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Sunday, September 17, 2017

मुरली मनोहर कृष्ण कन्हैया...

मित्रों ,
आपकी शिकायत जायज भी है कि हम इस ब्लॉग पर नियमित ध्यान नहीं दे पा रहे हैं,दीपिका को हर रविवार किसी अच्छे गाने का इंतजार रहता है तो सुनीलजी कहते हैं कि क्यों ना इस ब्लॉग को बंद करने की सूचना दे दी जाये या फिर किसी और को सौंप दिया जाये?
पर मित्रों आप इन दिनों देख रहे होंगे कि हम तीनों के अपने ब्लॉग पर भी हम नियमित नहीं लिख पा रहे हैं, कारण जो कोई भी हो पर हम अपनी गलती स्वीकार करते हैं, हमारी कोशिश रहेगी कि हर रविवार नहीं पर ज्यादा से ज्यादा पोस्ट इस ब्लॉग पर हम लिखें।
आज कई दिनों बाद हम आपको एक ऐसा गीत सुनवाने जा रहे हैं हमें आशा है कि इसे सुनकर आपकी नाराजगी कुछ हद तक कम जरूर होगी। यह गीत है पंडित वसंत देसाई द्वारा संगीतबद्ध मुरली मनोहर कृष्ण कन्हैया...
इस गीत में आपको शास्त्रीय गीत के साथ रैप गाने का भी असर दिखाई देगा।

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मुरली मनोहर कृष्ण कन्हैया
जमुना के तट पे विराजे हैं- 2
मोर मुकुट पर कानों में कुण्डल
कर में मुरलिया मुरलिया मुरलिया साजे है

इतने में दी दिखाई राधा
राधा राधा राधा
पनघट पर से आय रही
कतराय रही, शरमाय रही
मुसकाय रही बलखाय रही

इधर बंशी में लहर सी उठी
कृष्ण के मुख पर सजने लगी
पर आप ही आप से
बजने लगी बजने लगी बजने लगी

लम्बा सा घूँघट काढ़ लिया
बंशी के सुरों पर झूम गई
हर सरत डगरिया मोह ली
मोहन की ओर ही
दुमकित दुमकित दुमकित धूम गई

फिर कृष्ण कन्हैया नटखट ने
राधा की कलैया थाम लई
राधा ने पुकारा- 2
हाय दई कोई आओ सखी कोई आओ सखी
फिर हाथ छुड़ा कर बोली हटो -2
अब जावो डगरिया छोड़ मोरी
कहा कृष्ण ने चुप रह
वरना दूँगा गगरिया फोड़ तोरी

राधा तब उसकी शोख़ी पर कुछ बिगड़ी भी
मुसकाई भी
फिर कॄष्ण से पूछा
कौन हो तुम क्या नाम है जी
क्या काम है जी क्या काम है जी
ओ
हमें गोप गुआला कहते हैं \-२
और कृष्ण दिया है नाम हमें नाम हमें
कोई नटवर गिरधर कहता है \-२
और कोई कहे घनश्याम हमें

घनश्याम नहीं तुम काले हो \-२
तुम नटखट हो मतवाले हो मतवाले हो
चितचोर हो माखन चोर नहीं \-२
सुख\-चैन चुराने वाले हो
घनश्याम नहीं

राधा ने उनको हाथ दिया
और कृष्ण ने उनका साथ दिया
कुछ बात हुई कुछ घात हुई
इतने में सूरज डूब गया \-२
राधा की पायल जाग उठी
दोनों में कला की राग उठी

अब रैन को दीप सँवारे थे
और नील गगन पे तारे थे
रैन को दीप सँवारे थे
और नील गगन पे तारे थे
राधा को विदा के इशारे
राधा को विदा के इशारे थे
राधा ने आँचल बाँध लिया
मुरली को सम्भाला माधव ने



Wednesday, September 14, 2011

मीठी लोरी : रात जा रही है नींद आ रही है

लता स्वर उत्सव के दूसरे दिन और और हिन्दी दिवस प्रसंग पर प्रस्तुत गीत पं.नरेन्द्र शर्मा का जैसे महान हिन्दी सेवी के प्रति श्रोता-बिरादरी की भावपूर्ण आदरांजली है. चित्रपट गीतों में हिन्दी गीतिधारा और विविध भारती जैसे लोकप्रिय संस्थान की स्थापना में पण्डितजी का अवदान अविस्मरणीय है. स्वयं लताजी पण्डितजी को पापाजी जैसा आदर संबोधन देतीं थीं और हिन्दी गीतों के बोलों की अदायगी और उच्चारण के लिये हमेशा मशवरा किया करतीं थीं. इस गीत में लताजी के गायन पर मराठी नाट्य संगीत और नूरजहाँ प्रभाव स्पष्ट सुनाई देता है. रात जा रही है के “है” को जिस खरज से लताजी गा रही हैं वह नूरजहाँ युग की मीठी याद ही तो है. अंतरें में झर रहीं और आदोंलित करने वाली मुरकियाँ मराठी नाट्य संगीत में सदैव सुनाई देती हैं.
“कुदरत ने लता की टेर फ़िल्मों और निर्माताओं के नोटों या पात्र या सिचुएशन के लिये नहीं बनाई. वह ज़माने को राहत बख़्शने के लिये भेजा गया पावन स्वर है”
-अजातशत्रु
मूलत: यह एक लोरी गीत है .इंसानी रिश्तों और भक्ति भाव के गीतों को तो लताजी कुछ अधिक समर्पित भाव से गातीं रहीं हैं.सुनने में लताजी का हरएक गीत आसान सुनाई देता है लेकिन कभी आप उसे आज़मा कर देखें तो महसूस करेंगे कि जो गीत लताजी ने जितनी सरलता से गाया है उसे दोहराना उतना ही कठिन है. लताजी के ऐसे गीतों की महास्वामिनी हैं. इस गीत में पं.नरेन्द्र शर्मा के प्रति भी श्रध्दा से मन जाता है. वे एक समर्थ कवि होते हुए भी चित्रपट गीत माध्यम को कितनी विशेषज्ञता से निभाते हैं.

संगीतकार वसंत देसाई के किसी भी गीत को सुनना यानी शास्त्रीय संगीत के अलौकिक आरोह-अवरोह का आचमन करना है लेकिन वे लोकरूचि को समझने वाले भी बेजोड़ निर्देशक थे. प्रार्थना और राष्ट्र-भक्ति को अभिव्यक्त करने वाले गीतों में वे महाराष्ट्र के लोक संगीत का बखूबी इस्तेमाल करते थे.तीन मिनट की संगीत विधा में जो मधुरता वसंत देसाई ने जगाई है वह हम सुनकारों की अनमोल धरोहर है. संयोग है कि लता स्वर उत्सव के प्रथम एवं द्वितीय दोनों गीतों में गिटार सुनाई दी है.
तो आनंद लीजिये आधी सदी से ज़्यादा लता मंगेशकर;प.नरेन्द्र शर्मा और पं.वसंत देसाई(देसाईजी के नाम के आगे पण्डित लगाना बनता है) की इस इस तिकड़ी से सिरजे गये गीत का.हाँ नेक मशवरा है कि इस गीत को रात्रि बेला में सुने और कुछ देर के लिये भूल जाएँ कि फ़िलहाल कौन सा साल चल रहा है.



फ़िल्म : उध्दार
गीतकार:पं.नरेन्द्र शर्मा
संगीतकार:पं.वसंत देसाई
वर्ष:१९४९


(एक दुर्लभ चित्र स्मृति : महाराष्ट्र दिवस की प्रस्तुति में साफ़ा बांधे हुए संगीतकार वसंत देसाई और माइक्रोफ़ोन पर लता मंगेशकर.यह चित्र एवं श्री अजातशत्रु की टिप्पणी लता दीनानाथ मंगेशकर ग्रामोफ़ोन रेकॉर्ड संग्रहालय प्रकाशित पुस्तक “बाबा तेरी सोन चिरैया” से साभार)

 
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