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Saturday, September 13, 2008

श्रोता-बिरादरी का आमंत्रण : लता/80 : स्वर उत्सव : 14 से 28 सितम्बर

जब से श्रोता-बिरादरी प्रारंभ हुई है तब से प्रयत्न किया है कि आप संगीत-प्रेमियों को नायाब रचनाओं के ज़रिये एक रूहानी लोक की यात्रा करवाई जाए.इसी कड़ी में एक नई-नकोरी पेशकश लेकर आपसे रूबरू होने जा रहे हैं

.आपको जानकर प्रसन्नता होगी कि 28 सितम्बर को भारत-रत्न लता मंगेशकर अपने जीवन के 80 वर्ष पूर्ण करने जा रहीं हैं. लताजी संगीत की दुनिया की महारानी हैं.उन्होंने जिस कविता को छुआ वह अमर हो गई , जिस धुन को अपने कंठ का स्पर्श दिया वह निहाल हो गई. वे इस सदी का सबसे सुरीला करिश्मा हैं.ये एक ऐसी आवाज़ है जिसका मौन भी गा रहा होता है. वे सुर तपस्विनी हैं.और ये भी कहना चाहेंगे कि अपने अमोघ स्वर से वे हम संसारियों को निष्पाप और निश्छल बनाने इस धरती पर आईं हैं.

श्रोता-बिरादरी लता जी के इस जन्मोत्सव को अविस्मरणीय बनाने के लिये लाई है

लता/80:स्वर-उत्सव...पन्द्रह नामचीन और रचनाधर्मी संगीतकारों के साथ लताजी की जुगलबंदी. हर दिन एक नया संगीतकार और आवाज़ हमारी जानी पहचानी.

तमाम व्यस्तताओं के बाद हमें पूरा विश्वास है कि आप श्रोता-बिरादरी की सुरीली बिछात पर ज़रूर तशरीफ़ लाएंगे. लता जी का यह जन्मोत्सव हम सब संगीतप्रेमियों के लिये भी आनंद और उल्लास का प्रसंग बनकर आया है. तो बने रहिये श्रोता-बिरादरी के साथ और कुछ अनमोल गीतों के ज़रिये लता मंगेशकर के संगीत-सफ़र के और क़रीब आइये. चलते चलते पढ़ लीजिये ख्यात चित्रपट गीत समीक्षक और लेखक श्री अजातशत्रु का यह वक्तव्य:

ईश्वर ने जब गाना चाहा तो एक लता मंगेशकर को पैदा कर दिया.देखें दोबारा गाने की उसे कब सूझती है....सदियाँ ,करबध्द मुंतज़िर हैं.

14 से 28 सितम्बर : प्रतिदिन : प्रात: 9 बजे :लता/80 : स्वर-उत्सव.

Saturday, August 30, 2008

मख़मली आवाज़ में वेदना की सर्वप्रिय गाथा का अनमोल गीत

वेदना,पीड़ा,दु:ख़ या ग़म  ज़िन्दगी को एक नया मेयार देते है.
भारतीय कथा-कथन के सर्वकालिक हिट पात्र को अभिव्यक्त करता एक अनमोल गीत
श्रोता-बिरादरी की रविवासरीय जाजम पर आ रहा है. बरसात,पर्व,राष्ट्रप्रेम और शास्त्रीय संगीत की दावतों में तो श्रोता-बिरादरी ने आपको आमंत्रित किया ही है आइये एक दर्द भरा गीत भी सुन लिया जाए. देश के दस सर्वकालिक अभिनेताओं,गीतकारों,संगीतकारों और गायकों की सूची बने तो निश्चित रूप से यह चौकड़ी शुमार करनी ही पड़ेगी जिसका तानाबाना कल श्रोता बिरादरी के गीत के इर्द गिर्द घूमा है.

आज संगीत में शोर का जो आलम है उसमें शब्द और स्वर कराहते सुनाई देते है जबकि कल इस गीत को सुनियेगा तो आप महसूस करेंगे कि हमने इन बीते पचास बरसों में जो जो भी गँवाया है उसमें बेशक़ीमती है संगीत का वह मासूम अहसास जिससे ज़िन्दगी को नये आयाम और नज़रिये मिलते रहे हैं.

बहरहाल चलते चलते आगामी सप्ताह में प्रारंभ हो रहे महापर्व गणेश उत्सव और रमज़ान की अग्रिम शुभकामनाएँ आप सभी श्रोता-बिरादरों के प्रति.

कल रविवार 31 अगस्त श्रोता-बिरादरी टाइम पर मुलाक़ात होती है.आ रहे हैं न....

 
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