समय है कि किसी नाक़ाबिल को को झोली भर कर श्रेय देता है और किसी में आकंठ प्रतिभा होने के बाद भी नहीं. राजस्थानी मरूभूमि के बाशिंदे जमाल सेन साहब भी कुछ ऐसे ही थे जिनके साथ वक़्त की बेरहमी में खूब सताया. पर प्रतिभा कब हार मानती है. वे वक़्त के थपेड़ों से बेख़बर मेलडी को सिरजते रहे. आज लता स्वर उत्सव में आज जमाल सेन का भावुक स्मरण कर हम एक तरह से मधुरता को अपना सलाम पेश कर रहे हैं या यूँ कहें श्राद्ध पर्व में उनकी आत्मा की शांति का अर्घ्य दे रहे हैं.
जमाल सेन जी को राज-रजवाड़ों की तहज़ीब विरासत में मिली. नृत्य और राजस्थानी लोक संगीत में पारंगत थे. फ़िल्म संगीत की ओर पैसे के लिये आये लेकिन कभी भी पाप्युलर कल्चर के नाम पर धुनों का कचरा नहीं किया. यदि निष्पक्ष रूप से लता-गीतों का शतक रचा जाय (यथा भतृहरि का श्रंगार शतक) तो निश्चित रूप से जमाल सेन का वह गीत उसमें ज़रूर शामिल होगा जो आप श्रोता बिरादरी की रविवारीय पेशकश है. ख़रामा ख़रामा हम इस उत्सव की समापन बेला की ओर आ रहे हैं तो लाज़मी है कि कुछ ऐसा सुन लिया जाए जो आजकल नहीं सुना जा रहा है. एच.एम.वी के एलबम रैयर जेम्स भी यह गीत शुमार किया गया है. इस विस्मृत से संगीतकार की चर्चित फ़िल्में थीं
शोख़ियाँ,दायरा,अमर शहीद पतित पावन और कस्तूरी. गाने की शुरूआत में पखावज की छोटी सी आमद और बाद में हारमोनियम के ताल पर गूँजता मंजीरा इस गीत के ठेके को समृध्द करता है.शुरूआती दोहे के बाद सितार के छोटे छोटे कट लता का दिव्य स्वर क़यामत ढ़ाता है. सुपना बन साजन आए में सुपना बन को लताबाई ने जैसी फ़िरत दी है वह करिश्माई है. फ़िर दोहरा दें कि जहाँ जहाँ हमारे समय की इस किवंदंती ने सरल गाया है उसे दोहराना कठिन हो गया है.
लता मंगेशकर जिस आवाज़ और जज़्बाती गायिकी को लेकर आईं वह आंइस्टीन के सापेक्षतावाद की विज्ञानिक खोज की तरह युगांतरकारी घटना है.इतिहास के चौराहे पर एक नितांत नया मोड़ या बहती हुई नदी का एक कम्पलीट टर्न-अबाउट.इस आवाज़ में ताज़गी थी.झरने सी खलखलाहट थी.अछूते वन-प्रांतर का पावित्र्य था. लता के कंठ में अनजाने वही किया जो विवेकानंद की वाणी ने पाश्च्यात्य में किया-अजातशत्रु
लता मंगेशकर इस गीत में महज़ एक गायिका नहीं अपने समय की समग्र संस्कृति बन गईं हैं. ख़ूशबू और बेतहाशा ख़ूशबू का वितान सजातीं लता किसी कुंजवन की कोमल सखी सी विचर रहीं हैं इस गीत में. नायिका तो परदे के चलके के साथ ओझल हो जाती है लेकिन ये गीत उसकी मासूम छवि हो हमारे मानस में हमेशा जीवंत बना देते हैं. अजातशत्रुजी एक जगह लिखते हैं कि लता एक अलहदा सी सुवास हैं. अब उसे कोई नाम नहीं दिया जा सकता. पर महसूस किया जा सकता है. यह तत्व अन्य गायक-गायिका में नहीं मिलता. लता के गले में तुलसी की पत्ती है.
लगता है लता जमाल सेन की धुन को पिछले जन्म में सुन चुकीं हैं.वे जिस सहजता से इन शब्दों को अपने कंठ में उतार कर हमारे कानों को संगीत का अलौकिक आचमन करवा रहीं हैं वह हमारे कलुष को धोने के लिये काफ़ी है. इस गीत को सुनते वक़्त लगता है हम मीरा के मंदिर हैं जहाँ वे अपने साँवरे को ये गीत सुनाते सुनाते मोगरे की माला पहना रहीं हैं. अब सुन भी लीजिये ये गीत और लता मंगेशकर को जुग जुग जीने की दुआ दे दीजिये...
लता मंगेशकर जिस आवाज़ और जज़्बाती गायिकी को लेकर आईं वह आंइस्टीन के सापेक्षतावाद की विज्ञानिक खोज की तरह युगांतरकारी घटना है.इतिहास के चौराहे पर एक नितांत नया मोड़ या बहती हुई नदी का एक कम्पलीट टर्न-अबाउट.इस आवाज़ में ताज़गी थी.झरने सी खलखलाहट थी.अछूते वन-प्रांतर का पावित्र्य था. लता के कंठ में अनजाने वही किया जो विवेकानंद की वाणी ने पाश्च्यात्य में किया-अजातशत्रु
लता मंगेशकर इस गीत में महज़ एक गायिका नहीं अपने समय की समग्र संस्कृति बन गईं हैं. ख़ूशबू और बेतहाशा ख़ूशबू का वितान सजातीं लता किसी कुंजवन की कोमल सखी सी विचर रहीं हैं इस गीत में. नायिका तो परदे के चलके के साथ ओझल हो जाती है लेकिन ये गीत उसकी मासूम छवि हो हमारे मानस में हमेशा जीवंत बना देते हैं. अजातशत्रुजी एक जगह लिखते हैं कि लता एक अलहदा सी सुवास हैं. अब उसे कोई नाम नहीं दिया जा सकता. पर महसूस किया जा सकता है. यह तत्व अन्य गायक-गायिका में नहीं मिलता. लता के गले में तुलसी की पत्ती है.
लगता है लता जमाल सेन की धुन को पिछले जन्म में सुन चुकीं हैं.वे जिस सहजता से इन शब्दों को अपने कंठ में उतार कर हमारे कानों को संगीत का अलौकिक आचमन करवा रहीं हैं वह हमारे कलुष को धोने के लिये काफ़ी है. इस गीत को सुनते वक़्त लगता है हम मीरा के मंदिर हैं जहाँ वे अपने साँवरे को ये गीत सुनाते सुनाते मोगरे की माला पहना रहीं हैं. अब सुन भी लीजिये ये गीत और लता मंगेशकर को जुग जुग जीने की दुआ दे दीजिये...
फिल्म: शोखियाँ
संगीत : जमाल सेन
गीत केदार शर्मा
सोयी कलियाँ हँस पड़ी झुके लाज से नैन,
वीणा की झंकार से तड़पन लागे नैन
सपना बन साजन आये
हम देख देख मुस्काये
ये नैना भर आये, शरमाये-२
सपना बन साजन आये-२
बिछ गये बादल बन कर चादर-२
इन्द्रधनुष पे हमने जाकर-२
झूले खूब झुलाये-२
ये नैना भर आये, शरमाये
सपना बन साजन आये
नील गगन के सुन्दर तारे-२
चुन लिये फूल, समझ अति न्यारे -२
झोली में भर लाये -२
ये नैना भर आये, शरमाये
सपना बन साजन आये
मस्त पवन थी, हम थे अकेले-२
हिलमिल कर बरखा संग खेले-२
फूले नहीं समाये -२
ये नैना भर आये, शरमाये
सपना बन साजन आये
(अजातशत्रु का वक्तव्य लता दीनानाथ मंगेशकर ग्रामोफ़ोन रेकॉर्ड संग्रहालय,इन्दौर के प्रकाशन बाबा तेरी सोन चिरैया से साभार)