अगर हिन्दी के दस सबसे मधुर वर्षा/सावन गीतों का जिक्र हो तो उसमें सबसे पहला नाम जिस गीत का लिया जायेगा वह सलिल दा ( चौधरी ) का "हरियाला सावन ढ़ोल बजाता आया" का ही होगा। अपनी पहली संगीतबद्ध फिल्म ( और लिखित भी) में ही सलिलदा ने बता दिया था कि उनमें कितनी काबिलियत है । खैर.. जिक्र हो रहा था वर्षा गीत का, पुराने गीतों के प्रशंसक अच्छी तरह जानते हैं कि इस गीत की पहली पंक्ति भी अगर कान में पड़ जाये तो पूरा गीत सुने बिना मन नहीं मानता ।
गीत की शुरुआत में हुड़ तक तक कहते किसान और हरियाला सावन ढ़ोल बजाता... कहती हुई गृहिणी जब गीत की एक के बाद एक लाईने गाते हैं तो सुनने वाले पहले पैरा ( पहली बार) को तो सुनते हैं पर अगली बार ये लाइनें आती है बरबस वे भी गुन गुनाने लगते हैं...या याया या या या याऽऽ
मस्ती भरे इस गीत में एक आशावाद झलकता है, जब महिला कहती है धरती पहनेगी हरी चुनरिया बन के दुल्हनिया और किसान कहता है एक लगन लगी.. और जब एक किसान, मायूस बैठे नायक को यह गाकर कहता है बैठना तू मन मारे- आ गगन तले क्या पवन चले.. .
अंतिम पंक्तियों में नायिका सुख चैन की कामना करती हुई कहती है ऐसे बीज बिछा रे... सुख चैन उगे दुख दर्द मिटे.. नैनों में नाचे रे सपनों का धान हरा..
इस गीत को ध्यान से सुनने पर हमें आभास होता है मानों बाहर बारिश हो रही है और हम खेतों में हरी चुनरिया पहने धरती पर नाच रहे हों.. तब यह गीत आध्यात्मिक सी अनूभुति देता दिखता है।
गीत पूरा होने के बाद सुनने के बाद श्रोता को यही लगता रहता है कि "नहीं सलिलदा मन अभी नहीं भरा", काश सलिलदा इस गीत में कुछ पैरा और जोड़ देते..!!!
ये रहे इस गाने के बोल---
हरियाला सावन ढोल बजाता आया
धिन तक तक मन के मोर नचाता आया ।।
मिट्टी में जान जगाता आया
धरती पहनेगी हरी चुनरिया
बनके दुल्हनिया
एक अगन बुझी एक अगन लगी
मन मगन हुआ एत लगन लगी
बैठ ना तू मन मारे
आ गगन तले देख पवन चले
आजा मिलजुल के गाएं
जीवन का गीत नया ।
हरियाला सावन ढोल बजाता आया ।।
आज बीज बिछा रे
सुख चैन उगे दुख दर्द मिटे
नैनों में नाचे रे
सपनों का धान हरा ।
श्रोता-बिरादरी का अगला अंक रविवार की बजाय गुरूवार को आयेगा । 31 जुलाई गुरूवार को है मो.रफ़ी की पुण्यतिथि ।
आवाज़ की दुनिया के इस फरिश्ते को श्रोता-बिरादरी सलाम करेगा । इसलिए गुरूवार को आना मत भूलिएगा ।
4 टिप्पणियाँ:
aaj ka intjaar bhi sarthak huau:) is gaane ko gungunaaye bina koi kaise rah sakta hai :)us par puri jaankaari sundar dhang se ...bahut accha laga ...mohmad rafi ke gaano ko sunane ka intjaar rahega ,,
श्रोता बिरादरी को धन्यवाद, क्योंकि ---
१. हम हिन्दी फ़िल्म संगीत के चुने हुए नायाब गीतों के खज़ाने से रूबरू होते है, और उसके साथ साथ उस गीत के पीछे छिपी उसके रचनाकारों की मेहनत को करीब से जानते हैं, मेहसूस करते हैं.
२. और, उन रचनाकारों की स्रिजन की प्रसव पीडा से बाबस्ता भी होते है, कमोबेश में , भोगते है और स्वानन्द प्राप्त करते है.
३. हम में से हर दिवाना अपने अपने तईं इस समुद्र मन्थन से अपने अपने अर्थ निकाल कर आल्हादित होते है.
यहां सन्जय भाई के इस आग्रह की और श्रोता बिरादरी के आशय की सार्थकता साबित होती है, कि उन अनूभवों को यहां रखने का सिलसिला शुरू हो, और परवान चढे.
सत्सन्ग की इस कडी मे कुछ मेरे अनुभव भी--
यह फ़िल्म "दो बीघा ज़मीन" बिमल दा और सलिल दा की जुगलबन्दी के श्रुंखला की शायद पहली फ़िल्म थी(बाद में काबुलीवाला, परख,उसने कहा था, प्रेमपत्र ,परिवार, आवाज़ , मुसाफ़िर , नौकरी और सबसे लोकप्रिय एवम तरल फ़िल्म मधुमति - not in order)
किसी भी गीत की संगीत का जब स्रुजन होता था, (चूंकि अब नही होता), तो फ़िल्म के निर्देशक, सन्गीतकार और गीतकार के सन्मिलित प्रयास का नतीज़ा होता है एक कालजयी रचना, यदि उसमें उस गीत के आशय (याने की central idea), मूड , और उस परिवेश को सुरों के माध्यम से संरचित किया गया हो. और यह काम संगीतकार के ज़िम्मे होता है , जिसे वह उस गीत के प्रिल्युड मे ही रचता है.
प्रस्तुत गीत में यह काम बखूबी अन्जाम दिया गया है. आपने क्या खूब लिखा है कि हर गीत का आलाप सन्गीतकार ही रचता है. यहां सलिल दा ने साथ में प्रारंभ में जो आलाप रचा है, साथ में एक नया आयाम देने का प्रयोग भी किया है उसमें शब्दों को गढ कर .(तग तग तग तग तगिन तगिन दिन दिन से S S S-----).यह ज़रूर उन्होंने स्वयं गढे होंगे, क्योंकि जैसा कि मैने सलिल दा पर लिखे अपने ब्लोग में बताया है ( दिलीप के दिल से- www.dilipkawathekar.blogspot.com))
की वे एक बेहतरीन गीतकार भी थे.(चाबिगुछ्छा)
तो इस हरियाले सावन की आमद मे किसान के आल्हादित मन की अवस्था , उस फ़ील को महसूस कराने के लिये लिखे गये इस गीत के प्रिल्युड धुन में सलिल दा शहनाई के प्रयोग से एक अदभुत एंबियेंस रचते है , जो आगे के आलाप और अनोखे बोलों के माध्यम से परिलक्षित होते है साकार होते है . तो किसान के साथ दर्शक/श्रोता के मन का मोर भी नाचने ,झूमने लगता है.शहनाई का प्रयोग यहां कितना मौजूं है क्योंकि, बोवनी ही तो हर किसान का उत्सव है, दिवाली है.
अमूमन अपनी धूनों में सिंफ़नी और हार्मोनी के प्रयोग मेलोडी के साथ करने वाले सलिल दा ने यहां ग्रामीण परिवेश को मात्र लोक संगीत के सुरों से कम से कम वाद्य व्रुंद की सहायता से सजाया है.
(१९2५ में जन्मे इस गुणी सुर साधक ने अपना बचपन अपने Forest Officer पिता के साथ निसर्ग के सानिध्य में बिताया है, तो उसका असर तो होगा ही!!)
हम श्रोता / दर्शक गण भी फ़िल्म निर्देशक एवं संगीतकार के बुने गये इस मायावी जगत के मायाजाल मे रम जाते है और उस द्रष्य , परिवेश और आशय के साथ एकाकार हो जाते है, और उस गांव के एक पात्र किसान या ग्रुहणी हो जाते हैं.
यही तो उन दोनों की जादुगरी की पराकाष्ठा है जो मन के अंदर, रूह के अंदर पैठ जाती है, और दिली सूकुन दे जाती है. यही तो चाहिये है भाई, अऊर का ? ---
One of the most memorable songs of yester years.Really it was not satisfying till I heard it again and again.Listening carefully, moving your feet, singing together with the song, tapping with your fingers.....these all came so naturally that you feel the warmth and feelings of the song.
Marvellous melody, powerful wordings, sweet voice of Didi.....no words can describe the height of the song.
Thanks Sanjaybhai and all others for a wonderful presentation.
-Harshad Jangla
Atlanta, USA
इस लाजवाब फ़िल्म का ये लाजावाब गीत, और उस पर इतना सुंदर विवरण, विमल दा चित्रांकन देखिये, आज भी उतना ही तारो ताज़ा है....
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