Saturday, August 9, 2008

अखण्ड किशोर स्वर में डूबी श्रोता-बिरादरी की रविवासरीय पेशकश

          योगायोग ही कहिये कि पिछले रविवार और सोमवार लगातार दो दिन तक आपसे सुरीली मुलाक़ात होती रही. प्रतिक्रियाएँ भी मिलीं,ई-मेल्स,समस और आपके फ़ोन कॉल्स भी. मन भर आता है आपके प्रतिसाद से और इरादा पक्का बनता है कि संगीत के सुनहरे दौर की ये बातें आपके कोमल मन को छू रही हैं.
          बात करते करते फ़िर आ गया रविवार या कहें श्रोता-बिरादरीवार.सुबह के नौ बजेंगे और १० अगस्त को फ़िर एक बार मिल बैठेंगे हम एक ऐसे संगीतकार की रचना लेकर जो मूलत: एक ख्यात संगीतकार जोड़ी का सहयोगी रहा. बेताज बादशाह रहा तालवाद्यों का लेकिन जब भी ख़ुद बतौर म्युज़िक डायरेक्टर काम किया तो बता दिया वह किस पाये का कलाकार है.गीत के क्या कहने , सुनते ही लगे कि ये तो मेरे मन की बात है और गायकी ...माशाअल्लाह देश की इस सुर महारानी का स्वर तो जैसे  भगवान ने कुछ ऐसा गढ़ा है कि उसकी उम्र ही नहीं बढ़ती ...सुनते सुनते एक पीढ़ी बूढ़ी हो गई लेकिन वह है एक अखण्ड कैशोर्य  स्वर.....समझ तो गए हैं आप ...बिलकुल ठीक ...भल आपका अंदाज़ ग़लत कैसे हो सकता है  ....बस आपकी इसी अदा पर तो क़ुरबान है हम तीनों यानी यूनुस,सागर और संजय का दिल.आप से ही है श्रोता-बिरादरी के सुरीलेपन की महफ़िल रोशन.आदाब.

Monday, August 4, 2008

किशोर कुमार अपने जन्‍मदिन पर कुछ कह रहे हैं ।।

 
किशोर कुमार 1929-1987 
सन 87 से अब तक कितने बरस बीत गए,‍ गिनती करना मुश्किल नहीं है । लेकिन ये बहस दुनिया में लगातार चलती रही कि किशोर बेहतर थे या रफ़ी या मुकेश । दुनिया भर में किशोर कुमार के नग़मे भी बजते रहे । और इस बीच ना जाने कितनी पीढियां किशोरावस्‍था से जवानी और जवानी से अधेड़ होने की तरफ़ बढ़ चलीं । लेकिन श्रोता-बिरादरी मानती है कि जो 'किशोर' के गाने सुनता है वो किशोरावस्‍था में ही है । 
किशोर के जन्‍मदिन पर हम कोई भी खिलंदड़ गाना चुन सकते थे और फिर किशोर दा की शान में क़सीदे काढ़ सकते थे । लेकिन श्रोता-बिरादरी संस्‍कारों पर ज़ोर देती है और लीक से हटकर काम करने पर विश्‍वास रखती है । तो चलिए आज एक ऐसा गाना सुनें जिसमें अपनी बात कहने की हिचक है । जिसमें प्‍यार की तरंगों के बीच दिल में उठता संकोच का ज्‍वार है । जिसमें बेक़रारी के साथ हल्‍का-सा डर है । उफ़ ऐसे गाने आज क्‍यों नहीं बनते । 
इस गाने को सुनते हुए सोचिए कि आज का नायक तुषार कपूर परदे पर चिल्‍ला चिल्‍लाकर कह रहा है-'मुझे कुछ कहना है' । और यहां परदे पर किशोर बड़े संकोच से वहीदा रहमान से अपने मन की बात कह रहे हैं । कितना विरोधाभास है दोनों स्थितियों में । इससे आपको अंदाज़ा लग जायेगा कि ज़माना कितना बदल गया है । 
आज मुझे कुछ कहना है ! इतने से भी काफ़ी कुछ कह दिया है इस गीत ने.
और हेमंत दा की दृष्टि देखिये कि जहाँ साहिर कहने में समर्थ हैं वहाँ एक संगीतकार ने धुन की एक परिपक्व ज़मीन देने के अलावा कुछ नहीं कह है.जहाँ शब्द और गायकी सब कुछ कह रही हो वहाँ साज़ की ज़रूरत नहीं है नहीं है.और ऐसा कर के संगीतकार हेमंतकुमार काफ़ी कुछ कह गए हैं.श्रोता-बिरादरी के आपके मेज़बान यानी हम तीनो इस बात को रेखांकित करना चाहेंगे कि किशोर दा में बसे संजीदा गायक को ज़माने ने गंभीरता से नहीं लिया. कई गीत ऐसे हैं जिनमें से आज का गीत विशिष्ट है जहाँ आप शिद्दत से महसूस करते हैं कि किशोर कुमार एक परिपूर्ण गायक थे और हर रंग , सिचुएशन और स्टाइल का गीत उनके स्वर को फ़बता था. वे एक भरी-पूरी म्युज़िकल रूह थे और जिस तरह से उन्होंने संगीत जगत में आमद ली उससे सहज ही अंदाज़ लगाया जा सकता है कि बिना किसी उस्ताद या औपचारिक तालीम के परिदृश्‍य पर छा जाने वाला ये खिलंदड़ गायक एक एक कुदरती करिश्मा था.

बहरहाल आपको बता दें कि ये गाना किशोर कुमार और सुधा मल्‍होत्रा ने गाया है और साहिर ने लिखा है । इस गाने के संगीतकार हैं हेमंत कुमार । विलक्षण है ये गीत । पहले रचना पक्ष की बात कर लें । तो साहिर ने पूरा समां बांधा है--कश्‍ती का खामोश सफर, शाम, तन्‍हाई, लहरों की तन्‍हाई.....लेकिन दिल की बात ज़बां पर आ नहीं रही है । इस गाने में ग़ज़ब की सूक्ष्‍म नाटकीयता है । अगर आप पहली बार गाना सुनें तो लगेगा कि नायक अब अपनी बात कहेगा, अब कहेगा...शायद आखिर में जाकर कह ही देगा । पर किशोर आखिरी पंक्ति में कहते हैं.........छोड़ो अब तो संग ही रहना है । ना कहते हुए भी कितना कुछ कह गए हैं साहिर । गाने ऐसे लिखे जाते हैं ।

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कश्‍ती का ख़ामोश सफर है शाम भी है तन्‍हाई भी
दूर किनारे पर बजती है लहरों की शहनाई भी
आज मुझे कुछ कहना है ।।
लेकिन ये शरमीली निगाहें मुझको इजाज़त दें तो कहूं
खुद मेरी बेताब उमंगें थोड़ी फुरसत दें तो कहूं
आज मुझे कुछ कहना है ।।
जो कुछ तुमको कहना है वो मेरे ही दिल की बात ना हो
जो है मेरे ख्‍वाबों की मंजिल उस मंजिल की बात हो ।
कहते हुए डर सा लगता है कहकर बात ना खो बैठूं
ये जो ज़रा-सा साथ मिला है ये भी साथ ना खो बैठूं ।
कब से तुम्‍हारे रस्‍ते में मैं फूल बिठाए बैठी हूं ।
कह भी चुको जो कहना है मैं आस लगाए बैठी हूं ।
दिल ने दिल की बात समझ ली अब मुझे क्‍या कहना है
आज नहीं तो कल कह लेंगे अब तो साथ ही रहना है ।
कह भी चुको, कह भी चुको जो कहना है
छोड़ो अब क्‍या कहना है ।।

समय तो बीतता ही जाता है और हम सब अपनी व्यस्तताओं को बढ़ाते ही जाते हैं
लेकिन ये गुज़रे ज़माने का संगीत या कहिये आज मुझे कुछ कहना है जैसे गीत ही
हैं जो समय की गति को थामें हुए हैं . हमें स्मरण दिलाते हुए से कि हम बीत रहे
हैं लेकिन संगीत हमें कुछ पलों को बीतने से रोक रहा है. दिन रात तेज़ और तेज़
तत्काल और तत्काल की तरफ़ भाग रहे समय में ये गीत हमें साइलेंट मैसेज भी दे
रहे हैं कि इंसान नहीं रहता उसका हुनर उसकी क़ाबिलियत के चर्च हमेशा बने रहते हैं
किशोर दा भी करोड़ों संगीतप्रेमियों के बीच बने रहे हैं ; बने रहेंगे.सोच,संगीत,समझ
बदलेगी लेकिन किशोर कुमार जैसा गायक हमेंशा हमारी स्मृतियों में बना रहेगा.

किशोर दा को कोई अच्छी बंदिश पसंद आ जाए तो.... क्या बात है कहने के बजाय
उसको एब्रीवेट करके कहते थे...के.बी.एच....क्या ये गीत सुनने के बाद आप नहीं
के.बी.एच .रमाकु रशोकि (किशोर दा इन्दौर के क्रिश्चियन कॉलेज में अपने मित्रों को
अपना नाम उल्टा कर के ही बताते थे और हाँ सहगल साहब के कई गाने भी उल्टे गाते
थे)......हेप्पी बर्थ डे टू यू किशोर दा !

Sunday, August 3, 2008

गरजत बरसत सावन आयो रे ; लायो न संग में हमरे बिछरे बलमवा.


गरजत बरसत सावन आयो रे
लायो न संग में
हमरे बिछड़े बलमवा
सखी क्या करूं हाय

रिम – झिम, रिम - झिम मेहा बरसे
तरपे जियरवा मीन समान
पर गयी फीकी लाल चुनरिया,
पिया नहीं आये...
गरजत बरसत आयो रे...

पल पल छिन छिन पवन झकोरे
लागे तन पर तीर समान,
नैनं जल सो गीली चदरिया,
अगन लगाये,
गरजत बरसत सावन आयो रे...

इस गीत की पंक्तियों को पढ़ें तो लगता है अमीर ख़ुसरो की लिखीं हैं लेकिन ये तो हमारे साहिर लुधियानवी साहब का कारनामा है हुज़ूर. फ़िल्म बरसात की रात की एक बेहतरीन म्युज़िक फ़िल्म थी (इस विषय पर ज़्यादा नहीं वरना एक पूरी पोस्ट इसी फ़िल्म के संगीत पर लिखी जा सकती है)और साहिर-रोशन जुगलबंदी का नायाब नमूना. पूरब के अंग को साहिर साहब ने अपने क़लम से सजा कर इस मौसमी बंदिश क्या ख़ूब सँवारा है. ये पूरा गीत उपमाओं का गीत है.जियरवा मीन यानी मछली जैसा तड़प रहा है,पवन झकोरे तन पर तीर समान लग रहे हैं गोया साहिर साहब ने एक पूरा समाँ रच दिया है बिरहन की फ़िलिंग्स और बरसते सावन का.एक लम्बे इंतज़ार के लिये साहिर ने क्या बढ़िया मुहावरा रच दिया है कि प्रियतम की इतनी लम्बी प्रतीक्षा हो गई है कि लाल चूनर मध्दिम पड़ गई है.सरकाई लो खटिया जाड़ा लगे जैसे गीत में जो छिछोरापन है उसके सामने इस मौसमी रचना में नैनं जल सो गीली चदरिया , अगन लगाए कैसी गरिमा से लिखा गया है...इस लिहाज़ से ये कहना बेमानी न होगा कि गुज़रे ज़माने के गीत भाषा का लहजा और संस्कार भी तो रचते थे.

रोशन साहब जो बाक़ायदा शास्त्रीय संगीत की तालीम लेकर फ़िल्म इंडस्ट्री में आए थे मल्हार अंग की इस रचना में दो स्वरों (सुमन कल्याणपुर और कमल बारोट ) से क्या ख़ूबसूरत गवा गए हैं . कमलजी की आवाज़ में एक प्यारा सा नैज़ल है जो ऐसा आभास देता है जैसे कोई अभ्यासी गायिका नहीं हमारे घर की बहन बेटी झूला-गीत गा रही हैं.और सुमन ताई की लहरदार आवाज़ में मुरकियाँ इस बंदिश की रौनक़ बढ़ा रही है. रोशन साहब ने इस गीत में कोई आलाप देने के बजाय सरोद और सारंगी के एक प्री-ल्यूड से गीत को आमद दी है. इस गीत में सरोद बार बार बजा है और बड़ा सुरीला बजा है . ये सरोद पीसेज़ बजाये हैं ज़रीन दारूवाला ने और सांरगी के छोटी छोटी बानगियाँ पं.रामनारायणजी के गज (जिससे सारंगी बजाई जाती है) से ऐसी बजीं है जैसे घने बादल में बिजली चमक रही हो..तबले और जलतरंग पर एक ख़ूबसूरत शुरूआत रची गई है जिस पर उभरता दोनो गायिकाओं का मीठा स्वर छा गया है.तीन मिनट के इस खेल में रोशन साहब ने साबित कर दिया है कि इस तरह से भी क्लासिकल मौसीक़ी की ख़िदमत की जा सकती है.

फिल्‍म 'मल्‍हार' में भी इसी तरह का एक गीत था बोल थे 'गरजत बरसत भीजत आईलो' । अपनी रचना और धुन में ये गीत भी कम नहीं है । कमाल की बात ये है कि उत्‍तर के लोकगीत और शास्‍त्रीय रचनाओं से प्रेरित होकर दो सुंदर गीत तैयार हुए हैं । वो भी एकदम एक जैसे । पी. एल. संतोषी की फिल्‍म 'बरसात की रात' आज से अड़तालीस साल पहले आई थी । क्‍या आपने इस बात पर विचार किया कि जब बारिश आती है तो हमारे होठों पर चालीस पचास साल पहले के गीत ही क्‍यों सजते हैं । क्‍या इसका मतलब ये समझा जाये कि पिछले लगभग तीस बरस बारिश के अनमोल गीतों की दृष्टि से एकदम वीरान सुनसान बीत गए । बदलते दौर के साथ बदलती प्राथमिकताओं का संकेत है ये ।

'श्रोता-बिरादारी' पर हम गॉसिप नहीं करते । पर फिर भी एक अहम मुद्दे का खुलासा आपके सामने कर रहे हैं । फिल्‍म-संगीत की दुनिया के बहुत ही वरिष्‍ठ और भरोसेमंद सूत्रों के हवाले से हमारी जानकारी में ये बात आई है कि कई गीत जो साहिर लुधियानवी के नाम हैं, दरअसल उन्‍हें जांनिसार अख्‍तर ने लिखा है । और ये गीत उनमें से एक गिना जाता है । हालांकि इन बातों की पक्‍के तौर पर पुष्टि कभी नहीं की जा सकती । पर कहते हैं कि जांनिसार बेहद मनमौजी थे और साहिर बहुत बिज़ी । इसलिए बिज़ी शायर ने मनमौजी शायर की मुंबई में डटे रहने में 'मदद' की थी । चलिये छोडि़ये इन बातों को और सावन के इस गीत को झूला बनाकर ऊंची ऊंची पींगें लीजिये ।

इस गाने को हमने तीन रूपों में चढ़ाया है ।










श्रोता‍ बिरादरी की अगली पेशकश कल होगी । कल किशोर दा का जन्‍मदिन है ।

Saturday, August 2, 2008

लगातार दो दिनों तक बने रहियेगा...श्रोता – बिरादरी के साथ....

समय पलक झपकते ही बीत जाता है. कहते हैं समय के पँख होते हैं;
पाँव नहीं. पिछले हफ़्ते श्रोता-बिरादरी को दो बार मौक़ा मिला आपसे बतियाने का.
31 जुलाई को रफ़ी साहब की बरसी पर जारी गीत पर मिले प्रतिसाद के
लिये आभार . आइये एक बार फ़िर एक नये गीत को याद करें;सुनें;गुनें
और हाँ ये गीत है ही ऐसा कि साथ में गुनगुनाएँ भी.
मल्हार के रंग में भीगी ये बंदिश आपके मन के आनंद को रोशन करेगी
इसका पूरा यक़ीन है हमें.

रविवार की सुबह नौ बजे के अनक़रीब श्रोता-बिरादरी की सुरीली बिछात आपकी मुंतज़िर रहती है. इस गीत को सुनने के बाद हमें फिर ये मानना पड़ता है कि फ़िल्म संगीत के बेजोड़ सृजनधर्मियों ने जो काम किया है वह कितना लाजवाब है. चित्रपट विधा में समय की जो सीमा है उसमें रहते हुए ,शास्त्रीय संगीत का मान बढ़ाते हुए और सबसे महत्वपूर्ण ...कविता की गरिमा पर क़ायम रहते हुई कैसे कैसे नायाब
कलेवर रचे हैं हमारे गुणी गीतकारों,गायकों,और संगीतकारों ने.गीत आपका सुना हुआ और सराहा हुआ है लेकिन इस मौसम की रंगत में इज़ाफ़ा करता हुआ ज़रा ज़्यादा ही सुरीला सुनाई देता है.

सुनियेगा ज़रूर....कल सुबह यानी 3 अगस्त को ये ख़ास गीत.

और हाँ आपको एक ख़ुशखबर देना तो भूल ही गये....4 अगस्त को फ़िर मिल रहे हैं रमाकु रशोकि का जन्मदिन मनाना है न हमें – आपको।
तो लगातार दो दिन तक श्रोता-बिरादरी के साथ बने रहियेगा.....ये आप ही की तो महफ़िल है जनाब.

 
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