो सका । उन्हें बहुधा शास्त्रीय और मज़ाहिया गानों तक ही सीमित कर दिया गया था । ज़रा इस गाने में मन्नाडे के कंठ की कलाबाज़ी सुनिए और नतमस्तक हो जाईये उनकी प्रतिभा और तैयारी के आगे । गाने के दो भाग हैं--एक में मन्ना डे भंवरे को उड़ने के लिए प्रेरित कर रहे हैं और दूसरे में लता मंगेशकर रानी रूपमती के रूप में भंवरे को लौटने यानी संसार में बने रहने को प्रेरित करती हैं । कवि भरत व्यास ने इस गाने को आध्यात्मिकता की जो ऊंचाई दी है वो अनमोल है । आमतौर पर हम गाने तो सुनते हैं लेकिन ज्यादातर होता ये है कि वाद्य-संयोजन और गीत के बोलों पर हमारा ध्यान नहीं जाता । श्रोता-बिरादरी के ज़रिए हम ऐसा समुदाय खड़ा करना चाहते हैं जो गाने की रस-वर्षा का सही आनंद ले सके । ज़रा इस गाने के बोलों पर तो ग़ौर कीजिए---
देख वो सूरज की किरणें आ रही हैं झूमतीं
चल गगन ओर, तेरा मुख हवाएं चूमतीं
बावरे उठ ज्ञान से मखमल का घेरा दूर कर
क्या बात है !!! मन्ना दे जैसी द्रुत गति प्रदान करते हैं इस गाने में उससे भला कौन मन-भंवर ना उड़ जायेगा । कमाल है । हमें पूरा यक़ीन है कि श्रोता-बिरादरी की इस पहली पेशकश की गूंज आपके मन-आंगन में हफ्ते भर तो क्या सदा-सर्वदा फैलेगी । इस गाने के अंत में वाद्यों से भंवरे की जो गुंजार पैदा की गयी है उस पर आपका ध्यान ज़रूर जाना चाहिए । ये भी जिक्र कर दें कि जिस ज़माने में ये गाना आया था तब गायक, गायिका और पूरे साजिंदों के साथ संगीतकार एक टेक में गाना रिकॉर्ड करते थे, पूरी रिहर्सल के साथ । इस दृष्टि से भी ये गीत 'स्टैन्डिंग ओवेशन' का हक़दार है ।
यहां उस्ताद बड़े ग़ुलाम अली ख़ां की बात याद आती है । संभवत: लता जी की आवाज़ के एक गाने को सुनकर वो ठिठक गए थे और उन्होंने ये कहा था कि तीन मिनिट के गाने में जो असर लता पैदा करती हैं, वो शास्त्रीय संगीत के महारथियों से बढ़कर है । यहां एक बात और रेखांकित करनी है और वो ये कि फिल्म-संगीत में एक ज़माने में शास्त्रीय-संगीत का अनिवार्य स्थान था । और ये जो 'था' शब्द है ये दुखद है । काश कि हम इस 'था' को 'है' में बदल सकते ।
प्रस्तुत गीत में लताजी ने तीन मिनट में गूलूकारी का जो जलवा दिखाया है वह उन लोगों को एक मुँहतोड़ जवाब है जो फ़िल्म संगीत को अछूत मानते हैं। तीव्र तानों से लताजी जिस तरह से इस बंदिश को बहला रही हैं वह उनके कंठ में समोए क्लासिकल रियाज़ की तसदीक करने के लिये काफ़ी है। जब वे इस गीत में शास्त्रीय मुरकियाँ (आ जा शब्द को जिस घुमावदार तरीक़े से वे गा रही हैं जिसमें ’आ’ कार की झन्नाहट सुनाई देती है जैसे तपते तवे पर छन्न से कोई पानी की बूँदे छींट दे)
गीत के अंत में जिस तरह से अति-तार सप्तक (कंठ की जो सीमा हैं उसके परे जाकर पराकाष्ठा को छूने का करिश्मा) यहाँ लताजी रानी रूपमती के लिये गाते हुए गायन विधा की महारानी बन कर उभरीं हैं। चित्रपट गायन में गायक को हर तरह का रंग कैसे निभाना चाहिये ये तो कोई लता जी से सीखे.कहना बेमानी न होगा कि लताजी एक श्रेष्ठ विद्यार्थी रहीं है, वे संगीतकार की रचना को जिस तरह से अपने गले से उतार देती है तब लगता है धुन निहाल और संगीतकार मालामाल हो गया है.रानी रूपमती एक ’एरा’ फ़िल्म है ऐसे में गायन में एक शहाना तबियत सुनाई देना चाहिए जिसे लता मंगेशकर के अलावा और कौन गा सकता है।
इस गीत में न केवल गायन का वैभव है बल्कि नृत्य के तेवर भी जलवागर हो रहे हैं। गायन में अति-तीव्रता और लयकारी भी अति-द्रुत पर जा पसरी है इस गीत में। एस.एन.त्रिपाठी के ज़रिये हिन्दी चित्रपट की अनमोल धरोहर है ये गीत। सारे विशेषणों को लिख देने के बाद भी हमारा बावरा मन यह कहने तो विवश है कि लता मंगेशकर अपनी गायकी के ज़रिये एक गान-सुन्दरी रूपमती और उसके अनन्य प्रेमी बाजबहादुर और उनके ऐतिहासिक शिल्प मांडू को एक लम्हा हमारे मन-मंडप मे जीवंत कर देती हैं। अक़्ल काम नहीं करती रूपमती को याद करें या लता मंगेशकर को सलाम करें।
मन्ना डे की पंक्तियां
उड़ जा भंवर माया कमल का आज बंधन तोड़ के
रंग रूत का लाल और रूप भी तो कमाल है
जिन पखुरियों को तो झूले, वो तेरा जंजाल तेरा जाल है
कहीं और जा जा जा के दिल लगा कलियों की गलियां छोड़ के
देख वो सूरज की किरणें आ रही हैं झूमतीं
चल गगन ओर, तेरा मुख हवाएं चूमतीं
बावरे उठ ज्ञान से मखमल का घेरा दूर कर
तन है काला इसलिए मन का अंधेरा दूर कर, दूर कर
तुझको बुलाये रे,
तुझको बुलाता है सवेरा देख मुखड़ा मोड़के
उड़ जा भंवर ।
उड़ जा उड़ जा उड़ जा भंवर ।।
लता जी की पंक्तियां
छोड़ चला क्यूँ ओ निर्मोही कैसा तेरा प्यार
रो रो करे पुकार कँवलिनि बीती जाये बहार
आजा आजा भँवर सूनी डगर सूना है घर आजा
ओ आजा आजा भँवर सूनी डगर सूना है घर आजा
ओ आजा
न सता रे आ रे आ रे
मोरी अँखिया उदासी, तोरे दरस की प्यासी
पल पल छिन छिन देखें राह तिहारी
आजा आजा भँवर सूनी डगर सूना है घर आजा
ओ आजा
गुन गुन धुन सुन सुन तेरी हरजाई
तन मन की रे मैंने सुध बिसराई -२
हरजाई
आजा आजा भँवर सूनी डगर सूना है घर आजा
आजा भँवर सूनी डगर
आजा -६
आजा आजा भँवर सूनी डगर सूना है घर आजा आ ।।
श्रोता-बिरादरी साप्ताहिक-ब्लॉग होगा । हर रविवार को लगभग नौ बजे के आसपास आप यहां पधारें और हर हफ्ते एक कालजयी गीत का रसास्वादन करें ।