Sunday, July 13, 2008

वेदना को संगीतमय बनाती मदन मोहन की कालजयी ग़ज़ल- पुण्‍यतिथि पर विशेष

आइये पहले आज श्रोता-बिरादरी के सफ़े पर कैफ़ी आज़मी साहब के शब्दों को पढ़ लें....


आज सोचा तो आँसू भर आए
मुद्दतें हो गईं मुस्कुराए
हर क़दम पर उधर मुड़ के देखा
उनकी महफ़िल से हम उठ तो आए
रह गई ज़िन्दगी दर्द बन के
दर्द दिल में छुपाए-छुपाए
दिल की नाज़ुक रगें टूटतीं हैं
याद इतना भी कोई न आए

सन १९७३ मे प्रकाशित तस्वीर हँसते ज़ख़्म की ग़ज़ल है ये.

छोटी बहर की इस ग़ज़ल का शब्दांकन कैफ़ी आज़मी साहब के क़लम से हुआ है जो चेतन आनंद के बेहद पसंदीदा शायर रहे हैं .चेतन जी ने उनसे फ़िल्म हक़ीक़त में भी नग़मानिगारी करवाई थी.महज़ चार अशाअर की इस ग़ज़ल को सादे काग़ज़ पर लिखा पढ़ें तो आप इसे एक अच्छी ग़ज़ल कह कर आगे बढ़ जाएँ लेकिन जब मदन मोहन के संगीत में बुनी धुन से लता मंगेशकर की आवाज़ आपके कानों में पहुँचती है तो आपको शायरी की ताक़त दो गुनी सुनाई देती है.

१४ जुलाई को संगीतकार मदन मोहन की पुण्यतिथि आती है. इसी महीने ने हमसे मोहम्मद रफ़ी जैसा महान गायक भी छीना था.ये ज़िक्र इसलिये की हमारी जानकारी के मुताबिक मदन मोहन और रफ़ी साहब की बरसी पर सबसे ज़्यादा संगीत कार्यक्रम दुनिया भर के छोटे बड़े शहरों में होते हैं . शायद ये इन दोनो सुर-सर्जकों का कमाल ही है कि वह संगीत-प्रेमियों के दिलोदिमाग़ में हमेशा बने रहते हैं. बहरहाल अब ’आज सोचा तो आँसू भर आए’ की बात हो जाए.

लताजी-मदनजी का संग-साथ जब भी चित्रपट गीतों को मिला है तब पूरा संगीत एक रूहानी दुनिया में तब्दील सा हो जाता है.हम इस पत्थर के संसार में कुछ मुलायम हो जाते हैं और कविता और संगीत की सच्चाई हमारे संसारी मन पर तारी हो जाती है. जब जब भी लता-मदन ग़ज़ल को रचते हैं लगता है दुनिया के ये दो बेजोड़ कारीगर किसी तपस्या से इस रचना को शक़्ल दे लाए हैं.मदन मोहन का संगीत गाते हुए लता इमोशन के स्तर पर शीर्ष पर होतीं हैं.

मदन मोहन का वाद्यवृंद डिसिप्लिन की पराकाष्ठा पर है. पहले अंतरे में गिटार के आधार पर इलेक्टॉनिक वाद्य को चीरती उस्ताद रईस ख़ाँ की सितार जैसे लता जी द्वारा गाए जाने वाले मतले को एक सुरीली ज़मीन बख़्शती है.मदन मोहन , लता और रईस खाँ एक संगीत के ज़रिये एक अदभुत वीराने को सजा रहे हैं.वेदना जैसे चट्टानों से झर कर इंसान के कोमल मन में आ समाई है.विरहणी की चित्कार मानो इस ग़ज़ल को मुस्कुराते हुए निभाना चाह रही है.मदन जी इस फ़िल्म का पूरा इम्पैक्ट बनाए रखने के लिये एक इंटरल्यूड में इसी फ़िल्म के दूसरे बेजोड़ गीत तुम जो मिल गए हो की धुन को भी ख़ूबसूरती से इस्तेमाल किया है. दर्द को जीते हुए मुस्कुराने को शऊर देती ये ग़ज़ल मदन-लता की जुगलबंदी का सुनहरा सोपान है.


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मदनमोहन के संगीत संसार की खासियत है वेदनामय गीतों को स्‍वरबद्ध करने में उनकी महारत । ऐसा लगता है कि मदनमोहन के मन में कहीं एक एकाकी व्‍यक्ति छिपा हुआ था । हम आपको बताना चाहेंगे कि मदनमोहन फौजी रहे थे । और फौजी हाथों ने जब बंदूक को टांगकर साज़ों को हाथ में लिया तो संगदिली रंगदिली में बदल गयी । फौजी नग़मों की रसवर्षा करने वाला मोसिकार बन गया । आज हम मदनमोहन की जितनी पूजा करते हैं और उनके नग़मों की जितनी प्रशंसा करते हैं उतनी उन्‍हें जीते जी नहीं मिली । और इस बात का उन्‍हें अफ़सोस रह गया । मदनमोहन की बेमिसाल धुनें कितनी कारगर थीं इसकी मिसाल ये है कि उनके संगीत-ख़ज़ाने की कुछ धुनों को उनके बेटे संजीव कोहली ने यश चोपड़ा की फिल्‍म 'वीर ज़ारा' में इस्‍तेमाल किया तो आज के झमाझम संगीतकारों के मल्‍लयुद्ध में भी मदन मोहन सबसे अलग नज़र आए । मदनमोहन की ये धुनें उस साल की सबसे अच्‍छी धुनों में शामिल हो गयीं । एक गाने की कितनी कितनी धुनें वो बनाते थे इसकी मिसालें कई जगहों पर हैं । कभी फुरसत से इस बारे में बातें की जायेंगी । 

मदन मोहन जैसे महान संगीत सर्जक को श्रोता-बिरादरी की भावपूर्ण श्रध्दांजली देते हुए यही कहना चाहेंगे कि चित्रपट संगीत की दुनिया के इस करिश्माई कलाकार ने जो कुछ इस संसार को दिया है वह कालातीत है. उनके संगीत में लता मंगेशकर की गायकी को सुनना जैसे इस मायावी संसार से गुम हो जाना है.आइये इस गीत को सुनते हुए संगीतकार मदन मोहन के कालजयी रचना संसार को सलाम कहें. इस गाने को आप यहां देख सकते हैं । 

श्रोता-बिरादरी हर रविवार को तकरीबन नौ बजे के आसपास अपनी साप्‍ताहिक प्रस्‍तुति लेकर आती है । ताकि पूरे हफ्ते उस गाने को आत्‍मसात किया जा सके । पिछले सप्‍ताह कुछ मित्रों ने गाना ना बजने की शिकायत की थी, उनसे निवेदन है कि कृपया अडोबे फ्लैश-प्‍लेयर डाउनलोड कर लें । गाना जरूर बजेगा ।

8 टिप्पणियाँ:

श्रोता बिरादरी said...

this is test comment ..

एक पंक्ति said...

सुनने वालों का ध्यान चाहेंगे:
गाना शुरू हुआ है सितार के आलाप से.फ़िर कोई वाद्य नहीं बजा है और शुरू हुई है ये ग़ज़ल लताजी की आवाज़ में ...तो ये जो शुरूआत है जहाँ कोई संगीत नहीं (आज सोचा तो )बस ये शुरूआत ही लताजी को दूसरे गायकों से अलग कर देती है. शब्द का अहसास जिस तरह से वे जीती है वह एक करिश्मा है.यहीं से तय कर देती हैं वे मदन मोहन के संगीत की क़ामयाबी.

Manish Kumar said...

मदनमोहन ने लता जी के लिए एक से बढ़कर एक चुनिंदा compositions की हैं जिसे लता जी ने निभाया भी कमाल है। हमेशा की तरह एक बेहतरीन पोस्ट !

सजीव सारथी said...

क्या कहूँ हँसते ज़ख्म के सभी गीत मेरे लिए अमृत समान हैं, ये नगमा तो बस.....आपने बहुत ही खूब प्रस्तुति दी है
दिल की नाज़ुक रगें टूटतीं हैं
याद इतना भी कोई न आए
वाकई आज सुना तो आंसू भर आए....
काश कि रविवार रोज हो :)

Harshad Jangla said...

Beautiful song, wonderful description and powerful language.

Sunday sudhar gaya saab.

Shukriya, Dhanyavaad.

-Harshad Jangla
Atlanta, USA

प्रभाकर पाण्डेय said...

सुंदरतम।

दिलीप कवठेकर said...

एक ही गीत में दो अप्रतीम गानो की दावत-

आज सोचा तो आसूं भर आये

और

तुम जो मिल गये हो , तो ये लगता है--

रफ़ी साहब का एक one of the most difficult song to sing.

रफ़ी साहब की पुण्यतिथी पर कुछ ऐसा ही कालजयी गाना हो जाये तो बहार आ जाये.

दिलीप कवठेकर said...

यह राग कौनसा है? जयदेव जी को भी यह राग बडा पसन्द था.

 
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